बुधवार, जून 29, 2011

BBC Hindi - अंतरराष्ट्रीय ख़बरें - गूगल के ज़रिए सेंसरशिप?

भारत सरकार अब धीरे-धीरे अपने हाथ लोकतंत्र के गले की ओर बढ़ा रही है. काला धन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक शब्द भी सुनना नहीं चाहती. जनता के मौलिक अधिकारों का हनन करने पर तुली है. देश दूसरे आपातकाल की ओर बढ़ रहा है. तानाशाही की शुरुआत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के प्रयास के साथ होती है. बीबीसी हिंदी के साईट पर लगी यह खबर बताती है कि यह प्रयास तेज़ होता जा रहा है...


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BBC Hindi - अंतरराष्ट्रीय ख़बरें - गूगल के ज़रिए सेंसरशिप?

मंगलवार, जून 28, 2011

ये इंटरनेट की भाषा है जनाब!

स्कूल की स्पेलिंग क्या होती है? एससीएचओओएल या फिर एसकेयूएल? पहली स्पेलिंग किताबी है और दूसरी इंटरनेट पर प्रचलित यूनिकोड फौंट में ट्रांसलिटरेशन की. इंटरनेट पर किताबी स्पेलिंग नहीं चलती. यह पूरी तरह शब्दों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि पर आधारित होती है. यह पूरी तरह वैज्ञानिक है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर  पर मान्य भी. लेकिन कल रांची के जिला शिक्षा पदाधिकारी की मौजूदगी में एडमिशन टेस्ट के दौरान जब एक बच्ची ने पूछे गए शब्दों की स्पेलिंग इंटरनेट की भाषा के आधार पर बताई तो डीईओ साहब पूरी तरह उखड गए. उन्होंने शिक्षकों को बेतरह फटकार लगायी.

सोमवार, जून 27, 2011

सोनिया गांधी की यात्रा का खर्च 1850 करोड़


(यह मेल के जरिये मिली जानकारी है. इसे ज्यों का त्यों ब्लॉग कर लिया है. क्लिक करके पूरा पोस्ट पढ़ें. दंग रह जायेंगे.)

इतना खर्चा तो प्रधानमंत्री का भी नहीं है : पिछले तीन साल में सोनिया की सरकारी ऐश का सुबूत, सोनिया गाँधी के उपर सरकार ने पिछले तीन साल में जीतनी रकम उनकी निजी बिदेश यात्राओ पर की है उतना खर्च तो प्रधानमंत्री ने भी नहीं किया है ..एक सुचना के अनुसार पिछले तीन साल में सरकार ने करीब एक हज़ार आठ सौ अस्सी करोड रूपये सोनिया के विदेश दौरे के उपर खर्च किये है ..कैग ने इस पर आपति भी जताई तो दो अधिकारियो का तबादला कर दिया गया .


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लो आपका देश बेचने निकले हम क्या कर लोगे ?

