रविवार, अप्रैल 24, 2011

न दामन पे कोई छींट , न खंज़र पे कोई दाग

इंदिरा गांधी के ज़माने में कलीम आजिज़ का एक शेर काफी चर्चित हुआ था-

"न दामन पे कोई छींट , न खंज़र पे कोई दाग 
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो."

                     आज कांग्रेस नेतृत्व उसी करामत को दुहरा रहा है. अन्ना हजारे के आन्दोलन से उमड़े जन सैलाब को शांत करने के लिए उनकी सभी मांगें मान लीं. लोकपाल विधेयक के लिए ज्वाइंट ड्राफ्टिंग कमिटी के गठन और उसमें सिविल सोसाइटी के सदस्यों की बराबर की भागीदारी स्वीकार कर ली. उनकी नियुक्ति भी हो गयी. लेकिन इसके तुरंत बाद 'उसकी कमीज मेरी कमीज से सफ़ेद क्यों' के अंदाज़ में एक-एक कर सिविल सोसाइटी के सदस्यों पर निशाना साधकर उनके गड़े मुर्दे उखाड़े जाने लगे. शुरुआत अन्ना हजारे से ही की गयी कि आन्दोलन का खर्च कहां से आया. इसके बाद कर्णाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े, पूर्व विधि मंत्री शांतिभूषण और उनके पुत्र प्रशांत भूषण पर निशाना साधा गया. शांतिभूषण के खिलाफ एक सीडी पेश किया गया जो 2005 में तैयार की गयी थी. इसे किसने तैयार किया और 6 बर्षों तक उसे दबाये क्यों रखा. उनके ड्राफ्टिंग कमिटी में शामिल होने के बाद उसे क्यों निकला गया यह कुछ प्रश्न हैं जो सीडी बनाने वाले और उसे उजागर करने वाले की  मंशा जाहिर करते हैं. अब कमिटी के अध्यक्ष प्रणव मुखर्जी कहते हैं कि ड्राफ्ट तैयार करने की प्रक्रिया पर प्रभाव डालने वाले किसी विवाद को अनुमति नहीं दी जाएगी. बस हो गया काम..सिविल सोसाइटी के लोगों के मनोबल को भी साइज़ में ला दिया गया और ड्राफ्ट की तैयारी में व्यवधान डालने के आरोप से भी मुक्ति पा ली गयी.क़त्ल भी हो गया और न दामन पे छींट पड़ी न खंज़र पे दाग पड़ा. सिविल सोसाइटी के सदस्यों पर मानसिक दबाव बनाकर केंद्र सरकार कैसा ड्राफ्ट तैयार कराती है यह तो ड्राफ्ट के तैयार होने के बाद कानूनविद ही बेहतर बता पाएंगे लेकिन राजनीति का यह अंदाज़ इस बात की अलामत है कि भ्रष्टाचार    के पोषकों का तंत्र  बहुत ही चतुर, बहुत ही कुटिल और बहुत ही सुगठित है. इससे सीधे उंगली घी निकलना मुश्किल है. अन्ना हजारे एक सीधे-सादे सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं. राजनैतिक चालबाजी और प्रपंच को वे किस हद तक आत्मसात कर पाएंगे और उसका समयानुकूल जवाब कैसे दे पाएंगे कहना मुश्किल है. लोकपाल विधेयक तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई की एक सांकेतिक शुरूआत है. इस बात को सत्ता में बैठे लोग भी जान रहे हैं. इसीलिए तू डाल-डाल तो मैं पात-पात के अंदाज़ में इससे निपटने की कोशिश की. अब इस लड़ाई को आगे बढ़ने के लिए काफी सतर्कता की ज़रुरत पड़ेगी. सीधे उंगली तो कत्तई घी नहीं निकलेगा. 

