शनिवार, मार्च 17, 2012

सरकार बनाई तो अब भुगतो

हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विश्वविख्यात अर्थशास्त्री हैं. लेकिन उनका अर्थशास्त्र आम भारतीयों के पल्ले नहीं पड़ रहा है. बजट में रेल किराया से लेकर तमाम जरूरी जिंसों के दाम बढ़ा दिए. टैक्स में कोई खास छूट नहीं दी. रसोई गैस और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की धमकी दे रहे हैं. फिर भी उनका दावा है कि इस बजट से महंगाई घटेगी. कैसे?....यह नहीं बता रहे. विद्वान आदमी हैं उन्हें समझाना चाहिए. यह चमत्कार कैसे होगा. उनकी सरकार बनते ही भारतीय जन की रसोई पर हमला शुरू हो गया. जो गैस एनडीए सरकार के ज़माने तक सहज उपलब्ध था वह दुर्लभ हो गया. अब एक वर्ष में सिर्फ 6 सिलिंडर उपलब्ध करने की घोषणा हो चुकी है. एक सिलिंडर में दो महीने तक किस रसोई में भोजन बनेगा मनमोहन डा ही बता सकते हैं. बाकी सिलिंडर अंतर्राष्ट्रीय कीमतों पर यानी सब्सिडी के बगैर मिलेंगे यह घोषणा तो की लेकिन गैस एजेंसियों को ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया. जनता त्राहि-त्राहि कर रही है लेकिन विपक्ष चुप है. यूपीए सरकार बनायीं तो अब पांच साल तक भुगतो. सिर्फ ममता जी ने रेल बजट पर नाराजगी जताई. उनकी मजबूरी थी. उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीति करनी है जहाँ की जनता ट्राम भाड़ा में 25  पैसे की बढ़ोत्तरी पर भी उबल उठती है. आम जनता को महंगाई की चक्की में पीसने वाली सरकार के साथ उनकी दोस्ती को वहां के लोग कबतक बर्दास्त कर सकते हैं? विरोध तो जताना ही था. अन्य दलों ने भी सांकेतिक विरोध जताकर अपनी भूमिका का निर्वहन कर लिया. जिस तरह प्रधानमंत्री जी का कीमतें बढाकर महंगाई पर लगाम लगाने का दावा लोगों की समझ से परे है उसी तरह तरक्की के जो आंकड़े पेश किये जा रहे हैं उनका आम जनजीवन पर कोई असर समझ में नहीं आ रहा है. इस देश के लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि वे करें तो क्या करें. नागनाथ का विकल्प सांपनाथ हैं. कोई सही और भरोसेमंद विकल्प नज़र ही नहीं आ रहा है.

---देवेंद्र गौतम

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