भ्रष्टाचार: पूंजीवादी लोकतंत्र का सह उत्पाद

बाबा रामदेव अभी विदेशी बैंकों में जमा काला धन की वापसी को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये हुए हैं तो अन्ना हजारे एक सशक्त लोकपाल बिल के लिए सर पर आसमान उठाये हुए हैं. सवाल यह है कि खुदा न ख्वाश्ते यह दोनों अपनी जंग को जीत लेते हैं तो क्या सरे नज़ारे बदल जायेंगे ?...भ्रष्टाचार पर रोक लग जाएगी और काले धन की सल्तनत पूरी तरह ख़त्म हो जाएगी ?....हम आप क्या खुद बाबा रामदेव और अन्ना हजारे भी दिल पर हाथ रखकर यह गारंटी नहीं दे सकते. सच यह है कि उनके आंदोलन से जनता में जागरूकता आ सकती है लेकिन समस्या का निदान नहीं हो सकता. भ्रष्टाचार तो दरअसल पूंजीवादी लोकतंत्र की व्यवस्था का सह उत्पाद है. और काला धन हमारी अर्थ व्यवस्था की नसों में दौड़ता लहू. दुनिया का ऐसा कौन सा पूंजीवादी लोकतंत्र की व्यवस्था से संचालित देश है जहां काले धन और भ्रष्टाचार का संक्रामक रोग मौजूद नहीं है. यह एक लाइलाज रोग है. जब तक यह व्यवस्था रहेगी रोग भी रहेगा. इसके संक्रमण का प्रतिशत घट बढ़ जरूर सकता है. 
सत्ता के शीर्ष पर बैठे महानुभावों से लेकर से आम आदमी तक जिधर भी  नज़र दौडाएं हर जगह काले धन और भ्रष्टाचार की भूमिका दिखाई पड़ेगी.एक विधायक या सांसद चुनाव के दौरान करोड़ों रुपये फूंक देता है. चुनाव आयोग ने भी खर्च की जो सीमा निर्धारित की है उसे जुटा पाना किसी ईमानदार सामाजिक कार्यकर्त्ता के बूते के बाहर है. क्या यह पैसा आयकर जमा किया हुआ या प्रत्याशी की मेहनत की कमाई का होता है..?  कहां से आता है यह पैसा...? पार्टी देती है तो उसके पास इसके आगमन का स्रोत क्या होता है. प्रत्याशी यह जानते हुए भी कि जीत जाने के बाद वेतन और भत्ते के रूप में प्रतिमाह लाख-डेढ़ लाख तक मिलेंगे और हार जाने पर पैसा पानी में चला जायेगा, खुले हाथ खर्च करता है. आखिर किस भरोसे वह जुए पर दावं लगता है.. वेतन और भत्ते के जरिये तो पांच साल के कार्यकाल में वह चुनाव खर्च भी नहीं निकाल पायेगा. फिर वह क्या सोचकर इतना खर्च करता है निश्चित रूप से सेठ-साहूकार और काले बाजार के गोरे खिलाडी ही उसे चुनाव लड़ने के लिए मोटा चंदा देते हैं.. वे किस उम्मीद पर ऐसा करते हैं...? जाहिर है कि कोई व्यापारी घाटे का सौदा नहीं करता. बस यहीं से रचे जाने लगते हैं घोटालों के चक्रव्यूह. लोकतान्त्रिक व्यवस्था में चुनाव तो होंगे ही और हर चुनाव में तैयार होगी  भ्रष्टाचार के एक नए खेल की भूमिका. यह कारनामे व्यवस्था को समाजसेवा की दिशा में कैसे ले जा सकते हैं.
अब जरा अपने आसपास के किसी निम्न मध्यवर्गीय परिवार पर निगाह डालें.बच्चे के जन्म से लेकर बूढ़े की मृत्यु तक रीति-रिवाजों, पर्व त्योहारों  की एक लंबी फेहरिश्त उसके सामने होती है. हर मौके के लिए उसे धन का संग्रह करना होता है. यह धन मासिक वेतन से जुटाना मुश्किल होता है. इसे पूरा करने के लिए वह टेबुल के नीचे की संभावनावों की ताक में रहता है. यह निचले स्तर के भ्रष्टाचार की भूमिका तैयार करता है.यह तमाम सामाजिक आयोजन उस ज़माने में सृजित किये गए थे जब भारत सोने की चिड़िया हुआ करता था. वह सामंती व्यवस्था का दौर था जिसकी कुछ खामियां थीं तो कुछ खूबियां भी थीं. उस ज़माने में सामूहिकता की भावना बहुत गहरी थी. किसी गरीब की बेटी की शादी हो रही हो तो बारात का बेहतर ढंग से स्वागत करना पूरे गांव की प्रतिष्ठा का मामला होता था. उस गांव का हर परिवार अपनी हैसियत के मुताबिक संबंधित परिवार की मदद करता था. कहीं कोई कमी नहीं होने दी जाती थी. तमाम पर्व त्यौहार और सामाजिक आयोजन गांव की शान दिखाने का अवसर होते थे. महंगे और खर्चीले होने के बावजूद यह किसी व्यक्ति या परिवार पर बोझ नहीं होते थे.  आज के समाज में सामूहिकता की भावना का पूरी तरह लोप हो चुका है. अब बेटी की शादी किसी गांव, टोले या मोहल्ले की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनती, यह संबंधित परिवार की अपनी जिम्मेवारी, अपनी हैसियत की बात होती है. जाहिर है कि बेटी का बाप अपना पेट काट-काटकर दहेज़ के पैसे जुटाएगा. लेकिन सरकारी तंत्र यदि उसे ठीक से पेट भरने की भी इजाजत नहीं देगा तो वह धन के आगमन के गैरकानूनी रास्तों की तलाश करेगा. उसकी यह ज़रूरत भी काले धन से ही पूरी होगी, समृद्ध घरानों में भी आयकर जमा कर जुटाई गई रकम इन मौकों के लिए नहीं होती. शायद ही कोई करदाता सामाजिक प्रयोजनों के खर्च को अपने रिटर्न में दर्शाता हो. यानी राजनैतिक ही नहीं सामाजिक व्यवस्था भी काले धन की बुनियाद पर खड़ी है.
पूंजीवादी लोकतंत्र की इस महाव्याधि को अब दवा की नहीं शल्य चिकित्सा की दरकार है.एक नई शासन व्यवस्था की जरूरत है. चाहे उसका जो भी स्वरुप हो. बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे लोग यदि समस्या की जड़ पर प्रहार करने की रणनीति बनाते तो एक नए इतिहास की रचना करते.