------देवेंद्र गौतम 

मंगलवार, अप्रैल 19, 2011

आश्वासन नहीं सर के ऊपर छत चाहिए

 झारखंड में अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत सरकारी ज़मीन पर बसे लोगों को उजाड़ने का काम करीब दो महीने से चल रहा है. अभी तक कई हज़ार परिवार बेघर किये जा चुके हैं. इतना कुछ हो चुकने तक शांत बैठे पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिंहा के सीने में अचानक दर्द उठा और वे सोमवार 18 अप्रैल को उजड़े गए लोगों के पुनर्वास और इस अभियान पर रोक की मांग की मांग को लेकर रांची के बिरसा चौक पर अनशन पर बैठ गए. बाद में कैबिनेट की बैठक में इस मुद्दे पर हाई कोर्ट में संशोधन याचिका दायर करने के फैसले के बाद उन्होंने अनशन तोडा. सिंहा साहब भाजपा के वरीय नेता हैं. राज्य में भाजपानीत एनडीए की सरकार है. लाख टके  का सवाल है कि अपनी सरकार के समक्ष कोई मांग रखने के लिए उन्हें अनशन करने की क्या दरकार पड़ी और यह दर्द इतने विलम्ब से क्यों उठा. इसी तरह का  सवाल केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय  की इस मुद्दे पर भूमिका को लेकर भी उठता है. नागा बाबा खटाल के उजाड़ने पर मंत्री जी को खास परेशानी नहीं हुई लेकिन जब इस्लामनगर की और बुलडोजरों का रुख हुआ तो वे बेचैन हो गए और ईंट से ईंट बजाने का एलान करते हुए धरना पर बैठ गए. लाठी खाई और न्यायपालिका की अवमानना के आरोपी भी बने. उनके सीने में दर्द उठने का कारण था इस्लामनगर का उनके चुनाव क्षेत्र में होना. नागा बाबा खटाल उनके चुनाव क्षेत्र में नहीं था इसलिए दर्द नहीं उठा. अब एचइसी  इलाके से अतिक्रमण हटाने के सवाल पर वे मरने मारने की बात कह रहे हैं. उनकी पीड़ा का स्रोत समझ में आता है. उनका दर्द उजड़े गए आम लोगों के लिए नहीं बल्कि अपने वोटरों के लिए है. लेकिन यशवंत सिंहा का तो यह चुनाव क्षेत्र भी नहीं है. दरअसल गरीब वर्ग के लोगों को जिस अमानवीय ढंग से उजाड़ा गया है. अब सरकार अमीरों को किसी तरह की राहत देने का नैतिक साहस नहीं जुटा सकती. जो बुलडोजर गरीबों की झोपड़ियों पर चले अब उनका रुख अमीरों के बंगलों की तरफ होने का वक़्त आ गया है. यशवंत सिंहां साहब की सहानुभूति संभवतः इसी वर्ग के साथ है. इसी आशंका ने उन्हें बेचैन कर दिया. अब कोर्ट में मामला उलझने के बाद उन्हें राहत मिल जाएगी.
           उजाड़े गए लोगों के प्रति सहानुभूति तो विधान सभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और तमाम पक्ष विपक्ष के नेता प्रकट कर रहे हैं. दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने भी उनके पुनर्वास की मांग की है. उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तो पुनर्वास स्थल तक का चयन कर चुकने का एलान कर चुके हैं. लेकिन ज़मीनी स्तर पर अभी तक इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं सुनाई दे रही है. सच्चाई यह है कि यह अभियान कोई अचानक शुरू नहीं हुआ. हाई कोर्ट के आदेश के बाद इसके लिए काफी तैयारी करनी पड़ी. आज घडियाली आंसू टपकाने वाले सरकार में बैठे जनता के नुमाइंदे यदि चाहते तो इस बीच पुनर्वास की व्यवस्था कर सकते थे.लेकिन उस वक़्त उन्हें न तो इसका ध्यान रहा और न ही इसकी ज़रूरत महसूस की. अभी भी वे पुनर्वास की बात तो कर रहे हैं लेकिन इसके लिए कोई पहल नहीं कर रहे हैं. उजड़े हुए लोग. अपने परिजनों के साथ जहां तहां भटक रहे हैं. आश्वासन तो बहुत लोग दे रहे हैं लेकिन सर के ऊपर छत कोई नहीं दे रहा है. इस आंच में सिर्फ राजनैतिक स्वार्थ की रोटियां सेंकी जा रही हैं. यही विडंबना है.

------देवेंद्र गौतम    

गुरुवार, अप्रैल 14, 2011

खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे.


दो कदम पीछे हटे हैं वो अभी 
एक कदम आगे निकलने के लिए.
ये सियासत का ही एक अंदाज़ है 
झुक गए हैं और तनने के लिए....

