सोमवार, नवंबर 28, 2011

अरबों की दौलत मगर किस काम की


हाल में मेरे चचेरे भाई नगेन्द्र प्रसाद रांची आये. उन्होंने एक मसला रखा जिसने कई सवाल खड़े कर दिए.. वे घाटशिला में रहते हैं. घाटशिला झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले का का एक पिछड़ा हुआ अनुमंडल है. यहां कुल आबादी में 51 % आदिवासी हैं. सिंचित ज़मीन 20 % भी नहीं. कुछ वर्षा आधारित खेती होती है लेकिन बंज़र ज़मीन काफी ज्यादा है. नगेन्द्र जी ने एक आदिवासी परिवार के बारे में बताया जिसके पास 250 बीघा ज़मीन है लेकिन आर्थिक स्थिति साधारण है. उस परिवार के युवक अपनी ज़मीन मोर्गेज रखकर यात्री बस निकालना चाहते हैं. इसमें वे मदद चाहते थे. जानकारी मिली कि आदिवासी ज़मीन मॉर्गेज नहीं होती. राष्ट्रीयकृत बैंक, प्राइवेट बैंक या प्राइवेट फाइनांसर भी इसके लिए तैयार नहीं होते. कारण है टेनेंसी एक्ट. जिसके प्रावधान के अनुसार आदिवासी ज़मीन उसी पंचायत और उसी जाति का कोई आदिवासी ही उपायुक्त की अनुमति लेकर खरीद सकता है. अन्यथा उसकी खरीद-बिक्री नहीं हो सकती. बिरसा मुंडा के आंदोलन उलगुलान के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह एक्ट बनाया था.

शुक्रवार, नवंबर 25, 2011

जनजीवन को जटिल बनाते अपराधी

मुट्ठी भर अपराधी और कमजोर सरकारी तंत्र आम आदमी के जीवन को जटिल बनाते जा रहे हैं. किसी ज़माने में एक खाताधारी की पहचान पर बैंक बैंक अकाउंट खुल जाता था अब इसके लिए कई तरह के दस्तावेज़ प्रस्तुत करने पड़ते हैं. ट्रेन में सफ़र करना हो किसी दूसरे शहर में होटल में ठहरना हो तो पहचान पत्र की ज़रुरत पड़ती है. आमलोगों के लिए यह पहचान पत्र हासिल करना आसमान से तारे तोड़ लेन के समान है.

सोमवार, नवंबर 14, 2011

आणविक सृष्टि बनाम रासायनिक सृष्टि

जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में कई अवधारणाएं प्रचलित रही हैं. भौतिक भी और आध्यात्मिक भी. भौतिकवाद की अवधारणा मुख्य रूप से डार्विन के विकासवाद पर टिकी है जिसमे पानी के बुलबुले में रासायनिक तत्वों के समन्वय से एककोशीय जीव अमीबा और फिर उससे तमाम जलचरों, उभयचरों, थलचरों और नभचरों की एक लंबी प्रक्रिया के तहत उत्पत्ति और विकास की बात कही गयी है. एक हद तक कोशा (सेल) विभाजन के बाद नर-मादा के अस्तित्व में आने और मैथुनी सृष्टि की बात कही गयी है. यह अवधारणा काफी वैज्ञानिक और विश्वसनीय भी लगती है.
इधर अध्यात्म की दुनिया में नज़र दौडाएं तो विभिन्न धर्मों में जीवन की उत्पत्ति की अवधारणाएं प्रस्तुत की गयी हैं लेकिन सबका सार यह है कि इस सृष्टि और उसमें जीवन की उत्पत्ति एक महाशून्य से हुई है. दुर्गा सप्तसती के प्राधानिकं रहस्यम के मुताबिक त्रिगुणमयी महालक्ष्मी ही पूरी सृष्टि का आदि कारण हैं. वे दृश्य (साकार) और अदृश्य (निराकार) रूप से सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त कर स्थित हैं. उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को शून्य देखकर तमोगुण से चतुर्भुजी महाकाली और सत्वगुण से महासरस्वती को प्रकट किया.इसके बाद उन्हें नर और मादा के जोड़े उत्पन्न करने को कहा. खुद भी एक जोड़ा उत्पन्न किया जिससे ब्रह्मा, विष्णु, शिव नर और लक्ष्मी, सरस्वती और गौरी मादा के रूप में प्रकट हुए. यहां से मैथुनी सृष्टि की शुरुआत हुई. मैथुनी सृष्टि को हम रासायनिक सृष्टि भी कह सकते हैं.
इससे यह परिलक्षित होता है कि मैथुनी सृष्टि के पहले महाशून्य से अमैथुनी सृष्टि हुई थी. महाशुन्य यानी कॉस्मिक रेज. कॉस्मिक रेज से ही परमाणुओं की उत्पत्ति मानी जाती है. या फिर अणुओं तो तोड़ते जाने के बाद अंत में कॉस्मिक रेज या एब्सोल्यूट एनर्जी शेष बचता है. इस एब्सोल्यूट एनर्जी से ही परमाणुओं की उत्पत्ति होती है. इसका सीधा सा अर्थ यह है कि  मैथुनी सृष्टि के पहले आणविक सृष्टि हुई थी या दोनों सृष्टियाँ कुछ समय तक समान रूप से जारी रही थीं. आणविक सृष्टि से उत्पन्न हुए लोग अपने शरीर के परमाणुओं को  इच्छानुसार संगठित या विघटित कर सकते थे. वे मनचाहा आकार या स्वरूप धारण कर सकते थे. उनका व्यक्तित्व भी तीन गुणों सत्व, रज और तम से संचालित होता था लेकिन वे आणविक होने के कारण शक्तिशाली और जीवन मरण के चक्र से परे अर्थात अमर थे. इस वर्ग के जीवों को ही हिन्दू धर्म में देवता और एनी धर्मों में फ़रिश्ता या देवदूत माना गया और सर्वव्यापी बताया गया. तमाम जीवधारी रासायनिक सृष्टि से आणविक सृष्टि में परिणत होने के प्रयास में लगे रहते हैं. यह साधना के जरिये अपनी चेतना को सूक्ष्मतम अवस्था में पहुंचाने के जरिये ही संभव है. तमाम पूजा पद्धतियां इसका मार्ग ही प्रशस्त करती हैं.