-----देवेंद्र गौतम      

रविवार, जून 19, 2011

इंटरनेट मीडिया का बढ़ता दायरा

 मन की भावनाओं की अभिव्यक्ति और सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए हमेशा किसी माध्यम की ज़रूरत पड़ती है. यह माध्यम मानव संस्कृति के विकास के साथ-साथ नए-नए रूप ग्रहण करता है. हाल के वर्षों में जन  माध्यम  के रूप में सबसे मजबूती के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराइ है इंटरनेट मीडिया ने. अन्ना हजारे के अनशन के दौरान व्यापक जन समर्थन जुटाने में फेसबुक, ट्यूटर जैसे सोशल नेटवर्किंग साईट्स की अहम् भूमिका रही. जंतर मंतर पर अनशन शुरू होने से पहले  ही इंडिया अगेंस्ट करप्सन ओअर्गी नामक वेबसाईट     पर ही 10 लाख से ज्यादा लोग समर्थन प्रदान कर चुके थे. बाबा रामदेव के आंदोलन में व्यापक समर्थन इंटरनेट के रास्ते ही जुटा. अन्ना हजारे के अनशन के पहले तीन दिन में ही 8 लाख से अधिक लोगों ने ट्यूटर पर 44 लाख से अधिक त्विट्स किये थे. निश्चित रूप से बाबा रामदेव को अन्ना की तरह समर्थन नहीं मिला लेकिन    इंटरनेट ने अपनी ताकत  का अहसास तो दिलाया  ही. 
     कुछ वर्ष पहले प्रिंट मीडिया अभिव्यक्ति का सबसे पोपुलर माध्यम हुआ करता था. लोग सुबह का अखबार देखने के लिए बेचैन रहते थे. इसके बाद इलेक्ट्रोनिक मीडिया सूचना क्रांति का नया अलमबरदार बनकर उसके मुकाबले सामने आया. लोग बुद्धू बक्से में घर बैठे पूरी दुनिया की घटनाओं को देखने और सुनने लगे. यह अलग बात है की  उसके अंदर कुछ अति उत्साही पत्रकार आ गए और टीआरपी बढ़ने के लिए   सनसनी फैलाना उनका उद्देश्य बन गया. इसके कारण वे वह विश्वसनीयता हासिल नहीं कर सके जो प्रिंट को हासिल है. 
            लेकिन प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक मौजूदा दौर में अधिकांश मीडिया हाउसों का स्वामित्व पूंजीपति घरानों के पास है. आमलोग इसके उपभोक्ता मात्र हैं. इनके जरिये आमजन की  भावनाओं की अभिव्यक्ति  एक सीमा तक ही सम्भव है. उनका पहला उद्देश्य अपने व्यावसायिक हितों की रक्षा होता है. आम जनता तक सही सूचना पहुंचाना अधिकांश पूंजीपति घरानों का मुख्य उद्देश्य नहीं होता. ऐसी सूचनाएं जिनसे उनके या उनके हितैषियों के हित बाधित होते हैं, उन्हें तोड़ने-मरोड़ने का निर्देश देने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता. उनके हॉउस में काम करने वाले पत्रकार ऐसे मौकों पर  मन मसोस कर रह जाते हैं. नौकरी करनी है तो प्रबंधन की शर्तों पर करनी होगी वर्ना आपकी कोई ज़रुरत नहीं. यही नहीं अख़बारों को अपने विज्ञापन दाताओं के हितों का भी ध्यान रखना होता है. इस चक्कर में भी सूचनाओं को तोडना-मरोड़ना या छुपाना, गलत ढंग से पेश करना पड जाता है. बाबा रामदेव के अनशन के दौरान अगर आप टीवी पर लाइव टेलीकास्ट देख रहे होंगे तो आपने गौर किया होगा कि देर रात पुलिस के हमले के बाद सुबह होते ही सभी खबरी चैनलों की भाषा बदल गयी थी. कुछ  परदे में और कुछ पूरी बेशर्मी के साथ यह साबित करने का प्रयास कर रहे थे कि बाबा के समर्थक उग्र और हिंसक हो गए थे और पुलिस को मजबूर होकर अश्रु गैस का इस्तेमाल करना पड़ा या लाठी चार्ज करना पड़ा या हवाई फायरिंग करनी पड़ी. कुछ ने तो हवाई फायरिंग की बात को भी एक सिरे  से नकारने की कोशिश की बावजूद इसके कि लाइव टेलीकास्ट में रायफल से गोली निकलने का दृश्य कई बार दिखलाया जा cहुका था. आखिर पुलिस की बर्बरता को सही ठहराने के प्रयास के पीछे क्या था. इसे आसानी से समझा जा सकता है. मैं मीडिया के अंदर के खेल के विस्तार में नहीं जाना चाहता सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि आप प्रिंट या इलेक्ट्रोनिक मीडिया के जरिये अपनी बातों को खुलकर नहीं रख सकते.