सौजन्य-- गूगल सर्च 
        अपने गजलों के ब्लॉग  गज़लगंगा पर मैंने 12 अप्रैल को यह कत्ता पोस्ट किया था जब पूरा देश जन दबाव के आगे सरकार के झुकने को विवश होने को लोकतंत्र की जीत मानकर जश्न मना रहा था. अन्ना हजारे ने दरअसल इस मुद्दे के जरिये एक पूरी व्यवस्था को निशाने पर लिया था. कोई स्थापित व्यवस्था इतनी जल्दी हार नहीं मानती. उसका पीछे हटना दरअसल एक आक्रामक युद्ध की तैयारी का ही हिस्सा था. जन लोकपाल विधेयक के दस्तावेजीकरण में जन भागीदारी की शर्त स्वीकार कर लेने के जरिये तत्काल मामले को टाल देना भर इसका उद्देश्य था. अब इस व्यवस्था में रचे बसे तमाम दल और व्यक्ति अन्ना हजारे के खिलाफ मोर्चा खोल बैठे हैं. आडवाणी जैसे जिम्मेवार नेता उन्हें चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहे हैं. उन्होंने महात्मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण का दौर भी देखा है. उनलोगों ने कभी चुनाव नहीं लड़ा था तो  फिर उनकी आवाज़ पर जनसमूह क्यों उमड़ पड़ता था..? क्या आडवाणी जी चुनाव लड़ने और संसदीय संस्थाओं में पहुंच जाना ही लोकप्रियता और जन स्वीकार्यता की एकमात्र कसौटी मानते हैं..? यदि ऐसा है तो क्या वे उस व्यवस्था का पक्षपोषण नहीं कर रहे जिसके खिलाफ जंतर मंतर से एक सांकेतिक युद्ध का बिगुल फूंका गया था. उन्हें 1977 का जमाना विस्मृत हो गया जब इंदिरा गांधी जैसी करिश्माई नेत्री की सल्तनत धराशायी हो गयी थी. लोकनायक जेपी ने खुद तो चुनाव नहीं लड़ा था लेकिन उनके आशीर्वाद से एक अजेय समझी जानेवाली सरकार गिर गयी थी और एक बहुमत की सरकार बन गयी थी. अन्ना हजारे एक सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं . निर्विवाद हैं इसलिए उनके पीछे इतना बड़ा जनसैलाब उमड़ आया. यदि वे चुनाव लड़ना चाहेंगे तो वे एक पूरी बारात लेकर संसद में पहुंचेंगे. सत्ता के खिलाडियों को इस बात का खटका है इसीलिए उन्होंने अन्ना हजारे के खिलाफ मोर्चा खोला है. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की चिंता यह है कि इतने बड़े आन्दोलन के लिए धन कहां से आया. उनकी चिंता लाजिमी है. जिस राजनैतिक परिवेश में वे पले-बढे हैं उसमें पैसे के बल पर ही सारे काम होते हैं. हर कार्यक्रम के लिए कुछ गुप्त कुछ खुले प्रायोजक होते हैं. यदि कांग्रेस ने यह आमरण अनशन का कार्यक्रम आयोजित किया होता तो उसका बज़ट निश्चित रूप से करोड़ों में होता. वे सोच भी नहीं सकते कि देश के विभिन्न इलाकों के लोग बिना पैसा लिए, बिना आवागमन की सुविधा प्रदान किये अपने खर्च से दिल्ली आ सकते हैं. विभिन्न शहरों में लोग बिना किसी प्रायोजक के अनशन पर बैठ सकते हैं. आमजन की इस भावनात्मक ज्वाला की आंच उन्होंने कभी न देखी  न महसूस की तो वे और सोच भी क्या सकते हैं. 
                    राजनैतिक दलों के अलावा अन्ना के खिलाफ एक मोर्चा उनके आन्दोलन के धर्मनिरपेक्ष साथियों ने भी खोल रखा है. उन्हें इस बात से नाराजगी है कि अन्ना ने नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार के कार्यों की सराहना क्यों की. उन्हें आदर्श मुख्यमंत्री कैसे कह दिया. जिस सन्दर्भ में यह बात कही गयी उसे वे नज़रंदाज़ कर रहे हैं. नीतीश कुमार पर तो एनडीए का सहयोगी होने के अलावा वे कोई आरोप नहीं मढ़ सकते लेकिन नरेन्द्र मोदी को गोधरा कांड और गुजरात दंगे का आरोपी होने के नाते सांप्रदायिक करार दे सकते हैं. सवाल उठता है क्या अन्ना ने मोदी की सराहना गोधरा कांड या गुजरात दंगे में भूमिका के लिए की है...? उन्होंने ग्रामीण विकास के निमित्त उनके कार्यों की प्रशंसा  करते हुए अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों को  ऐसा ही करने की सलाह दी थी. अगर यूपीए या वामदलों का कोई ऐसा मुख्यमंत्री उनकी नज़र में हो जिसने ग्रामीण विकास का इससे बेहतर कार्य किया हो तो उन्हें बताना चाहिए कि नहीं अन्ना दा ग्रामीण विकास तो फलां मुख्यमंत्री ने इनसे कहीं ज्यादा बेहतर किया है. किसी व्यक्ति के आचरण और व्यवहार के कई पक्ष होते हैं. उसके पूरे व्यक्तित्व को एक ही तराजू से तौला जाना  उचित नहीं है. नरेन्द्र मोदी यदि सिर्फ एक सांप्रदायिक व्यक्ति हैं तो  गुजरात की जनता उन्हें उखाड़ फेंकने का काम क्यों नहीं कर रही. 
                  अन्ना हजारे दरअसल एक सीधे-सादे सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं. वे कोई राजनैतिक व्यक्ति नहीं हैं. वे सरल ह्रदय के साफ सुथरे इंसान  हैं. गलत चीजों का गांधीवादी तरीके से विरोध करने का उनके अन्दर साहस है. 
निर्विवाद होने के कारण ही उनके आन्दोलन का इतना व्यापक जन समर्थन मिला. व्यवस्था के पोषकों और संचालकों का उनसे डरना लाजिमी है. इसीलिए उस वक़्त मौके की नजाकत को देखते हुए एक कदम पीछे हटकर उनकी तमाम मांगें स्वीकार कर लेने वाली राजसत्ता अब उनकी जमात में फूट डालकर उनके मुहिम को कमजोर करने के प्रयास में लगी है. इसमें कुछ हद तक सफलता भी मिल रही है. लेकिन युवा वर्ग और भारत की 120 करोड़ जनता का अन्ना में जो विश्वास है वह हवा के इन झोंकों से डिगने वाला नहीं दीखता. यह बदलाव की आंधी की पूर्व सूचना है. इसका विरोध करने वाले इस आंधी में कहां जाकर गिरेंगे अभी वे इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते.
------देवेंद्र गौतम