-----देवेंद्र गौतम 


(इस अवधारणा पर आपके विचार आमंत्रित हैं)

रविवार, नवंबर 06, 2011

टीम अन्ना को संयम और समन्वय की ज़रूरत

अन्ना हजारे ने अपना ब्लॉग बंद करने का ऐलान किया है. उनकी नाराजगी का कारण उनका पत्र  समय से पहले सार्वजनिक कर दिया जाना है. उनहोंने जिस पत्रकार को ब्लॉग के संचालन का जिम्मा दिया था उसने यह गलती की है. इसे आपसी समन्वय का अभाव और अति उत्साह का नतीजा ही कहेंगे. टीम अन्ना के सदस्य किसी मसले पर आपस में सलाह मश्वरा करना और सार्वजनिक बयान देने अन्ना से बात करने या सोचने समझने की ज़रूरत नहीं समझते. उनहोंने अपने को भ्रष्टाचार विरोध का चैम्पियन और भारतीय जनमानस की आवाज़ मान लिया है. यही कारण है कि वे विवादास्पद बयान जारी कर दे रहे हैं. प्रशांत भूषण कश्मीर पर विचार प्रकट कर पीटाई खा जा रहे हैं तो  अरविंद केजरीवाल जूते का प्रहार झेल रहे हैं. बयान देने के मामले में स्वयं अन्ना भी संयम नहीं बरत रहे. अडवाणी की रथयात्रा के पूर्व उनकी सलाह ठीक ऐसी ही थी. अडवाणी की यह कोई पहली रथयात्रा नहीं थी. यह उनकी राजनैतिक शैली का हिस्सा रही है. यदि वे भ्रष्टाचार के विरोध में रथयात्रा कर रहे थे तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार था. अन्ना को कोई भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का कॉपी राईट नहीं मिल गया है. इस बात को समझना चाहिए.
अन्ना के आंदोलन में जो अपार जनसमूह उमड़ पड़ा था वह इसलिए कि उन्होंने आम जनता के आक्रोश को स्वर दिया था. उनकी छवि साफ़ सुथरी थी और उनके अन्दर परिवर्तन की लम्बी लड़ाई के नेतृत्त्व की क्षमता दिखी थी. लेकिन वे यह बात नहीं समझ पाए कि उनकी लड़ाई बड़े ही भ्रष्ट और शातिर किस्म के लोगों के साथ है जो पल में तोला और पल में रत्ती करने की कला में माहिर हैं. दरअसल टीम अन्ना अपनी प्रारंभिक जीत को पचा नहीं पाई और अति-उत्साह में उल-जुलूल हरकतें करने लगी. कांग्रेस उनके छिद्रान्वेषण में लगी रही और कुछ छिद्र ढूंड भी निकाले. निश्चित रूप से यह सबक सिखाने का अभियान था. इसके जरिये कांग्रेस ने अपने असली चरित्र को ujagar किया. उसने बताया कि काला धन वापस लाने की बात करोगे तो आधी रात को पीटाई होगी और भ्रष्टाचार विरोध करोगे तो तुम्हारी चड्ढी भी उतार फेकेंगे. इस किस्म के लोगों से लड़ने के लिए बड़े धैर्य और कूटनीतिक दक्षता की ज़रूरत होती है. यह माफियाई किस्म के आर्थिक लुटेरों का गिरोह है. इसके हाथ में दानवी ताक़त है. सीधे-सादे लोगों को ये नचाकर फेंक देंगे.
लेकिन यह भी सच है कि अब भारत के लोग राजनीति की माफियाई और मायावी संस्कृति को ज्यादा दिनों तक नहीं बर्दास्त  कर पाएंगे. उन्हें विकल्प की तलाश है. टीम अन्ना यदि विकल्प बन दे पाई तो ठीक नहीं तो कोई दूसरी ताक़त मैदान में आएगी. परिवर्तन की जन-आकांक्षा कोई swaroop तो ग्रहण करेगी ही.

-----देवेंद्र गौतम