                 इंटरनेट एक सस्ता और सशक्त माध्यम के रूप में सामने आया है. आप मुफ्त में अपना मेल आईडी बना सकते हैं. सोशल वेब साईट्स पर अपना अकाउंट खोलकर अपनी बात व्यापक लोगों तक पहुंचा सकते हैं. अपना ब्लॉग शुरू कर सकते हैं. थोडा पैसा खर्च करें तो अपना वेबसाईट शुरू कर सकते हैं और उसे अपनी आमदनी का जरिया भी बना सकते हैं. आज भारत  में इंटरनेट युजर्स  की संख्या 10 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है. निश्चित रूप से अभी भी उसकी पहुँच  किसी पूरी दुनिया में ब्लोग्स और वेब साइट्स ने जोर पकड़ा. भारत में तहलका डाट कॉम ने और अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर विकीलिक्स ने बड़े-बड़े खुलासे कर पूरी दुनिया को चौंका दिया. मीडिया जगत की गलत प्रवृतियों को भड़ास फोर मीडिया डाट कॉम जैसे साइट्स ने खुलकर उजागर किया. आज भड़ास के समर्थकों की संख्या हजारों में पहुंच चुकी है. आप मुफ्त में अपना ब्लॉग बना सकते हैं और चंद सेकेंडों में अपनी बात पूरे विश्व तक पहुंचा सकते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लेखक, मुद्रक, प्रकाशक, प्रबंधक सबकुछ आप स्वयं होते हैं. आपको अपनी बात कहने से कोई नहीं रोक सकता. आप बहुत मामूली खर्च कर अपने ब्लॉग के लिए अलग डोमेन नेम रजिस्टर्ड करा सकते हैं. अपना अलग अभी अंग्रेजी और दूसरी विदेशी भाषाओँ के वेब साइट्स और ब्लोग्स की संख्या करोड़ों में है तो हिंदी में भी उनके विकास की गति काफी तेज़ है. हिंदी ब्लोग्स 10 हजार का आंकड़ा पार कर चुके हैं. हिदी वेब साइट्स, वेब पत्रिकाओं और पोर्टल्स की संख्या भी लाखों में है. हिंदी के ब्लोग्स अभी व्यावसायिक रूप नहीं ले सके हैं लेकिन इस और तेज़ी से बढ़ रहे हैं. गूगल की विज्ञापन प्रदाता एजेंसी एडसेन्स ने अभी तक हिंदी इंटरनेट पर हिंदी को मान्यता प्राप्त भाषाओँ की सूची में शामिल नहीं किया है लेकिन कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय  विज्ञापन एजेंसियों ने हिंदी को सपोर्ट करना शुरू किया है और आनेवाले चार-पांच वर्षों में उम्मीद की जाती है कि ब्लोगिंग का काम एक स्वतंत्र रोजगार का रूप ले लेगा. इस मीडिया में सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें लागत इतनी
मामूली है कि कोई भी इसे शुरू कर सकता है.
                          सरकार इंटरनेट पत्रकारिता के खतरे के प्रति असावधान नहीं है. हाल में उसने एक ऐसा कानून बनाया है जिसके जरिये वह जब चाहे किसी भी वेब साईट को ब्लॉक कर सकती है. लेकिन वह आपको तुरंत दूसरा साईट खोलने से रोक तो नहीं सकती. विभिन्न देशों की सरकारें चाहकर भी जब अश्लील साईट्स को ब्लॉक नहीं करा सकीं  तो जनता  की आवाज़  को कैसे ब्लॉक  करा सकेंगी. इस  माध्यम का नियंत्रण किसी सरकार के हाथ में नहीं है. मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि आनेवाले वर्षों में इंटरनेट मीडिया सबसे सशक्त मीडिया के रूप में उभरकर सामने आएगा . यही भविष्य का माध्यम बनने जा रहा है जिसके संकेत अभी से दिखाई दे रहे हैं.   


