मंगलवार, मार्च 20, 2012

गरीबी मिटाने का नायाब फार्मूला

शहरी क्षेत्र में 28 .65 रुपये और ग्रामीण क्षेत्र में 22 .42  रुपये में क्या-क्या किया जा सकता है उसकी क्रय शक्ति क्या हो सकती है..? कभी सोचा है आपने..? शायद नहीं लेकिन हमारे देश के योजना आयोग ने इसपर विचार किया है और इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि एक परिवार के भरण-पोषण के लिए इतनी राशि काफी है. प्रतिदिन इससे कम खर्च करने वाले ही गरीबी रेखा के अंदर आते है. इससे ज्यादा खर्च करने वाले बीपीएल नहीं माने जा सकते. वे एपीएल की श्रेणी में आयेंगे. इस फार्मूले का निर्धारण करने के साथ ही देश में गरीबों की संख्या 40 .72  करोड़ से घटकर 34 .47  करोड़ पर चली आई. क्यों! है न यह गरीबी मिटाने का अनूठा फार्मूला..?इस रेखा को छोटा करते जाइये गरीबी स्वयं कम होती जाएगी. इस लिहाज़ से जिन्हें न्यूनतम मजदूरी मिल रही है उन्हें अमीरों में गिना जाना चाहिए. उन्हें करदाताओं की श्रेणी में लाया जाना चाहिए. क्योंकि वे तो गरीबी रेखा से काफी ऊपर हैं.
यह भारत ही है जहां शासन तंत्र जनता के साथ इस तरह का भद्दा मजाक कर सकता है और जनता चुप रह सकती है. दूसरा कोई देश होता तो इस अवधारणा के जनकों को उनके परिवार के साथ एक टेंट में कैद कर भरण-पोषण के लिए इतनी ही रकम प्रतिदिन देकर देखती कि वे कैसे अपना परिवार चलाते हैं. अपनी बुनियादी जरूरतों को इतने पैसों में कैसे पूरा करते है. यदि वे कर दिखाते तो तो उनके चरण छूती. नहीं कर पाते तो गला................!

----देवेंद्र गौतम 

शनिवार, मार्च 17, 2012

सरकार बनाई तो अब भुगतो

हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विश्वविख्यात अर्थशास्त्री हैं. लेकिन उनका अर्थशास्त्र आम भारतीयों के पल्ले नहीं पड़ रहा है. बजट में रेल किराया से लेकर तमाम जरूरी जिंसों के दाम बढ़ा दिए. टैक्स में कोई खास छूट नहीं दी. रसोई गैस और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की धमकी दे रहे हैं. फिर भी उनका दावा है कि इस बजट से महंगाई घटेगी. कैसे?....यह नहीं बता रहे. विद्वान आदमी हैं उन्हें समझाना चाहिए. यह चमत्कार कैसे होगा. उनकी सरकार बनते ही भारतीय जन की रसोई पर हमला शुरू हो गया. जो गैस एनडीए सरकार के ज़माने तक सहज उपलब्ध था वह दुर्लभ हो गया. अब एक वर्ष में सिर्फ 6 सिलिंडर उपलब्ध करने की घोषणा हो चुकी है. एक सिलिंडर में दो महीने तक किस रसोई में भोजन बनेगा मनमोहन डा ही बता सकते हैं. बाकी सिलिंडर अंतर्राष्ट्रीय कीमतों पर यानी सब्सिडी के बगैर मिलेंगे यह घोषणा तो की लेकिन गैस एजेंसियों को ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया. जनता त्राहि-त्राहि कर रही है लेकिन विपक्ष चुप है. यूपीए सरकार बनायीं तो अब पांच साल तक भुगतो. सिर्फ ममता जी ने रेल बजट पर नाराजगी जताई. उनकी मजबूरी थी. उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीति करनी है जहाँ की जनता ट्राम भाड़ा में 25  पैसे की बढ़ोत्तरी पर भी उबल उठती है. आम जनता को महंगाई की चक्की में पीसने वाली सरकार के साथ उनकी दोस्ती को वहां के लोग कबतक बर्दास्त कर सकते हैं? विरोध तो जताना ही था. अन्य दलों ने भी सांकेतिक विरोध जताकर अपनी भूमिका का निर्वहन कर लिया. जिस तरह प्रधानमंत्री जी का कीमतें बढाकर महंगाई पर लगाम लगाने का दावा लोगों की समझ से परे है उसी तरह तरक्की के जो आंकड़े पेश किये जा रहे हैं उनका आम जनजीवन पर कोई असर समझ में नहीं आ रहा है. इस देश के लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि वे करें तो क्या करें. नागनाथ का विकल्प सांपनाथ हैं. कोई सही और भरोसेमंद विकल्प नज़र ही नहीं आ रहा है.

---देवेंद्र गौतम

बुधवार, मार्च 07, 2012

...दिलों में उदासी सड़कों पर सन्नाटा?


आज 8  मार्च का दिन है. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस. साथ ही होली की पूर्व संध्या भी. पूर्व संध्या बिहार और झारखंड के लिए. यूपी और दिल्ली सहित देश के कई प्रांतों में तो आज ही होली मनाई जा रही है. लेकिन इस बार न अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का और न ही होली का कोई उमंग दिखाई पड़ रहा है. पूरे माहौल में एक अजीब उदासी, एक अजीब सन्नाटा महसूस हो रहा है.
आज सुबह रंगों के भय से हमने कुछ पुराने कपडे पहन लिए थे और सोचा था कि शहर में नहीं निकलेंगे. लेकिन करीब 10  बजे गारी लेन के लिए निकलना पड़ा. हम इसके लिए तैयार थे कि कहीं से पिचकारी का रंग आएगा. कहीं रंग भरे गुब्बारे मरे जायेंगे. हालांकि यह भरोसा था कि जो भी होगा अशोक विहार कालोनी के बाहर ही होगा. रांची की इस कालोनी में एलीट क्लास के लोग रहते हैं. उनके बच्चे भी इंटरनेटी युग के अंतर्मुखी मिजाज़ के हैं. वे टीवी और नेट से चिपके होंगे. उन्हें गुब्बारे मारने की फुर्सत कहां. भारतीय संस्कृति के संस्कारों का ज्ञान कहां?
बहरहाल हम डरते-डरते कोलोनी से बाहर निकले बाज़ार तक गए. जरूरी सामान ख़रीदे और लौट आये. न कहीं पिचकारी छूटी न गुब्बारे फूटे. यही हाल रहा तो आने वाले समय में पर्व-त्यौहार संभवतः औपचारिक आयोजन तक सिमट जायेंगे. होली मिलन के निमंत्रणों से ज्ञात होगा ही होली आ गयी है. क्या यह अपनी संस्कृति से अलगाव का द्योतक नहीं है.....?

----देवेंद्र गौतम