रविवार, मार्च 27, 2011

झारखंड..... फिर टकराए लोकतंत्र के पाए

संसदीय लोकतंत्र के तीन पायों की टकराहट कभी-कभी अप्रिय दृश्य उत्पन्न कर देती है. कल झारखंड विधान सभा में कुछ ऐसा ही दृश्य उपस्थित हुआ. सूबे की राजधानी रांची के एक इलाके में कोर्ट के आदेश पर कई भवनों का बिजली पानी का संयोग काट दिया गया. विधान सभा में इसे पूरी तरह जन-विरोधी बताया गया. स्पीकर से लेकर विधायक तक सभी ने कोर्ट के फैसले पर नाराज़गी व्यक्त की. पूर्व उपमुख्यमंत्री रघुवर दास ने तो सीधे तौर पर कह दिया कि विधायिका के ऊपर कोई नहीं है. विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह बाद में मुख्य न्यायधीश से इस मुद्दे पर मिले. उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि सरकार ने संज्ञान ले लिया है. कनेक्शन फिर जोड़ दिए जायेंगे. हाई कोर्ट ने यह आदेश एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए उन भवनों के लिए दिया था जिनका निर्माण रांची क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण के बिल्डिंग बाइलाज का उलंघन कर हुआ था. ऐन होली के वक़्त इस तरह की कार्रवाई कुछ जनविरोधी कही जा सकती है. लेकिन इसे अमली जामा पहनाने में जो प्रशासनिक तत्परता दिखाई गयी क्या वह न्यायपालिका के प्रति उसके सम्मान का सूचक था...? इसे समझने के लिए न्यायलय के कुछ और आदेशों पर नज़र डालने की ज़रूरत है.
इसी 16  मार्च को झारखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश भगवती प्रसाद और न्यायमूर्ति डीएन पटेल की खंडपीठ ने गिरिडीह पेयजलापूर्ति योजना में शिथिलता सम्बन्धी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इस योजना के कार्यपालक अभियंता राजेंद्र प्रसाद के विरुद्ध कार्रवाई का मौखिक आदेश दिया. विभाग ने कार्रवाई करने की जगह उन्हें प्रोन्नत कर उपनिदेशक बना दिया. जिस का. अभियंता को जनता ने अकर्मण्य मानकर जनहित याचिका दायर की. जिसे कोर्ट ने कार्रवाई के योग्य माना. वह कार्यपालिका की नज़र में योग्य और प्रोन्नति का पात्र समझा गया. कोर्ट ने आपत्ति व्यक्त की तो जवाब दिया गया कि मौखिक आदेश पर कार्रवाई में दिक्कत है. यानी कोर्ट लिखित आदेश दे तो उसे अयोग्य मान लिया जायेगा वरना वह इनाम