----देवेंद्र गौतम 


रविवार, जून 12, 2011

काले धन का समाजशास्त्र

बाबा रामदेव कौमा की स्थिति में पहुंचने के बाद काफी  मुश्किल  से  अपना अनशन तोड़ने को तैयार हुए . सरकार को उनकी कोई चिंता नहीं रही. रामलीला मैदान से उनके साथ उनके समर्थकों को क्रूरता पूर्वक खदेड़ने के बाद कांग्रेस को उनके जीने मरने से  कोई फर्क नहीं पड़ा. बाबा पूर्ववत अनशन पर हैं या नहीं, इससे कांग्रेसियों को कुछ भी  मतलब नहीं.आर्ट ऑफ लिविंग के गुरु श्री श्री रविशंकर अनशन तुडवाने के प्रयास में लगे और अंततः सफल हुए. निश्चित रूप से बाबा रामदेव को इस बात का अहसास होगा कि एक अनशन के जरिये विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस नहीं लाया जा सकता. इसमें हठयोग से समाधान नहीं निकलनेवाला. यह एक लम्बी प्रक्रिया है. अनशन और अनशनकारियों के साथ सरकार के बर्बर व्यवहार से सरकार का चेहरा ज़रूर बेनकाब हो गया. देशवासियों तक यह सन्देश चला गया कि मौजूदा सरकार की काले धन को वापस लाने में कोई दिलचस्पी नहीं है. वह काले धन के खाताधारियों के बचाव के लिए किसी सीमा तक जाने को तैयार है. जाहिर है कि विदेशी बैंकों में जमा की गयी राशि इनके करीबी लोगों की है. उनके बचाव के लिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल करने में उसे कोई परहेज नहीं है. यह भी स्पष्ट हो गया कि अब वह लोकतान्त्रिक और अहिंसक आंदोलनों से इसी तरह निपटेगी क्योंकि लोकलाज को त्यागकर इनसे निपटा जा सकता है. उग्रवादियों और आतंकवादियों से उसे परेशानी नहीं है क्योंकि वे भ्रष्टाचार या काले धन का विरोध नहीं करते उन्हें लेवी देकर कुछ भी किया जा सकता है. बल्कि उग्रवादी गतिविधियां तो विकास योजनाओं की राशि से ही चल रही हैं. अधिकारी माओवादियों को लेवी देकर उसकी जितनी भी बंदरबांट करें कोई अंतर नहीं पड़ता. भ्रष्टाचार में भागीदारी कर हिंसक-अहिंसक कोई भी आन्दोलन चले सरकार को परेशानी नहीं है. लेकिन काले धन को वापस लाने की जिद ...भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की मांग....यह तो वर्तमान राजनैतिक संस्कृति के विरुद्ध है. 
               बाबा को यह बात समझनी चाहिए की मौजूदा व्यवस्था ही काले धन धन पर आधारित है. उसका सिर्फ अर्थशास्त्र ही नहीं एक समाजशास्त्र भी है. आज का भारतीय समाज गुणों की नहीं ऐश्वर्य की पूजा करता है.  दौलतमंद लोगों के प्रति अधिकांश लोगों के मन में श्रद्धा का भाव रहता है. उसे दौलत इकट्ठा करने के तरीकों से कोई मतलब नहीं रहता. हर शहर हर गांव में चोर, लुटेरे, कालाबाजारिये, तस्कर, घुसखोर, दलाल, माफिया श्रेणी के लोग समाज के सबसे सम्मानित लोगों में शुमार होते हैं. सामाजिक, सांस्कृतिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर आर्थिक सहायता देने के कारण इनकी अहमियत ज्यादा रहती है. बच्चे की छठी से लेकर शादी-व्याह और श्राद्ध तक के सामाजिक कार्यक्रम, रीति-रिवाज़  इतने खर्चीले हैं कि मेहनत के पैसों से उन्हें संपन्न कर पाना कठिन होता है. इसीलिए हर व्यक्ति ऊपरी कमी के रस्ते तलाशता रहता है. राजनैतिक क्रियाकलाप भी काले धन से ही चलते हैं. यदि बुरा न मानें तो एक कडवी सच्चाई यह है कि स्वयं बाबा रामदेव को जो दान में मोटी रकमें मिलती हैं वह कला बाज़ार से ही आती हैं. मेहनत से कमाया हुआ पैसा दान में दिया ज़रूर जाता है लेकिन वह सौ या हज़ार में हो सकता है, लाख या करोड़ में नहीं. तो देश में काले धन का बाज़ार चलता रहे लेकिन उसे विदेश नहीं जाने दिया जाये और जो चला गया उसे वापस ले आया जाये इस नीति से भारतीय समाज में कौन सा क्रन्तिकारी बदलाव आ जायेगा, समझ से परे है. कोशिश यह होनी चाहिए कि राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में काले धन की भूमिका कम से कम होती जाये. यह काम मौजूदा व्यवस्था में संभव नहीं है . दरअसल शासन तंत्र  तो बदलता  रहा  लेकिन मध्ययुगीन  सामंती युग  के सामाजिक मूल्य अपनी जगह बने  रहे.   
              अभी अन्ना हजारे, बाबा रामदेव जैसे लोग या भाजपा, आरएसएस जैसे  संगठन इसी व्यवस्था में सुधर  की मांग  कर  रहे  हैं. आमूल परिवर्तन  की बात लोकनायक  जयप्रकाश  नारायण  ने  की थी  लेकिन  अपनी  बात को पूरी तरह स्पष्ट करने  के पहले ही दुनिया से चले गए. फिलहाल व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की बात किसी मंच से नहीं हो रही है. नक्सली और माओवादी भी एक काल्पनिक दुनिया में विचरण करते हुए एक आयातित व्यवस्था की बात सैद्धांतिक रूप से करते हैं लेकिन व्यवहार में मात्र एक अराजक फ़ोर्स बनकर रह गए हैं. वे काले धन में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं रोक नहीं.
               जहां तक विदेशी बैंकों में जमा काले धन की वापसी की बात है इसके दो ही तरीके हो सकते हैं. पहला- कड़ा कानून बनाकर, सम्बंधित देशों को उनकी  भाषा में समझा कर. यानी कानून के डंडे से हांककर, दूसरा   कानून को लचीला  बनाकर. ध्यान देने की बात यह है कि देश के अंदर भी एक बड़ी राशि काले धन के रूप में दबी पड़ी है. व्यावहारिक तरीका यह है कि लोगों को आयकर जमाकर देश या विदेश जहां भी धन हो उसे भारतीय  बैंकों में रखने  की छूट दी  जाये और धन के स्रोत के बारे में कोई सवाल नहीं पूछे जाने का वचन दिया  जाये. बैंकिंग नियमों को भी थोडा लचीला बनाया  जाये.जहां तक काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की बात है यह पूरी तरह अव्यवहारिक है. जब तक इसकी घोषणा होगी और अमली जामा पहनाया जायगा तबतक कालाधन के स्वामी बैठे तो नहीं रहेंगे. धन कहां से कहां से पहुंच जायेगा पता भी नहीं चलेगा. लचीला रुख अपनाकर ही काले धन को प्रचालन  में लाया जा सकता  है. अन्यथा सांप निकल जायेगा लकीर पीटते रह जायेंगे.
     बहरहाल बाबा को हठयोग या बालहठ त्यागकर कालेधन के समाजशास्त्र पर विचार करते हुए ही अपनी रणनीति तय करनी चाहिए. मान-अपमान की भावनाओं से ऊपर उठकर.

---देवेंद्र गौतम

( मेरी बातों  से यदि असहमति  हो तो अपनी बात खुलकर रखें, आपके तर्कों का स्वागत है.)  

