शनिवार, जून 23, 2012

वेब मीडिया को स्वावलंबी बनाने की जरूरत

विदेशो की तरह भारत में भी वेब मीडिया तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है. हिंदी के ब्लॉग्स, वेबसाइट्स और न्यूज़ पोर्टलों को  पूरी दुनिया में पढ़ा जा रहा है. अप्रवासी भारतीयों के  लिए भी अपनी मिटटी से जुड़े रहने का यह सर्वसुलभ माध्यम बन बनता जा रहा है. दरअसल प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया की पहुंच की एक सीमा है जबकि वेब की कोई सीमा नहीं. दुनिया के किसी हिस्से में इसे मात्र एक क्लिक के जरिये देखा जा सकता है. सच पूछें तो ग्लोबल गांव का का असल मीडिया वेब मीडिया ही है. एक सर्वेक्षण की मानें तो सिर्फ करीब सवा अरब की आबादी वाले भारत में ही 10 करोड़ से ज्यादा संख्या इंटरनेट यूजर्स की है और हिंदी के साइट्स की संख्या भी एक लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है. विभिन्न सरकारी योजनाओं के जरिये जिस तरह गाँव-गाँव में पीसी टेबलेट्स बांटे जा रहे हैं और कंप्यूटर शिक्षा प्रदान की जा रही है आनेवाले समय में इस आकडे में जबरदस्त इजाफा होनेवाला है. निश्चित रूप से आनेवाले समय में प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक की तुलना में यह ज्यादा बड़ी आबादी तक पहुंच का माध्यम बननेवाला है. पश्चिमी देशों में तो कार्पोरेट कम्पनियों ने अपने उपभोक्ताओं तक अपने उत्पाद का प्रचार पहुँचाने के लिए वेब मीडिया को अपनी पहली पसंद के रूप में स्वीकार कर लिया है। इसीलिए अब वहां वेब का कुल विज्ञापन व्यवसाय में 80 फीसदी की हिस्सेदारी हो चुकी है. हिंदी वेबसाइट्स को अभी वित्तीय स्वावलंबन की ओर ले जाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है.   
अब समय आ चुका है कि सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर इस मीडिया को अपने पावों पर खड़ा करने की और ग्लोबल गांव के इस सबसे समर्थ और सशक्त मीडिया को अपने पाओं पर खड़ा करने की पहल की जाये. सूचना मंत्रालय वेबसाइट्स को  डीएवीपी में सूचीबद्ध कर सरकारी विज्ञापनों से जोड़े और व्यवसाई वर्ग अपने उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने के लिए इसका इस्तेमाल करे. विज्ञापन एजेंसियां वेब के विज्ञापन के लिए तकनीकी तैयारी करें. यह ग्लोबलाइजेशन के इस दौर की ऐतिहासिक जरूरत है.

-----देवेंद्र गौतम