के काबिल है. उसने अपनी जिम्मेवारी किस हद तक पूरी की इससे विभाग को कुछ भी लेना-देना नहीं. इसी तरह प्रशासनिक अधिकारियों के सेवा मामलों की सुनवाई करने वाले कैट ने करीब डेढ़ महीने पहले वरीय आइपीएस अधिकारी पीएस नटराजन का निलंबन तत्काल प्रभाव से रद्द कर सेवा बहाल करने का आदेश दिया. साथ ही कहा कि सरकार चाहे तो  विभागीय जांच और कार्रवाई जारी रख सकती है. वे पिछले छः वर्षों से निलंबित हैं. उनपर यौन शोषण का आरोप है. लेकिन जब उन्हें निलंबित किया गया था तबतक उनके विरुद्ध न कोई प्राथमिकी दर्ज थी न ही कोई विभागीय जांच चल रही थी. नियमतः किसी आइपीएस या आइएएस अधिकारी को इतनी लम्बी अवधि तक निलंबित रखने का कोई प्रावधान नहीं है. इस बीच या तो निलंबनमुक्त कर दिया जाना चाहिए था या फिर बर्ख्वास्तगी की अनुशंसा की जानी चाहिए थी. कैट के आदेश के बाद आदर्श स्थिति यही थी कि उन्हें निलंबन मुक्त कर विभागीय कार्रवाई के लपेटे में ले लिया जाता लेकिन विभाग के लोग गांठ बांध कर बैठे हैं कि सेवा बहाल नहीं होने देंगे. उनकी सेवा अब एक-डेढ़ साल बची है. सरकार टालमटोल कर यह अवधि पार कर देना चाहती है.अब बताएं कहाँ है कोर्ट और कहां उसका आदेश. आदेश मनोनुकूल लगा तो सर आँखों पर वरना "हमारी मर्ज़ी".
यह भी सच है कि हाल के वर्षों में जनहित के अधिकांश काम न्यायपालिका के आदेश पर ही हुए. सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश एके गांगुली ने सार्वजानिक तौर पर कहा कि अदालतें अपनी हदों को पार कर गवर्नेंस संस्था की तरह काम करने को विवश हैं. सच पूछें तो तमाम लोकतान्त्रिक संस्थाओं के प्रति जनता की आस्था घटी है.लोक सभा और विधान सभाओं में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का जमावड़ा. उनका गैरजिम्मेवाराना आचरण आमजन के मोहभंग का कारण बना है. ऐसा नहीं कि न्यायपालिका के दामन पर दाग नहीं हैं लेकिन जनता का विश्वास न्यायपालिका पर है. उसे लगता है कि कुछ बेहतर होगा तो न्यायिक सक्रियता के जरिये ही होगा. कार्यपालिका और विधायिका को यह बात समझनी होगी और अपने आचरण को सुधारते हुए अपनी सही भूमिका निभानी होगी. अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था से ही लोगों का विश्वास उठ जायेगा.