मंगलवार, जून 07, 2011

सपेरा बनते फिर सांप के बिल में हाथ डालते बाबा

जीवन में अनुभव का बड़ा महत्व होता है. अन्ना हजारे ने जब जंतर-मंतर पर आमरण अनशन किया था तो उसमें  सक्रिय सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में जनांदोलनों में लम्बे समय तक भागीदारी से मिले अनुभवों की झलक थी. उनकी अपनी छवि भी इसके अनुरूप थी. वह एक सुनियोजित कार्यक्रम था. सरकार से वार्ता के लिए चार लोग अधिकृत किये गए थे. राजनैतिक दलों के नेताओं को कार्यक्रम से दूर रखा गया था. कार्य विभाजन कर जिम्मेवारियां वितरित की गयी थीं. कार्यक्रम में पूरी तरह पारदर्शिता का निर्वहन किया गया था. बाबा रामदेव की सभा में पुलिस ने जिस बर्बरता का तांडव किया वह हैवानियत का चरम प्रदर्शन था. यूपीए सरकार का अक्षम्य अपराध. लेकिन यह सच है कि एक योग गुरु से आन्दोलनकारी नेता के रूप में अपने व्यक्तित्व के रूपांतरण में बाबा चूक गए. पुलिस के दमन पर उतरने के बाद अपने हजारों समर्थकों को उनके हाल पर छोड़कर उनका आयोजन स्थल से भाग खड़े होना अपरिपक्वता का परिचायक था. जब कमांडर ही मैदान छोड़ देगा तो सेना का क्या होगा. उन्हें अपनी जान की परवाह किये बिना स्थिति का पूरे साहस के साथ मुकाबला करना चाहिए था. ज्यादा से ज्यादा यही होता कि सरकार के इशारे पर उनकी हत्या कर दी जाती. लेकिन यदि ऐसा होता तो पूरे देश में इसकी जो प्रतिक्रिया होती उसे संभालने की ताक़त कम से कम मौजूदा सरकार में नहीं थी. उसका सत्ता में बने रहना कठिन हो जाता. ऐसा लगता है कि जनांदोलनों के अनुभवी और अभ्यस्त सिविल सोसाइटी के लोगों से उनहोंने इस कार्यक्रम के संबंध में कोई विचार-विमर्श नहीं किया.   
                       दूसरी बात यह कि सरकार के साथ यदि कोई लिखित समझौता हुआ था तो उसकी जानकारी सार्वजानिक करनी चाहिए थी. अनशन स्थल पर मौजूद लोगों को उसकी जानकारी देनी चाहिए थी. उसे जाहिर नहीं करना पारदर्शिता को संदिग्ध बना गया. सरकारी तंत्र की ओर से इसका खुलासा होने के बाद इसके औचित्य को सिद्ध करने के लिए जो भी तर्क गढ़े गए उनका कोई अर्थ नहीं है. 
                        योग और आंदोलन के बीच एक लक्ष्मण रेखा ज़रूर होना चाहिए था. अनशन का कार्यक्रम घोषित था तो फिर रामलीला मैदान की बुकिंग में आयोजन का उद्देश्य योग शिविर बताने की कोई जरूरत नहीं थी. जब दिल्ली में धरना के लिए जंतर-मंतर घोषित स्थल है तो यह आयोजन वहीं होना चाहिए था. रामलीला मैदान का इस निमित्त उपयोग नहीं करना चाहिए था. उपस्थित होने वाले लोगों की संभावित संख्या में इतना अंतराल नहीं रखना चाहिए था. इन त्रुटियों के जरिये दरअसल उन्होंने सरकार को दमन का बहाना दे दिया.
                        राजनीति को समझने वाले लोग किसी भी क्रिया की संभावित प्रतिक्रिया का अनुमान लगा लेते हैं और उसके लिए मानसिक तयारी कर लेते हैं. बाबा को कहीं ना कहीं यह भ्रम था कि पूरे देश में उनके अनुयायियों  की तादात देखने और प्रति लोगों सम्मान की भावनाओं को देखते हुए सरकार उनपर हाथ नहीं डाल सकेगी. पुलिस की दमनात्मक कार्रवाई उनकी कल्पना से परे थी. वे इसके लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थे. 
                         एक योगी राजनीति नहीं कर सकता ऐसा कत्तई नहीं है. लेकिन इस प्लेटफार्म को समझना और उसके तकाजों के अनुरूप आचरण करना पहली शर्त है. सांप के बिल में हाथ डालने के पहले एक सपेरे के तमाम गुर सीखने होते हैं. डसना तो सांप का स्वाभाविक गुण है. उसके बिल में हाथ डालेंगे तो वह डसेगा ही. उससे बचने का, उसके विष को असरहीन कर देने का तरीका सीखना होता है. बाबा ने इसकी अहमियत नहीं समझी. इसी का नतीजा उन्हें झेलना पड़ा.  
------देवेंद्र गौतम   
  