शनिवार, अप्रैल 09, 2011

चार दिन बनाम चालीस साल

अन्ना हजारे का चार दिन का आमरण अनशन नक्सलियों के चालीस साल के हिंसक संघर्ष पर भारी पड़ा. इन चार दिनों के अंदर देस के हर हिस्से में समाज के हर तबके से समर्थन की जो सुनामी उठी उसकी मिसाल महात्मा गांधी या लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलनों के दौरान उठे जन सैलाब से ही दी जा सकती है. नक्सलियों   की हिंसक कार्रवाइयों से प्रभावित क्षेत्र की जनता में दहशत ज़रूर छाई है लेकिन कभी ऐसा उत्साह उत्पन्न नहीं हुआ है. भारत में कोई भी बदलाव गांधीवाद के रास्ते से ही आएगा और यहां के लोग बंदूक की नली से सत्ता की उत्पत्ति की अवधारणा को किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे अन्ना के आंदोलन और उसकी उपलब्धि से यह बात साफ़ हो चुकी है. 
            निश्चित रूप से इस आंदोलन के प्रति लचीला और सकारात्मक रुख अख्तियार कर मनमोहन सिंह सरकार ने यह संदेश दिया है के वह गांधीवाद की भाषा समझती है.कुछ पूर्ववर्ती सरकारों ने शांतिपूर्ण अहिंसक आंदोलनों पर दमनचक्र चलाकर और हिंसक संगठनों के साथ समझौता वार्ता कर यह जाहिर किया था कि गांधी की नहीं गोली और बारूद की भाषा ही समझती है. इसके बाद ही देस में उग्रवाद और आतंकवाद ने जोर पकड़ा था. 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान श्रीमती इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाकर और अर्द्धसैनिक बलों तथा ख़ुफ़िया एजेंसियों का राजनैतिक इस्तेमाल कर आंदोलन को कुचल डालने का भरसक प्रयास किया था. हालांकि उस आंदोलन को इतना ज़बरदस्त जन समर्थन प्राप्त था कि उस आंधी में खुद उन्हीं का आशियाना उखड गया था. उनके हाथ से सत्ता की बागडोर निकल गयी थी. इस आंदोलन का प्रभाव यह पड़ा कि कई नक्सली गुटों ने हिंसा का रास्ता त्यागकर मुख्य धारा की राजनीति  शुरू कर दी. 1977 में जब मोरारजी देसाई के नेतृत्त्व में आन्दोलनकारियों की सरकार बनी. उस सरकार ने भी आन्दोलन के गांधीवादी तौर-तरीकों को तरजीह नहीं दी. जेपी समर्थक नवयुवकों ने उस ज़माने में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का गठन  कर सम्पूर्ण क्रांति की शुरूआत की. उनका सबसे बड़ा आंदोलन बोध गया महंथ की करीब 15 हज़ार एकड़ सीलिंग से अधिक और बेनामी ज़मीन की ज़ब्ती और भूमिहीनों के बीच वितरण का था. यह विश्व में अहिंसक वर्ग संघर्ष का पहला प्रयोग था. इसपर पूरी दुनिया की नज़र थी. खुद नक्सली संगठनों ने भी अपने संघर्ष को रोक दिया था और इसके परिणामों  का इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन सरकार और स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने महंथ के लठैतों की भूमिका अपना ली.शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और धरने के कार्यक्रमों को लाठी  और अश्रुगैस से रोकने की कोशिश की जाने लगी. 