------देवेन्द्र गौतम

शनिवार, मार्च 26, 2011

इंतज़ार के सात घंटे.....

ट्रेन या बस का लम्बा इंतज़ार करना पड़े और समय काटने का कोई जरिया न मिले तो इंसान क्या करे. 24  मार्च को मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ. दोपहर करीब तीन बजे पटना गांधी मैदान स्थित सरकारी बस स्टैंड पहुंचा. वहां से रांची के लिए 10 बजे रात को बस थी. बस का टिकट मिल गया. पहली ही सीट भी मिल गयी. लेकिन कंधे पर बैग टांगे इस बीच के 7 घंटे कैसे बिताये जायें यह सवाल था. बस स्टैंड में कोई क्लॉक  रूम नहीं होता जहां आप सामान रखकर घूम-फिर सकें. औरंगाबाद के शायर मित्र प्रदीप रौशन और संगीतकार पार्थ आरा से अपनी मारूति कार पर   यहां तक लाये थे और मेरे निश्चिंत होने तक रुके रहने के मूड में थे. मैंने सोचा कि  क्यों उनका वक़्त बर्बाद किया जाये. कह दिया कि मैं एक दो घंटे साइबर कैफे में बैठूंगा. फिर शाम को करीब के किसी सिनेमा हॉल में फिल्म देखूंगा. तबतक बस का टाइम हो जायेगा. वे चले गए. मैंने बीएन कॉलेज के आसपास साइबर कैफे की तलाश की लेकिन कहीं जगह नहीं मिली. पब्लिकेशन डिविजन में घुसा काफी देर तक किताबें देखता रहा. कुछ किताबें खरीदीं फिर बैग लटकाए बाहर निकल आया. एक घंटा कट गया. 6 घंटे काटने बाकी थे.  साइबर कैफे का आइडिया ड्रॉप कर दिया था. गांधी मैदान के पास आया. पुरानी किताबों के फुटपाथी स्टालों का चक्कर लगाया. एक घंटे और बीते. अब सिनेमा के शो का वक़्त करीब था. सोचा टिकट तो ले लूँ. एक हॉल में भोजपुरी फिल्म महोत्सव चल रहा था. काफी भीड़ थी. टिकट मिलने की उम्मीद नहीं थी. दो सिनेमा हॉल बंद मिले. उनमें सिविल वर्क चल रहा था. मैं समझ गया...हॉल को बंद कर मॉल या मल्टीप्लेक्स खोलने की तैयारी होगी. ज़मीन का रेट इतना बढ़ चुका है और सिनेमा हॉल में लाभ की गुंजाइश इतनी कम हो गयी है कि सिर्फ सिनेमा हॉल चलाना बेवकूफी मानी जा रही है. रांची के भी अधिकांश हॉल इसी चक्कर में बंद हो गए हैं. बहरहाल सिनेमा हॉल में समय बिताने की योजना फेल हो गयी. सोचने लगा  कि नीतीश जी सबकी समस्याएं हल करने का प्रयास कर रहे हैं तो रेल और बस के यात्रियों के इंतज़ार का समय काटने के लिए कुछ मनोरंजन के साधन उपलब्ध करने पर भी उन्हें विचार करना चाहिए. राजस्व भी मिलेगा और यात्रियों की दुवायें भी. झारखंड में तो नेताओं को सत्ता की छीना झपटी से ही फुर्सत नहीं. लेकिन नीतीश जी सोच भी सकते हैं और कर भी सकते हैं. बहरहाल मेरे पास अभी भी चार घंटे से ज्यादा समय काटने की समस्या  थी. बैग भी भारी  लग  रहा  था . बस स्टैंड  के आसपास की चाय नाश्ते  की  दुकानों पर घूम-घूम कर बाकी वक़्त गुज़ारना ही बेहतर विकल्प था. वही किया. राम-राम कर करीब नौ बजे रात को बस में घुसने की नौबत आई. बस की सीट पर बैठकर अंतिम एक घंटे काटे. बस समय पर खुल गयी. सुबह के वक़्त रांची पहुँच भी गया लेकिन वह इंतज़ार के सात घंटे अखर गए .