रविवार, जून 05, 2011

गांधी के असली हत्यारे

रामलीला मैदान की घटना ने यह साबित कर दिया कि विदेशी बैंकों में काला धन रखने वाले भारतीय खाताधारी काफी ताक़तवर हैं. वे अब जन आंदोलनों की धार को को बर्दाश्त  करने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं. उनकी सत्ता पर मज़बूत पकड़ है और वे दमनचक्र की किसी सीमा तक जा सकते हैं. ठीक उसी तरह जैसे पूर्व जमींदारों ने जमींदारी उन्मूलन कानून बनने के बाद भी भूमि सुधार कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाने के सरकारी प्रयासों को अभी तक सफल नहीं होने दिया. अपने काले धन पर मंडराते खतरे से वे निपटने के लिए निर्दोष लोगों का खून बहाने में उन्हें कोई परहेज़ नहीं है. यह बात भी साफ़ हो गयी कि महात्मा गांधी का वास्तविक हत्यारा नाथूराम गोडसे नहीं बल्कि वह पार्टी और उसके नेतृत्व में बैठे तानाशाही प्रवृति के वे भ्रष्ट और अराजक तत्व हैं जिन्हें  उन्होंने आज़ाद भारत के निर्माण की जिम्मेवारी सौंपी थी. गोडसे ने तो गांधी जी के पार्थिव शरीर का अंत किया था. उनके उत्तराधिकारी उनकी आत्मा की हत्या करने पर तुले हुए हैं. वह भी सिर्फ अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए. गांधी ने सत्याग्रह को अमोघ अस्त्र बनाया था. उनके शिष्य आज उसकी धार को कुंद और निरर्थक बनाने पर तुले हैं. वे गांधी की भाषा सुनने को तैयार नहीं हैं. 
                 रामलीला मैदान में बाबा रामदेव का अनशन अहिंसक और शांतिपूर्ण था. उनकी मांगें राष्ट्रहित में  थीं. उनके समर्थक किसी राजनैतिक दल के कार्यकर्त्ता नहीं बल्कि भारतीय समाज के आमलोग थे जो पूरे परिवार के साथ अनशन स्थल पर एकत्र हुए थे. वे रात के वक़्त पंडाल में सोये हुए रहे कि उनपर दिल्ली पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के लोगों ने कहर बरपाना शुरू कर दिया. निश्चित रूप से वे काले धन के स्वामियों के लठैत की भूमिका निभा रहे थे. उग्रवादियों और आतंकवादियों के सामने भीगी बन जाने वाले लोगों ने बच्चों और महिलाओं पर अपनी बहादुरी आजमाई. वे तो बाबा रामदेव की हत्या कर देने की तैयारी में थे लेकिन किसी तरह बाबा की जान बच गयी. घटना के बाद बाबा के संबंध में विरोधाभाषी बयान देकर पुलिस के आला अधिकारी ने यह संकेत दे दिया कि उनकी नीयत साफ़ नहीं थी. अब सरकार लाख सफाई दे लेकिन इस बात को कोई मानने को तैयार नहीं होगा कि बाबा रामदेव जैसे लोकप्रिय संत और इतने बड़े जन-समूह पर जानलेवा हमला करने का फैसला दिल्ली पुलिस ने सरकार के इशारे के बिना लिया होगा. गोविंदाचार्य ने कहा है कि इस अनशन को लेकर कांग्रेस में दो गुट हो गए थे. एक गुट समझौता करने के पक्ष  में था तो दूसरा पक्ष कड़ी कार्रवाई कर बाबा को सबक सिखाने पर अडिग था. सबक सिखाने के पक्षधरों का पलड़ा भरी था इसलिए भावी परिणाम की परवाह  किये बिना इस क्रूरतापूर्ण कार्रवाई को अंजाम दिया गया.
                       दरअसल उग्रवाद और आतंकवाद के दीर्घकालीन तांडव के बाद जंतर-मंतर में अन्ना हजारे के अनशन ने गांधी के सत्याग्रह की ताक़त का अहसास कराया था. उस वक़्त भ्रष्टाचार के संरक्षकों ने मामले को किसी तरह शांत करने की नीति अपनाते हुए उनकी मांगें मान ली थीं. फिर अनशन समाप्त होते ही सिविल सोसायटी के सदस्यों के विरुद्ध दुष्प्रचार अभियान छेड़ दिया था. अब बाबा रामदेव ने जब विदेशी बैंकों से काले धन की वापसी के मुद्दे को लेकर अनशन का ऐलान किया तो काले धन के खातेधारियों को सत्याग्रह के अस्त्र से खतरा महसूस होने लगा. इसकी थोड़े-थोड़े अंतराल पर पुनरावृति का भय सताने लगा और इसबार इससे निपटने के लिए अलग नीति अपनाई. इसबार समझौता वार्ता के दरमियान ही दुष्प्रचार अभियान चलाया और इसके बाद आमजन को ऐसे कार्यक्रमों से दूर रखने के लिए क्रूर दमनचक्र चलाया. पार्टी और सरकार की चाहे जितनी भद पिटी हो लेकिन अहिंसक आंदोलनों से आमजन को दूर रखने की अपनी कोशिश को अंजाम दे दिया. किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के हितों की रक्षा के लिए पूरे संगठन की छवि को दांव पर लगाने की यह एक आत्मघाती कार्रवाई थी.
                        पार्टी 1975 के आपातकाल का माहौल बनाने पर तुली है. लेकिन उसे इस बात का अहसास नहीं कि उस वक़्त के और आज के नेतृत्व में ज़मीन आसमान का फर्क है. आज उसके पास ऐसा कोई चमत्कारी नेता नहीं जो पार्टी को धराशायी होने के बाद पुनः पूरी मजबूती के साथ खड़ा कर सके या तानाशाही को थोड़े समय के लिए भी अपने कुकृत्यों की ढाल बना सके.गांधी की आत्मा जाग चुकी है और उसे मार पाना आसान नहीं है. उनका अस्त्र कुंद होने वाला नहीं. देश पर तानाशाही लादने के मंसूबे पालने वाले इतिहास के किस कोने में दफ्न हो जायेंगे उन्हें पता भी नहीं चलेगा.    

