शनिवार, जनवरी 29, 2011

धरती के अलावा कोई होस्ट नहीं


दिल्ली के एक रेस्तरा में एक मित्र के साथ लंच लेने के बाद मैंने बिल अदा करने के लिए जेब में हाथ डाला तो मित्र ने मना करते हुए कहा कि आप गेस्ट  हैं आप मत दें, मैं दूंगा. मैंने जवाब दिया कि गेस्ट तो वो सभी हैं जिन्होंने इस धरती पर जन्म लिया है. सभी गिनती कि सांसे लेकर आये हैं. गिनती पूरी होगी और वे वापस लौट जायेंगे. होस्ट तो सिर्फ यह धरती है. पता नहीं कितने लाख या कितने करोड़ वर्षों से जीव-जंतुओं की मेजबानी कर रही है और पता नहीं कबतक करती रहेगी. मेज़बान होने का दंभ तो हनुमान, आल्हा, खिज्र, अस्वस्थामा जैसे पाँच लोग भर सकते हैं जिन्हें अमर माना जाता है. यदि यह मान्यता सही है. वरना कोई कुछ क्षणों का मेहमान है तो कोई कुछ वर्षों का. सदियों के मेहमान तो देवराहा बाबा जैसे कुछ विरले संत होते हैं. ग़ालिब ने कहा था कि
मकदूर हो खाक से पूछूं कि ए लईम , तूने वो संगहाए-गरामायाँ क्या किये. सचमुच कैसी-कैसी अद्भुत हस्तियाँ, कैसे-कैसे महारथी इस धरती पर आये और चले गए. अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सके. जबतक जीवित रहे पूरी दुनिया को जीत लेने का ख्वाब देखते रहे. इस जुगत में लगे रहे. लेकिन वास्तव में वे खाली हाथ आये, खाली हाथ गए. अपने पीछे सिर्फ कुछ कहानियां छोड़ गए. उन्होंने स्वयं को मेहमान समझा होता तो वे ऐसा नहीं करते. उन्होंने तो खुद को मेजमान ही समझ लिया था. इसीलिए यश और अपयश कि परवाह नहीं की.  बहादुर शाह ज़फर ने कहा था-
य़े चमन यूँ ही रहेगा और हजारों जानवर
अपनी-अपनी बोलियाँ सब बोलकर उड़ जायेंगे.

शुक्रवार, जनवरी 28, 2011

हनुमान चालीसा पर एक सवाल

शायद ही कोई हिन्दू होगा जिसने अपने जीवन में कभी हनुमान चालीसा नहीं पढ़ा हो. तुलसीदास रचित यह काव्य रचना हिन्दू समाज में संभवतः सबसे लोकप्रिय प्रार्थना है. भले ही कुछ लोग इसका नियमित पाठ न करते हों या प्रगतिशीलता के दायरे से बाहर निकाल दिए जाने के भय से सार्वजनिक रूप से इसके पाठ से कतराते हों लेकिन संकट में फंसने या भयभीत होने पर वे भी अचानक मन ही मन इसका पाठ करने लगते हैं. मैंने भी कई मौकों पर इसका पाठ किया है. लेकिन इसकी एक पंक्ति पर आकर मैं अक्सर अटक जाता हूँ.
हनुमान चालीसा की वह पंक्ति है भीम रूप धरी असुर संहारा. यानी हनुमान ने भीम का रूप धरकर असुरों का संहार किया. इस पंक्ति के जरिये तुलसीदास ने भीम को हनुमान से श्रेष्ठ बतला दिया है. मेरे खयाल में यह हनुमान के साथ नाइंसाफी है.निश्चित रूप से भीम हनुमान की ही तरह पवनदेव के पुत्र थे. वीर थे. गदायुद्ध में पारंगत थे. लेकिन हनुमान के व्यक्तित्व के मुकाबले वे कहीं नहीं ठहरते. हनुमान के अन्दर रंचमात्र भी अभिमान नहीं था. भीम के अभिमान को नष्ट करने के लिए उन्होंने उनके रास्ते में अपनी पूंछ रख दी थी और उसे हटाने का आग्रह कर उनके पानी का अहसास करा दिया था. वे विलक्षण शक्तियों के मालिक थे. लेकिन उन्हें अपनी शक्तियां याद नहीं रहती थीं. उन्हें याद दिलाना पड़ता था. वे लघु से लघु और विकराल से विकराल रूप धारण कर सकते थे. हवा में उड़ सकते थे. भीम कृष्ण के उतने बड़े भक्त नहीं थे जितने हनुमान राम के. भीम वीर थे लेकिन उनके पास चमत्कारिक शक्तियां नहीं थीं. जबकि हनुमान अपनी चमत्कारिक शक्तियों और राम के प्रति अपने समर्पण के कारण भगवान शिव का अवतार और पूजनीय मने गए. हनुमान त्रेता युग में हुए थे और भीम द्वापर में. भीम को हनुमान का छोटा भाई मन जाता है. लेकिन दोनों में ज़मीन आसमान का अंतर है. ऐसे में असुरों के संहार के लिए हनुमान का भीम जैसा रूप धारण करना कुछ गले के नीचे नहीं उतरता. चूँकि तुलसी का रचनाकाल मध्ययुग था. इसलिए संभव है की वे हनुमान और भीम के कार्यकाल के अंतर को नज़रंदाज़ कर गए हों.