-----देवेंद्र  गौतम       

बुधवार, मार्च 16, 2011

कालाधन तो प्राणवायु है


 आजकल काले धन को लेकर जो चिंताएं जताई जा रही हैं उनका कुछ औचित्य समझ में नहीं आ रहा है.काला धन तो मौजूदा व्यवस्था का प्राणवायु है. इसके बगैर तो कुछ हो ही नहीं सकता. जिन्दगी की गाड़ी बढ़ ही नहीं सकती. राजनैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तमाम गतिविधियां काले धन के सहयोग से ही संचालित होती हैं. वर्षो पूर्व बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा.जगन्नाथ मिश्र ने एक साक्षात्कार के दौरान खुले तौर पर कहा था कि "करप्सन इज ए पार्ट ऑफ़ आवर नेशनल लाइफ". यह बात पूरी तरह सत्य साबित हो रही है. राजनीति के क्षेत्र में देखें तो एक पार्टी के संचालन में करोड़ों का खर्च आता है. यह पैसा क्या मजदूरी करके लाया जाता है...? जाहिर तौर पर चंदे से आता है. यह चंदा देता कौन है? क्या 50  प्रतिशत से ज्यादा गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का वहन करने वाली भारतीय जनता. बेरोजगारी का दंश झेलता युवा वर्ग.... अपनी अस्मिता तलाशती महिलाएं.... कुपोषण के शिकार बच्चे या फिर उपेक्षा को अपनी नियति में चुके सीनियर सिटिज़न....? जाहिर है कि दो नंबर का व्यवसाय करने वाले लोग अपने काले धन का एक हिस्सा राजनेताओं को देकर एक मौन समझौता करते हैं.सत्ता में आने के बाद उनके अवैध धंधों को संरक्षण और नए आर्थिक स्रोतों के दरवाज़े खोलने में मदद. वे चंदा देकर राजनेताओं के समक्ष  चारा डालते हैं.   एक चुनाव लड़ने में करोड़ों का खर्च किया जाता है. यह पैसा इसी तरह के स्रोतों से आता है. चुनाव आयोग ने भी उम्मीदवारों के खर्च की एक सीमा तय कर दी है. एक आम समाजसेवक के पास चुनाव लड़ने का न्यूनतम निर्धारित खर्च भी कहां से आता है. यह न कोई बताता है न कोई पूछता है. एक धरना या प्रदर्शन जैसे कार्यक्रम में भी लाखों का  खर्च आता है. यह पैसा भी काले बाज़ार से ही तो आता है. सच यही है कि काले धन के बिना राजनीति नहीं हो सकती. सांस्कृतिक  गतिविधियों का संचालन भी म्हणत मजदूरी के पैसों से संभव नहीं है. इसके लिए भी काले धन के किसी प्रायोजक की ज़रुरत पड़ती है. इसके बिना कोई बड़ा आयोजन नहीं हो सकता. कोई सामाजिक आयोजन भी इसके बिना नहीं हो सकता. यदि बेटी कि शादी करनी है तो लाख-डेढ़ लाख तो टेंट वाला ही ले लेगा. पांच-दस लाख तो किधर घुस जायेंगा पता भी नहीं चलेगा. बच्चे कि छाती से लेकर मुंडन तक, उसकी शिक्षा से लेकर भरण-पोषण तक. हर कदम पर पैसे की ज़रुरत पड़ेगी. इसलिए नौकरी-पेशा लोग रिश्वत के रस्ते तलाशते हैं. व्यवसायी मिलावट का धंधा करते हैं. अफसरों की मिलीभगत से अवैध कमी करते हैं. काले धन के बिना समाज में अपनी प्रतिष्ठा बचाना मुश्किल होता है. धर्मकर्म भी खर्चीला शगल है. एक निम्न मध्यवर्ग का व्यक्ति अपनी सामान्य कमाई से वह ईश भक्ति भी नहीं कर सकता. सछ पूछें तो मासिक बज़ट के बाहर का कोई भी खर्च ऊपरी कमाई के बिना संभव नहीं. फिर काले धन को लाकर इतनी चिंता किसलिए. विपक्ष विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काला धन की वापसी के लिए और इस दिशा में सर्कार की उदासीनता को लेकर उग्र हो रहा है. आखिर खरबों-ख़राब की इस राशि को विदेश में रखने की ज़रूरत क्यों पड़ी. हमारी प्रणाली में ही तो कहीं इसके कारण नहीं मौजूद नहीं. यह राशि ज़बरन लाना संभव नहीं दिखता. यदि एक खास प्रतिशत कर जमाकर देश के बैंकों में उसे जमा करने का प्रस्ताव दिया जाये और उनके स्रोत पर पर कोई सवाल न पूछने का आश्वासन दिया जाये तो शायद विदेशी बैंकों के देशी खाताधारी उसे खुद ही वापस ले आयें. वरना एक दूसरे के विरुद्ध आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति का यह मात्र एक हथियार बना रहेगा. काला धन के समाजशास्त्र को समझने और उसके अनुरूप रणनीति बनाकर उसे बाज़ार में लाने की ज़रूरत है.

-----देवेन्द्र गौतम


शनिवार, मार्च 12, 2011

कुदरत के सामने बौना हुआ इंसान

 संदर्भ- जलजला जापान का

मेरी ग़ज़ल का एक शेर था-
"हुआ यही कि खुद अपना वजूद खो बैठा
वो जिसने दबदबा कायम किया था कुदरत पर".

