बुधवार, मार्च 07, 2012

...दिलों में उदासी सड़कों पर सन्नाटा?


आज 8  मार्च का दिन है. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस. साथ ही होली की पूर्व संध्या भी. पूर्व संध्या बिहार और झारखंड के लिए. यूपी और दिल्ली सहित देश के कई प्रांतों में तो आज ही होली मनाई जा रही है. लेकिन इस बार न अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का और न ही होली का कोई उमंग दिखाई पड़ रहा है. पूरे माहौल में एक अजीब उदासी, एक अजीब सन्नाटा महसूस हो रहा है.
आज सुबह रंगों के भय से हमने कुछ पुराने कपडे पहन लिए थे और सोचा था कि शहर में नहीं निकलेंगे. लेकिन करीब 10  बजे गारी लेन के लिए निकलना पड़ा. हम इसके लिए तैयार थे कि कहीं से पिचकारी का रंग आएगा. कहीं रंग भरे गुब्बारे मरे जायेंगे. हालांकि यह भरोसा था कि जो भी होगा अशोक विहार कालोनी के बाहर ही होगा. रांची की इस कालोनी में एलीट क्लास के लोग रहते हैं. उनके बच्चे भी इंटरनेटी युग के अंतर्मुखी मिजाज़ के हैं. वे टीवी और नेट से चिपके होंगे. उन्हें गुब्बारे मारने की फुर्सत कहां. भारतीय संस्कृति के संस्कारों का ज्ञान कहां?
बहरहाल हम डरते-डरते कोलोनी से बाहर निकले बाज़ार तक गए. जरूरी सामान ख़रीदे और लौट आये. न कहीं पिचकारी छूटी न गुब्बारे फूटे. यही हाल रहा तो आने वाले समय में पर्व-त्यौहार संभवतः औपचारिक आयोजन तक सिमट जायेंगे. होली मिलन के निमंत्रणों से ज्ञात होगा ही होली आ गयी है. क्या यह अपनी संस्कृति से अलगाव का द्योतक नहीं है.....?

----देवेंद्र गौतम      

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