8  अगस्त 1979 को तो हद ही हो गयी. बोध गया के मस्तीपुर गांव में आन्दोलनकारियों की सभा में पुलिस और महंथ के पहलवानों ने लाठी और गोली से हमला कर दिया. कई प्रदर्शनकारी घायल हुए. तीन-चार लोग मरे गए. नक्सलियों ने इस कार्रवाई के विरोध में उसी रात महंथ के एक पहलवान की हत्या कर दी. उनका अहिंसक वर्ग संघर्ष के इस प्रयोग से मोहभंग हो गया. उन्हें लगा कि उनका बन्दूक का रास्ता ही सही है. इसके बाद उनकी लड़ाई तेज़ हो गयी. इधर सरकारी तंत्र ने उलटे महंथ के पहलवान कि हत्या के आरोप में वाहिनी के कार्यकर्ताओं  के विरुद्ध मुकदमा ठोक दिया. प्रदर्शन के दौरान घायल हुए या मरे गए आन्दोलनकारियों का मामला ठप्प हो गया. अहिंसक आन्दोलन को कुचलने का नतीजा आज भी यह देस भुगत रहा है. 1980 में श्रीमती गांधी दुबारा सत्ता में आयीं तो उन्होंने भी भिंडरवाले जैसे आतंक को अपने विरोधियों को दबाने के लिए परोक्ष रूप से प्रश्रय दिया.सुभाष घिसिंग, लाल्देंगा जैसे लोगों की ताक़त उनके ज़माने में ही बढ़ी. जिस हिंसा उनहोंने बढ़ावा दिया वही अंततः  उनके लिए भष्मासुर साबित हुआ. राजीव गांधी प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने भी लालदेंगा से समझौता कर हिंसा की भाषा को सरकारी तौर पर जल्दी सुनी जाने वाली भाषा के रूप में स्थापित किया. इन कार्रवाइयों से हिंसक संघर्षों को बल मिला. गांधीवादी आन्दोलन के तौर तरीके अप्रासंगिक नज़र आने लगे. मनमोहन सरकार ने अन्ना हजारे के आन्दोलन पर लचीला रुख अपना कर अहिंसा की भाषा के प्रति अपनी स्वीकृति दी है. इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा.
           अन्ना हजारे भारत के राजनैतिक संतों की परंपरा की कड़ी हैं. सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने पूर्ववर्ती राजनैतिक संतों की गलतियों को दुहराया नहीं है. महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आन्दोलन की सफलता के बाद उसकी उपलब्धियों से स्वयं  को अलग कर लिया था. सत्ता  की बागडोर दूसरों के हाथ में थमा दी थी. उसपर अपना कोई नियंत्रण नहीं रखा था. नतीजतन उनकी परिकल्पना आकर नहीं ले सकी थी. सिर्फ स्वार्थपूर्ति के लिए उनका नाम भुनाया जाता रहा था. सत्ता के प्रति अपनी अनाशक्ति का प्रदर्शन करने के लिए उन्होंने ऐसे लोगों को नेतृत्व थमा दिया जो उनके सिद्धांतों को न समझते थे न समझना चाहते थे. अन्ना हजारे ने एक सदस्य के रूप में सही संयुक्त समिति में रहना स्वीकार कर यह बता दिया कि वे पूर्वजों की  गलती दुहराने नहीं जा रहे. अन्ना हजारे और उनके समर्थकों ने एक और सतर्कता बरती. उन्होंने किसी भी राजनैतिक दल के नेता को अनशन स्थल पर फटकने नहीं दिया. आन्दोलन में ऐसे गैर राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्त्ता और विभिन्न क्षेत्रों के अगुआ लोग इकट्ठे हुए जिनकी जनता के बीच साफ़ सुथरी छवि है. युवा वर्ग का उत्साह एक नए बदलाव की यात्रा प्रारंभ होने का विश्वास दिला रहा था. देशभर में लोग टीवी पर आंख गडाए पल-पल की खबर उसी तन्मयता से ले रहे थे जिस तन्मयता से कुछ ही दिन पहले क्रिकेट मैच के स्कोर  की जानकारी ले रहे थे. अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जंतर मंतर की  इस हलचल को वामपंथी या भाजपाई किस रूप में विश्लेषित कर रहे हैं. लेकिन इस घटना ने जनतंत्र में तंत्र पर जन की पकड़ को मज़बूत किया है.यह भ्रष्टतंत्र के खिलाफ जनतंत्र की जंग के शुरूआत है. अभी कई मरहले पार करने हैं. कई अवरोध हटाने हैं. जनमानस में नई आशाओं का संचार हुआ है. अन्ना हजारे के नेतृत्व में  एक सकारात्मक बदलाव की ओर कारवां निकल पड़ा है. 