जापान में सचमुच कुदरत के सामने इंसान फिर बौना साबित हुआ. सारा ज्ञान, सारा विज्ञान, सारे वैज्ञानिक उपकरण धरे के धरे रह गए और प्रकृति के तांडव से अपना बचाव नहीं किया जा सका. जापान में पहले 8  से ज्यादा तीव्रता वाले भूकंप के झटकों ने कहर बरपाया फिर सुनामी लहरों ने तबाही मचाई. पूरा विश्व सकते में आ गया. जान-माल के नुकसान का अभी आकलन किया जाना है. फ़िलहाल बचाव और राहत कार्य चल रहे हैं. मौसम वैज्ञानिकों को धरती के अंदर चल रही हलचल की कोई पूर्व जानकारी नहीं मिल पायी. मिलती तो इस नुकसान को कुछ कम किया जा सकता था.
यह सच है कि प्राकृतिक आपदाओं के साथ जापान का चोली-दामन का साथ रहा है. भूकंप के हलके झटकों की  तो कोई गिनती ही नहीं 1891 से अबतक जापान में 8 से अधिक तीव्रता के सात भूकंप आ चुके हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि जापान के भूगर्भ से रिंग ऑफ़ फायर नामक  एक पट्टी गुज़रती है जो धरती पर भीषण भूकंपों का वाहक बनती है. जापान के लोगों ने प्राकृतिक  आपदाओं से अपने बचाव का इंतजाम भी काफी किया है. सुनामी से बचने के लिए योशिनामा शहर के समुद्री तटों पर 200 मीटर चौड़ी बाड़ और 800  मीटर ऊंची दीवार बनायीं है. सुनामी वार्निंग प्रणाली विकसित की है.यह प्रशांत सुनामी वार्निंग ह्रानाली से जुड़ा है. जिससे विश्व के सौ से अधिक देश जुड़े हुए हैं. इससे समुद्र का अंदर होनेवाली उथल-पुथल की जानकारी मिलती  रहती है. लेकिन 11  मार्च को 8.9  तीव्रता के भीषण भूकंप और इसके बाद आई सुनामी का अनुमान तक नहीं लगाया जा सका. पूरी प्रणाली विफल हो गयी. कुछ उपकरणों के जरिये जापान को समुद्री तूफानों के बारे में कुछ हद तक जानकारी पाने में सफलता मिली है लेकिन ज्वालामुखी विस्फोट, उसके कारण होने वाले भूकंप और उठने वाली सुनामी लहरों के समय का पूर्वानुमान नहीं हो पाता.
भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि  दक्षिण-पूर्व एशिया के भूगर्भ में के बीच गुरुत्वाकर्षण और चुम्बकीय कारणों से घर्षण होता रहता है. इसके कारण पृथ्वी की संरचना और गति पर प्रभाव पड़ रहा है. पृथ्वी का ऊपरी हिस्सा लिथोस्फरिक नामक जिन शैल-खण्डों से बना है उनकी सतह 50  से 650 किलोमीटर तक मोटी है. ये शैल-खंड एक दूसे से टकराते हैं तो भूकंप आता है. शैल खण्डों के टकराने की घटना समुद्र के आसपास होने पर सुनामी लहरों का उठाना लाजिमी होता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि ज्वालामुखी विस्फोट भी शैल-खण्डों के घर्षण के कारण ही होता है.
बहरहाल सच्चाई यही है कि प्राकृतिक संपदाओं के अंधाधुन्द दोहन के कारण वायुमंडल, भूतल और भूगर्भ  का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है. इसी कारण प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोत्तरी हो रही है. धरती पर जीवन के बरक़रार रहने की उम्मीदों पर ही सवाल उठने लगे हैं. विज्ञान ने काफी तरक्की की है लेकिन प्रकृति के कोप से अपनी रक्षा ही नहीं कर पाए तो इस तरक्की का क्या मतलब....? जापान की घटना पूरे विश्व के वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती है कि भविष्य में ऐसी आपदाओं से मानव जीवन की रक्षा वे कर पाते हैं या नहीं. क्या प्रकृति के साथ मनुष्य जाति का कोई सामंजस्य बन पायेगा..?  यदि हाँ...तो कैसे..?
-----देवेन्द्र गौतम  

