शनिवार, सितंबर 24, 2011

कितना कमाते हैं भारतीय मंत्री?


क्या आप जानते हैं कि भारत सरकार के मंत्री कितना कमाते हैं या उनकी संपत्ति किस रफ़्तार से बढ़ती है?
आप कितने भी कल्पनाशील हो जाएँ तो वहाँ तक नहीं पहुँच सकते जो आंकड़े बताते हैं.
प्रधानमंत्री कार्यालय को जो विवरण इन मंत्रियों ने दिए हैं उसी के आधार पर देखें तो मंत्रियों की संपत्ति दो वर्षों में औसतन 3.3 करोड़ बढ़ गई है.
ये सिर्फ़ औसत है. एक मंत्री की संपत्ति तो वर्ष 2009 से 2011 के बीच 1092 प्रतिशत बढ़ गई है. जबकि दो और मंत्रियों की संपत्ति 828 और 705 प्रतिशत बढ़ी है.
जिस एयर इंडिया के पास अपने कर्मचारियों को तनख़्वाह बाँटने के लिए पैसों के लाले पड़े थे उसी विभाग के मंत्री रहे प्रफ़ुल्ल पटेल की संपत्ति 2009 से 2011 के बीच 42.20 करोड़ रुपए बढ़ी है.

सोमवार, सितंबर 05, 2011

झूठ के नामकरण —डॉ अखिलेश बार्चे


पहाँ दादा पायलागी! कैसे हैं. . .? कल जैसे ही दुकान के शुभारंभ का समाचार मिला मन प्रसन्न हो गया। अब आऊँगा तो लडडू ज़रूर खाऊँगा. . .सब आकी कृपा है. . .जी हाँ जी हाँ. . .।"
दूरभाष पर कवि – मित्र की दूर शहर में रहने वाले एक वरिष्ठ कवि से बातचीत हो रही है। कवि मित्र बात करते समय यों झुके हुए थे, मानो चरण स्पर्श करने के बाद रीढ़ सीधी करने का समय ही नहीं मिल पा रहा हो। वास्तव  में वे एक ऐसे सज्जन से बात करने में लगे थे जिनकी पहुँच पुरस्कार/चयन समितियों में अच्छी थी, और जो जुगाड़मेंट के क्षेत्र में माहिर माने जाते थे। कविमित्र को जैसे ही पता लगा कि इन सज्जन के तीसरे बेटे ने एस.टी.डी., पी.सी.ओ., फ़ोटोकॉपी की दुकान खोली है, उन्होंने तुरंत अवसर का लाभ उठाया और दूरसंचार विभाग के तारों पर सवार होकर उनके पाँव छू लिए।

हनुमान किसके हैं —अनुराग वाजपेयी


भगवान राम अयोध्या लौट आए थे। धोबी के कहने पर लोकापवाद के डर से सीता माता को घर से निकाल चुके थे। समय काफी रहता था सो राजकाज में काफी ध्यान देने लगे थे औऱ दरबार देर रात तक चलता रहता था। मर्यादा पुरुषोत्तम का दरबार था इसलिए सब कुछ संयमित रहता था। नीति और आदर्श की बातें होतीं और शिष्ट हास-परिहास चलता रहता। एक दिन अचानक एक अमर्यादित घटना हुई और उसे अंजाम भी दिया राम के परम भक्त हनुमान जी ने। वे तमतमाते हुए आए और बिना अभिवादन किए रामचंद्र जी बोले, ''मैं जा रहा हूँ अब नहीं लौटूँगा ये रखिए त्यागपत्र।

शनिवार, सितंबर 03, 2011

जिस रोज़ मुझे भगवान मिले


जिस रोज़ मुझे भगवान मिले तरुण जोशी

'ना माया से ना शक्ति से भगवन मिलते हैं भक्ति से', एक खूबसूरत गीत है और इसको सुनने के बाद लगा कि अगर मिलते होते तो भी प्रभु हमको मिलने से रहते। क्योंकि माया हमें वैसे ही नहीं आती, शक्ति हममें इतनी है नहीं और भक्ति हम करते नहीं, तो कुल जमा अपना चांस हुआ सिफ़र। लेकिन वो कहते हैं ना कि बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले ना भीख तो एक दिन बिन बुलाए मेहमान से भगवान हम से टकरा ही गए। अब इससे आगे का हाल अति धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत सज्जन और देवियाँ ना पढ़ें, इसको पढ़कर आपके मन के क्षीरसागर में उठने वाले तूफ़ान के हम ज़िम्मेदार नहीं होंगे और हमें गालियाँ देने को उठने वाले उफान के आप खुद ज़िम्मेदार होंगे।
भयानक रात में ट्रैक से लौटते हुए जंगल में जब रास्ता भटक गए तो ऐसी परेशानी में हमेशा की तरह अपने खुदा को सोते से जगाने की गुहार लगाई और तभी एक आदमी हमें दिख गया। साधारण से कपड़े पहने थे उसने, एक दो जगह से हवा आने के लिए कपड़ों में बनाई खिड़कियाँ भी नज़र आ रही थी। मिलते ही हमने कहा, भय्या हम रास्ता भटक गए हैं सही रास्ते पर कैसे आएँ पता हो तो ज़रा बता दो। वो आदमी बोला ठीक है तुम मेरे पीछे-पीछे चलो तुम्हें रास्ता अपने आप मिल जाएगा। उत्सुकता वश जंगल पार करते करते टाइम पास करने की गरज से या अंधेरी रात के सन्नाटे से उठने वाले अपने मन के डर को कम करने के लिए हमने पूछ लिया वो कौन है और इस जंगल में रात के वक्त क्या कर रहा है।

उठो जवानो तुम्‍हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है


उठो जवानो तुम्‍हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है

एक कहावत है, प्याज़ भी खाया और जूते भी खाए. ज़्यादातर लोग इस कहावत को जानते तो हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को ही पता है कि इसके पीछे की कहानी क्या है. एक बार किसी अपराधी को बादशाह के सामने पेश किया गया. बादशाह ने सज़ा सुनाई कि ग़लती करने वाला या तो सौ प्याज़ खाए या सौ जूते. सज़ा चुनने का अवसर उसने ग़लती करने वाले को दिया. ग़लती करने वाले शख्स ने सोचा कि प्याज़ खाना ज़्यादा आसान है, इसलिए उसने सौ प्याज़ खाने की सज़ा चुनी. उसने जैसे ही दस प्याज़ खाए, वैसे ही उसे लगा कि जूते खाना आसान है तो उसने कहा कि उसे जूते मारे जाएं. दस जूते खाते ही उसे लगा कि प्याज़ खाना आसान है, उसने फिर प्याज़ खाने की सजा चुनी. दस प्याज़ खाने के बाद उसने फिर कहा कि उसे जूते मारे जाएं. फैसला न कर पाने की वजह से उसने सौ प्याज़ भी खाए और सौ जूते भी. यहीं से इस कहावत का प्रचलन प्रारंभ हुआ. आज