-----देवेंद्र गौतम 

गुरुवार, अप्रैल 07, 2011

एक लम्बी लड़ाई का शंखनाद

प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे का आमरण अनशन और उसे पूरे देश में मिल रहा व्यापक समर्थन इस बात का संकेत है कि सत्ता के गलियारे में आर्थिक लुटेरों का तिलस्मी जाल अब अभेद्य नहीं रह पायेगा. सरकार रिंद के रिंद रहे हाथ से ज़न्नत न गयी के अंदाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का नाटक नहीं कर पायेगी. लुटेरों  के इस तंत्र के खिलाफ विभिन्न मंचों से जंग तो पहले से चल रही है लेकिन अब अन्ना हजारे के अनशन के साथ उसके खिलाफ एक व्यापक जन आन्दोलन का शंखनाद हो चुका है. अब भ्रष्टाचार के प्रत्यक्ष या परोक्ष पहरुओं की आवाज़ भी लड़खड़ाने लगी है.
                  कितनी दिलचस्प बात है कि इधर बाबा हजारे अनशन पर बैठे और उधर चुनाव आयोग ने विधान सभा चुनाव की तैयारी में लगे पांच में से तीन राज्यों असम, पश्चिम बंगाल और तमिल नाडू में 42 .75 करोड़ रुपये ज़ब्त किये. तमिल नाडू में तो एक बस की छत से 5 .11 करोड़ जब्त किये.जाहिर है कि उससे कहीं ज्यादा राशि बंट चुकी होगी या बांटे  जाने के लिए तैयार रक्खी होगी. चुनाव आयोग की कोशिशों से चुनाव में पैसे के खेल में कुछ दबाव ज़रूर बना है लेकिन भारत में चुनाव अभी भी एक बड़ी पूंजी से खेले जाने वाले जुए का रूप धारण किये हुए है. यहां के मतदाता भी पैसे और प्रलोभन के आधार पर वोट दे देते हैं. कोई साधारण सामाजिक कार्यकर्त्ता तो चुनाव लड़ने की हिम्मत भी नहीं कर पाता. इसलिए सत्ता की राजनीति में वही लोग सफल हो पाते हैं जिनके दो नम्बरी व्यापारियों से संबंध होते हैं. किसी भी ईमानदार व्यक्ति के पास किसी दूसरे खिलाडी को जुआ खेलने के लिए भारी भरकम पैसे देने की क्षमता नहीं हो सकती. ग़लत धंधो का काला धन ही इस तरह के प्रयोजन में इस्तेमाल किया जाता है. उस समय देने और लेने वाले के बीच सत्ता हांथ में आने के बाद आर्थिक स्रोतों के दोहन में सहयोग का एक मौन समझौता हो चुका होता है. राजनैतिक दलों के नेता जानते हैं कि पार्टी चलने के लिए अनैतिक रास्ते अपनाने ही होंगे. सत्ता में आये तो करीबी धंधेबाजों के साथ घोटाले करने होंगे. जिस भी रास्ते से आये कोष जुटाना ही होगा. सत्ता की राजनीति पूरी तरह काले धन से संचालित और उसकी पोषक हो चुकी है. जाहिर है कि जन लोकपाल विधेयक का दस्तावेज़ वे ऐसा ही बनाने की कोशिश करेंगे जिससे जनता को लगे कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक निर्णायक हथियार बन चुका है जबकि उसकी मारक क्षमता बच्चों के गुरदेल से भी कम हो. अन्ना हजारे विधेयक का प्रारूप तैयार करने में पचास फीसदी जन भागीदारी की मांग कर रहे हैं तो यह उन्हें कैसे मंज़ूर हो. 
                            हाल के दिनों में बाबा रामदेव, गोविन्दाचार्य, अन्ना हजारे, किरण बेदी, स्वामी अग्निवेश जैसे व्यापक जन समर्थन वाले समाजसेवियों का एक ऐसा मंच तैयार हुआ है जो मौजूदा व्यवस्था की विकृतियों को बारीकी से समझ रहा है और एक आमूल परिवर्तन की लड़ाई छेड़ने को बेचैन है. निश्चित रूप से यह एक लम्बी लड़ाई की शुरूआत भर है. इसका नतीजा सामने आने में कितना वक़्त लगेगा इस बीच  कौन-कौन से मोड़ आयेंगे.....कितनी शहादतें देनी होंगी अभी कहना मुश्किल है लेकिन इतना तय है मौजूदा व्यवस्था की जड़ों पर प्रहार शुरू हो चुका है और उसकी उल्टी गिनती प्रारंभ हो चुकी है. उसी की अलामत है जंतर-मंतर के पास बाबाअन्ना  हजारे का आमरण अनशन.    
----देवेंद्र गौतम 

सोमवार, अप्रैल 04, 2011

.इस उन्माद की......क्षय हो...!