गुरुवार, मार्च 10, 2011

Blogs In Media - परदे के पीछे के कलाकार: डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ‘सुनो भई साधो’

दोस्तों! गाजीपुर ब्लौगर्स असोसिएशन के माध्यम से लखनऊ से प्रकाशित डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट अख़बार ने १० मार्च के अंक में "परदे के पीछे के कलाकार" पोस्ट को प्रकाशित किया. इसकी सूचना ब्लॉग इन मीडिया के माध्यम से मिली. मैं गाजीपुर ब्लौगर्स असोसिएशन, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट और ब्लॉग इन मीडिया के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ. 
-----देवेन्द्र गौतम             

Blogs In Media - परदे के पीछे के कलाकार: डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ‘सुनो भई साधो’

बुधवार, मार्च 09, 2011

चोरी भी सीनाजोरी भी....



झारखंड के  लातेहार जिले के एक सामाजिक कार्यकर्ता नियामत अंसारी की नक्सलियों ने हत्या कर दी. 3 मार्च को उन्हें उनके गांव जेरुआ से उठाकर बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला गया. वे ग्राम स्वराज अभियान के सक्रिय कार्यकर्ता थे और गांव-गांव जाकर मनरेगा योजना के सही ढंग से क्रियान्वयन के लिए जागरूकता अभियान चलाते थे. सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का अंकेक्षण करते थे. उनका जीवन समाज के सबसे कमजोर वर्ग के लिए समर्पित था. प्रखंड स्तर पर विकास योजनाओं की राशि की लूट में लगे बिचौलियों, ठेकेदारों और सरकारी आधिकारियों को उनकी गतिविधियां फूटी आंखों नहीं सुहाती थीं तो इसमें कोई हैरत की बात नहीं क्योंकि उनके स्वार्थ बाधित होते थे. लेकिन नक्सलियों की उनसे नाराजगी का कारण समझ में नहीं आता. जिस वर्ग के लिए उन्होंने बारूद की खेती शुरू की है. नियामत भी उसी वर्ग को उसका हक दिलाने के लिए लड़ रहे थे. बिचौलिए और ठेकेदार अगर उन्हें जनता को भड़काने वाला और विकास में बाधा डालने वाला आदमी समझते थे तो कम से कम नक्सलियों को उन्हें गरीबों का साथी मानना चाहिए  था. यह हत्या नक्सली आंदोलन के भटकाव का एक जीता जागता उदाहरण है. इससे इस बात का संकेत मिलता है कि नक्सलियों का एक हिस्सा ठेकेदारों, बिचौलियों और भ्रष्ट अधिकारियों के लूटतंत्र का हिस्सा बन चुका है और बाजाप्ता उनकी निजी सेना के रूप में काम कर रहा है. बन्दूक आगे निकल  गया है. सिद्धांत पीछे छूट गए हैं. भारत का भ्रष्ट तंत्र इतना ढीठ हो चुका है कि किसी किस्म का विरोध सहन नहीं कर पाता. उग्रवादियों और आतंकवादियों का वित् पोषण कर उन्हें भी अपना लठैत बना लिया है. झारखंड में इससे पहले भी सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है. उनका खून पचाया भी जा चुका है. इसी तरह एक दलित सामाजिक कार्यकर्ता मंगला राम की हत्या राजस्थान के बाड़मेर जिले के बमनौर गांव में कर दी गयी. उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत सरपंच से विकास कार्यों की जानकारी मांगी थी और दी गयी जानकारी से असंतुष्ट होकर अपील में चले गए थे. सरपंच ने भरी पंचायत में उन्हें मार डाला. अब लूट और भ्रष्टाचार का तंत्र इतना ताक़तवर होता जा रहा है कि उससे लड़ना साधारण लोगों के बूते की बात नहीं रह गयी है. आज़ाद भारत की यही त्रासदी है.