-----देवेन्द्र गौतम     

शनिवार, जून 04, 2011

तालाब के बाहर पनडुब्बे

बचपन में तालाब किनारे जाने से हमें यह कहकर रोका जाता था कि इसके अन्दर पनडुब्बे  रहते हैं जो तालाब किनारे खड़े लोगों को पानी के अंदर खींच ले जाते हैं और डुबाकर मार डालते हैं. फिर मरनेवाला भी पनडुब्बा बन जाता है. पनडुब्बा का मतलब होता था तालाब में डूबकर मरे हुए लोगों का प्रेत. जब भी तालाब के पानी में डूबकर किसी की मौत होती थी हमें वह पनडुब्बा का ही कारनामा लगता था.
                     आज उम्र के पांच दशक पार करने के बाद मुझे लगता है कि अब पनडुब्बे तालाब के बाहर निकल आये हैं और इंसानों के बीच रहने लगे हैं. जरा सी असावधानी बरतने पर वे किसी की भी लुटिया  डुबो देते हैं और डूबने वाले का उबर पाना मुश्किल हो जाता है. मेरे एक परिचित हैं. अभी वे करोड़ों के क़र्ज़ में डूबे हुए हैं. लेकिन उन्हें इसका कोई अफ़सोस नहीं है. वे नया क़र्ज़ लेने को हमेशा तैयार रहते हैं. नया कर्ज लेकर पुराना कर्ज चुकाना उनका शगल रहा है. वे अपने तमाम रिश्तेदारों और ईष्ट-मित्रों की लुटिया डुबा चुके हैं. किसी न किसी बहाने उनकी सारी जमा पूंजी लेकर उन्हें पैसे-पैसे का मोहताज बना चुके हैं. खुद भी फटक-सीताराम हैं. उनकी पत्नी तक नहीं जानती कि इतने सारे पैसों का उन्होंने किया क्या. उनके पास हमेशा कुछ ज़मीन के कागजात और रियल स्टेट के कुछ लाभदायक प्रोजेक्ट होते हैं. उन्हें सिर्फ पता चल जाये कि फलां साहब के पास पैसे हैं तो वे उनके ईर्द-गिर्द चक्कर लगाना शुरू कर देंगे. उन्हें किसी प्रोजेक्ट में पैसा लगाकर भारी मुनाफा कमाने का प्रस्ताव देंगे. उससे जितने पैसे लेंगे गारंटी के तौर पर उतने का पोस्टडेटेड चेक भी काटकर दे देंगे. पैसा निकलने तक उससे दिन रात फोन से बात करते रहेंगे. सुबह-शाम मिलते रहेंगे. जब पैसा मिल जायेगा तो फिर मुलाकात और बात का सिलसिला कम होना शुरू हो जायेगा और फिर न मुलाकात होगी न बात. मोबाइल का स्विच ऑफ रहेगा. ऑन रहा भी तो कॉल डाईभर्ट रहेगा या फिर फोन उठेगा नहीं. इत्तेफाक से आपने ढूँढकर मुलाकात कर ली तो कहेंगे अरे! मोबाइल आलमीरा में रख दी थी पता ही नहीं चला. आप कुछ नहीं कर सकेंगे. ज्यादा से ज्यादा चेक बाउंस कराकर धोखेधडी का मामला दर्ज करायेंगे. कोई बात नहीं. न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कई वर्ष सुनवाई में निकल जायेंगे. वकील तारीख पर तारीख लेता जायेगा. बहुत पहुँच वाले  हुए तो जेल भिजवा देंगे. इससे क्या होगा.एक दो महीने की जेल फिर बेल. यह तो कई बार हो चुका है. आप घर पर जाकर गाली-गलौज कर सकते हैं. इससे भी कुछ फर्क नहीं पड़ता. वह जनाब गालीप्रूफ़ हैं. एक कान से सुनते हैं दूसरे कान से निकाल देते हैं. अपने घर में ही कैदी की तरह रहते हैं. कोई खोजने आता है तो कहलवा देते हैं कि शहर के बाहर हैं. घरवाले उनके महाजनों की उल्टी-सीढ़ी बातें सुनने को विवश रहते हैं. उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. वे घर से बाहर निकलते भी हैं तो बहुत छुप-छुपाकर.शाम ढलने के बाद. काला शीशा लगी गाड़ी में. ऐसे  पनडुब्बे जीवन के हर क्षेत्र में मौजूद हैं. तालाब के अंदर के पनडुब्बों से तो आप बच सकते हैं लेकिन बाहर के पनडुब्बों से बच पाना मुश्किल है.  
----देवेंद्र गौतम