पूरा देश क्रिकेट के उन्माद में डूबा हुआ है. छोटे बड़े हर शहर हर कस्बे में जश्न का माहौल है. टीम इंडिया के खिलाडियों पर उपहारों की बारिश हो रही है. उनका जोरदार स्वागत किया जा रहा है. यह  स्वाभाविक भी है. आखिर पूरे 28 वर्षों बाद विश्व कप पर भारत का कब्ज़ा हुआ है. काश! कि भावनाओं का यही ज्वार कारगिल युद्ध के बाद देश के नौजवानों में दिखाई पड़ा होता. युद्ध के मैदान से लौटे जवानों का ऐसा ही स्वागत किया गया होता. उनपर भी उपहारों की ऐसी ही बारिश की गयी होती. शहीदों को अंतिम सलामी देने के लिए लोग उमड़ पड़े होते. लेकिन इसका शतांश उत्साह भी उस वक़्त नहीं दिखाई पड़ा था. जापान में भूकंप, सुनामी और परमाणु विकिरण की घटना से पूरा विश्व दहल उठा लेकिन आज जो क्रिकेट के उन्माद में डूबे हैं उनके अंदर करुणा की कोई ऐसी लहर नहीं फूटी जिसे महसूस किया जा सके. उन्माद और संवेदनशीलता में यही फर्क होता है. संवेदनशीलता रचनात्मक होती है जबकि उन्माद विध्वंसात्मक . रांची के क्रिकेटप्रेमियों ने जीत के उन्माद में अलबर्ट एक्का की मूर्ति में जड़ी बन्दूक ही तोड़ डाली. उसे अपने साथ ले गए. जाहिर है कि उनके लिए स्वतंत्रता संग्राम से ज्यादा महत्व क्रिकेट मैच का था और एक शहीद की मूर्ति के हाथों में रक्खी बन्दूक से ज्यादा महत्व उस बल्ले का था जिसे ठीक से पकड़ना भी उन्हें शायद ही आता हो. इस मानसिक धरातल को समझने की ज़रूरत है.
       हमारे देश के क्रिकेट के बुखार से तप रहे लोगों को शायद ही इस बात का अहसास हो कि यह खेल सिर्फ उन्हीं देशों में खेला जाता है जो ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत हुआ करते थे. जहां ब्रिटिश सरकार का सिक्का चलता था. जहां के लोगों को उनके ज़ुल्मो-सितम से निजात पाने के लिए आज़ादी की लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ी थी. हजारों लोगों को शहादत देनी पड़ी. जेलों की यातना सहनी पड़ी. अब यदि इस औपनिवेशिक और गुलामी के दिनों कि याद दिलाने वाले इस खेल की जीत पर किसी स्वतंत्रता सेनानी के प्रतीक को अपमानित करने में कोई संकोच नहीं होता तो हम किस मानसिकता में जी रहे हैं. हमारी ख़ुशी और हमारे दुखों का पैमाना क्या है, इसपर विचार करने की ज़रूरत है. आज जो लोग अपना सारा कामधाम छोड़कर क्रिकेट नहीं देखते, या काम करते हुए हर 15-20 मिनट पर स्कोर की जानकारी नहीं लेते. भारत की हार पर आंसू नहीं बहाते, जीत पर पटाखे नहीं छोड़ते, तोड़-फोड़ नहीं मचाते उन्हें बैकवर्ड समझा जाता है. यदि इस खेल में दिलचस्पी नहीं रखने वाले बैकवर्ड माने जाते हैं तो तथाकथित फारवर्ड लोग बताने की कृपा करें कि अमेरिका, फ्रांस,जर्मनी, चीन, रूस, जापान जैसे देशों के लोगों के बारे में उनका क्या खयाल है.....?  किसी समाजवादी या पूंजीवादी देश में यह खेल नहीं खेला जाता. तो क्या वहां के लोग बैकवर्ड हैं. सिर्फ अंग्रेज और उनकी गुलामी के मनोवैज्ञानिक दबाव में जीनेवाले लोग ही फारवर्ड हैं..?  औपनिवेशिक चेतना ही आधुनिकता की कसौटी है..?  यदि ऐसा है तो इस आधुनिकता की क्षय हो...क्षय हो....क्षय हो...!...इस उन्माद की......क्षय हो...!