----देवेन्द्र गौतम      

मंगलवार, मार्च 08, 2011

परदे के पीछे के कलाकार....


प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह का दामन लगातार दागदार होता जा रहा है. सीवीसी पीजे थॉमस की नियुक्ति का मामला हो, 2  जी स्पेक्ट्रम घोटाले का मामला हो, देवास अन्तरिक्ष घोटाले का मामला हो या फिर राष्ट्रमंडल खेल घोटाले का. जांच-पड़ताल में शक की सुई सीधे प्रधान मंत्री कार्यालय पर आ टिकती है. प्राधानमंत्री को थॉमस की नियुक्ति में अपनी सहभागिता की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार करनी पड़ी.
प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री हैं और उनकी छवि साफ-सुथरी रही है. वे एक गंभीर व्यक्तित्व के सम्मानित राजनेता रहे हैं. वे आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति  से दूर रहे हैं. उनकी एकमात्र कमजोरी यही रही है कि ज़रूरत से ज्यादा शरीफ और सरल रहे हैं. वे गलती नहीं कर सकते तो उसका विरोध भी नहीं कर सकते. चुपचाप यथास्थिति पर टिके हुए धारा के साथ बहते चले जाने के वे आदी रहे हैं. शायद ही कोई भारतवासी इस बात पर यकीन करे कि उन्होंने किसी घोटाले की व्यूहरचना की होगी या उसे अंजाम दिया होगा. स्पष्ट तौर पर कहें तो इसके लिए जिस मानसिक बनावट की या जिस दुस्साहस की ज़रूरत पड़ती है वह उनके पास है ही नहीं. निश्चित रूप से परदे के पीछे कोई और कलाकार अपनी बाजीगरी दिखा रहा था और मनमोहन सिंह चुपचाप इस खेल को देखते रहने को विवश रहे होंगे. चुप्पी तो उनके स्वभाव में है लेकिन उन्हें चुप रहने के लिए कोई दबाव भी झेलना पड़ा होगा. मैं उन्हें कोई ईमानदारी का प्रमाणपत्र देने का या उनकी सफाई देने का प्रयास नहीं कर रहा. कहने का अर्थ यह है कि  वे घोटाले का पैसा रख तो वे सकते हैं लेकिन उसे अंजाम नहीं दे सकते. वे इसके लिए पूरी तरह अयोग्य हैं. परदे के पीछे ज़रूर कोई ऐसा कलाकार है जिसकी किसी बात से वे इंकार नहीं कर सकते. जांच एजेंसियों को और विपक्ष को मनमोहन सिंह पर कीचड उछालने की जगह उस कलाकार तक पहुंचने और उसकी सच्चाई को दुनिया के सामने लाने की  कोशिश करनी चाहिए इतना बड़ा घोटाला अंजाम देने का माद्दा अकेले ए राजा में नहीं हो सकता और मनमोहन सिंह ए राजा को बचाने के लिए चुप्पी नहीं साध सकते.
झारखंड में पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के नेतृत्व में हुए 4 .5  हज़ार करोड़ के खान आवंटन घोटाले में भी यही हुआ है. सीबीआई यह पता लगा रही है कि उस घोटाले की रकम किन-किन राजनेताओं तक पहुंचाई गयी है. वे एक निर्दलीय विधायक थे. संप्रंग के समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे. जाहिर है कि दूसरों की वैसाखी के सहारे कुर्सी पर बैठा निर्दलीय मुख्यमंत्री अकेले दम पर इतना बड़ा घोटाला नहीं कर सकता. वह परदे के पीछे के कलाकारों के इशारे पर चल रहा था. अब सीबीआई  उन्हीं कि तलाश में लगी है. केंद्र में भी जांच एजेंसियों को असली कलाकारों की तलाश करनी चाहिए.
---देवेन्द्र गौतम

शुक्रवार, मार्च 04, 2011

संसदीय लोकतंत्र के अंतर्विरोध


बालिग मताधिकार पर आधारित भारत का संसदीय लोकतंत्र पांच दशकों के बाद भी अपने अंतर्विरोधों से, अपनी विकृतियों  से मुक्त नहीं हो पा रहा है. संसदीय संस्थाओं में अपराधियों और काला बाजारियों की बड़ी जमात हमारी नुमाईंदगी कर रही है. राजनीति एक मुनाफे का व्यवसाय बन गया है. अब यह सोचने का वक़्त आ गया है कि क्या हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली बालिग नहीं हो पायी है. अपने जन प्रतिनिधियों के चयन में हमसे चूक हो जा रही है..? या फिर हमारे मताधिकार की खरीद-फरोख्त या लूट हो रही है जिसका प्रतिरोध हम नहीं कर पा रहे हैं.
सच पूछें तो हमारे अन्दर उन नागरिक गुणों का विकास नहीं हो पाया है जो किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था की ज़रूरी शर्त हैं. भारत एक धर्म प्रधान देश है और धर्म के अन्दर हर शासन  तंत्र के लिए नागरिक गुणों के विकास की प्रणाली बताई गयी है. गीता में ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग की विस्तार से चर्चा की गयी है. यह तीनो योग तीन अलग-अलग शासन   प्रणालियों के लिए नागरिक गुणों के विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं .भक्तियोग  किसी अदृश्य शक्ति के सामने पूरी तरह समर्पित हो जाने की सीख देता है. इसमें किसी तर्क या सोच-विचार के लिए जगह नहीं होती. इसके अनुयायी राजतन्त्र के लिए आदर्श नागरिक हो सकते हैं क्योंकि जो अदृश्य शक्ति के सामने नतमस्तक हो सकता है वही राजा के सामने भी सर झुकाए खड़ा रह सकता है. वैसे भी राजनीति शास्त्र में राजा के दैवी अधिकार का सिद्धांत प्रचलित रहा है और राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि बताया गया है.
कर्मयोग कर्म किये जाने और फल की चिंता नहीं करने की शिक्षा देता है. इसका आचरण करने वाले की कार्यक्षमता विकसित होगी.वह साम्यवादी शासन व्यवस्था के लिए आदर्श गुणों से युक्त नागरिक होगा. ज्ञानयोग तर्क और विज्ञानं का योग है. यह आँख मूंदकर किसी बात को मान लेने की शिक्षा नहीं देता. हर चीज को ज्ञान-विज्ञानं की कसौटी पर कसने और संतुष्ट होने के बाद ही स्वीकार करने की मानसिकता तैयार  करता है. लोकतंत्र के लिए दरअसल इन्हीं गुणों से युक्त नागरिकों की ज़रूरत होती है. भारत के साथ विडंबना यह है कि यहां शासन व्यवस्था तो संसदीय लोकतंत्र की है लेकिन नागरिक गुणों को उत्पन्न करने का कारखाना राजतन्त्र के ज़माने वाला है. आबादी का बड़ा हिस्सा भक्तियोग का अनुयायी है.बात सिर्फ हिन्दू धर्म की नहीं सभी धर्मों के मानने वालों में शास्त्रों में निहित ज्ञान को समझने के प्रति कम और अदृश्य शक्ति की भक्ति में रूझान ज्यादा है. शायद यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना और सबसे बड़ा अंतर्विरोध है. जबतक लोकतंत्र के लिए अनुकूल नागरिक गुणों के विकास की प्रणाली नहीं विकसित होगी संसदीय लोकतंत्र का स्थापित हो पाना कठिन है.राजनीति के चिंतकों को इसपर  विचार करने की ज़रूरत है.

-------देवेन्द्र गौतम