---देवेंद्र गौतम 

शुक्रवार, अप्रैल 01, 2011

अतिक्रमण करो..भूस्वामी बनो

भूमिहीनों और गृहविहीनों के लिए खुशखबरी है. अब उन्हें न तो इंदिरा आवास के लिए अफसरों की खुशामद करनी है, न दलालों के चक्कर में पड़ना है, न किसी को रिश्वत देनी है. बस सरकारी जमीन के किसी टुकड़े पर कब्ज़ा जमाकर बैठ जाना है. पहले बांस-फूस की झोपडी बनाकर रहना शुरू करना है फिर धीरे-धीरे उसे पक्का करवा देना है. जबतक कोई पूछता नहीं ठाट से रहना है. जब अतिक्रमण हटाओ अभियान चलेगा तो आप पुनर्वास के अधिकारी हो जायेंगे. सरकार आपको ज़मीन आवंटित करेगी. है न सीधा सरल रास्ता. झारखंड में इन दिनों चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान का यही संदेश है. हाईकोर्ट के आदेश पर सख्ती के साथ यह अभियान चलाया गया 60 -70 साल तक से अतिक्रमित इलाकों को खाली करा दिया गया. उनमें रह रहे हजारों परिवार बेघर हो गए. सबसे ज्यादा बवाल 60 वर्षों से अतिक्रमित नागा बाबा खटाल की ५.५ एकड़ भूमि को खाली करने पर मचा.  इसमें डेढ़ दर्जन खटाल चल रहे थे और कई दर्ज़न कच्चे-पक्के  मकान बने हुए थे. एक नेताजी ने तो तीनमंजिला मकान बनवा रखा था. अब विधानसभा अध्यक्ष समेत सभी दलों के विधायक उजाड़े गए परिवारों के पुनर्वास की मांग कर रहे हैं. इस अभियान को अविलंब बंद कराने की ताईद कर रहे हैं. जमशेदपुर में तो स्वयं मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने ही अभियान रुकवा दिया. स्थानीय अख़बारों में उजाड़े गए लोगों की करुण गाथा छापने की होड़ लगी हुई है. झारखंड में अतिक्रमण हटाओ अभियान के कारण विधायिका और न्यायपालिका के बीच शीतयुद्ध छिड़ गया है. कार्यपालिका दोनों के बीच सैंडविच की भूमिका में है. मामला कहीं न कहीं वोट बैंक से जुड़ जा रहा है. यदि न्यायधीशों को अपने पद पर बने रहने के लिए चुनाव लड़ना पड़ता तो शायद उनकी भी राय नेताओं जैसी होती. नेताओं की तो मजबूरी है इसलिए गरीबों के प्रति हमदर्दी जताने के इस स्वर्णिम अवसर का पूरा लाभ उठा लेना चाहते हैं. पूर्व मुख्य मंत्री बाबूलाल मरांडी ने तो नागा बाबा खटाल के उजाड़े गए लोगों को लेकर राजभवन का घेराव किया और पुनर्वास की व्यवस्था होने तक उन्हें वहीँ रहने का निर्देश दिया. अब राजनेताओं से कोई यह पूछे कि क्या जिन्होंने सरकारी ज़मीन का अतिक्रमण नहीं किया वे गरीब नहीं हैं. जिन्होंने अतिक्रमण कर तीनमंजिला मकान खड़ा कर लिया वे गरीब हैं और जिनके पास सर छुपाने की भी जगह नहीं वे अमीर हैं ? आखिर अमीरी-गरीबी का मापदंड क्या है. ज़मीन का अतिक्रमण हमेशा दबंग और प्रभावशाली लोग करते हैं. नागा बाबा खटाल के कब्जाधारियों में कई लोग दुकानों का निर्माण कर उसे किराये पर चला रहे थे. एडवांस और पगड़ी भी वसूल कर चुके थे. अतिक्रमण हटाओ अभियान तो महीने भर से चल रहा था. वे निश्चिंत थे कि हर बार की तरह इस बार भी उनपर हाथ नहीं डाला जायेगा. इसीलिए कोई वैकल्पिक व्यस्था करने की ज़रूरत नहीं समझी. कोर्ट का कड़ा आदेश नहीं होता तो शायद ही प्रशासन उनपर हाथ डालता. अब वोट की राजनीति के तहत इस मुद्दे को मानवाधिकार हनन का रूप देकर कोर्ट को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. इसके दूरगामी प्रभावों की किसी को चिंता नहीं है. यदि विधायिका का यही रुख रहा तो अतिक्रमण सरकारी ज़मीन प्राप्त करने का आसान रास्ता बन जायेगा. फिर इसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जायेगा.

-------देवेंद्र गौतम