शुक्रवार, नवंबर 25, 2011

जनजीवन को जटिल बनाते अपराधी

मुट्ठी भर अपराधी और कमजोर सरकारी तंत्र आम आदमी के जीवन को जटिल बनाते जा रहे हैं. किसी ज़माने में एक खाताधारी की पहचान पर बैंक बैंक अकाउंट खुल जाता था अब इसके लिए कई तरह के दस्तावेज़ प्रस्तुत करने पड़ते हैं. ट्रेन में सफ़र करना हो किसी दूसरे शहर में होटल में ठहरना हो तो पहचान पत्र की ज़रुरत पड़ती है. आमलोगों के लिए यह पहचान पत्र हासिल करना आसमान से तारे तोड़ लेन के समान है.
जनगणना वाले जरूर घर-घर जाकर सर्वे करते हैं लेकिन वोटर लिस्ट तैयार करने वाले या दूसरे पहचान पत्र बनाने वाले बाबू घर-घर नहीं जाते. इसके लिए पैरवी करनी पड़ती है. एक सीधे-सादे गरीब आदमी के लिए पहचान पत्र बनवाना आसान नहीं होता लेकिन अपराधकर्मी जितने फर्जी नामों से चाहें आसानी से बनवा लेते हैं. दूसरी बात यह कि जिन्हें रोजी-रोटी के लिए बार-बार शहर बदलने होते हैं वे हर जगह नया पहचान पत्र कैसे हासिल करें. यह समस्या रहती है.सरकारी तंत्र ख़ुफ़िया जानकारी हासिल करने में पूरी तरह निकम्मी साबित हो रही है. आतंकवादी किसी भी शहर में गोला-बारूद के साथ आकर वारदात को अंजाम दे जाते हैं और सुरक्षा एजेंसियां हाथ मालती रह जाती हैं. घोटालेबाज बड़ी-बड़ी रकमें देश-विदेश के बैंकों में रखते हैं उन्हें कोई परेशानी नहीं होती लेकिन साधारण आदमी 10 -20  लाख भी जमा कर ले तो सवालों की झड़ी लग जाती है. विदेशी बैंकों से कला धन वापस लाने की मांग होती है तो सरकार ऐसी मांग करने वालों की पिटाई करवा देती है और काले धन के खातेधारियों के हितों का परोक्ष रूप से रक्षा करती दिखाई देती है. भारत की सवा सौ करोड़ की आबादी में अपराधियों. जालसाजों, घोटालेबाजों की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं होगी लेकिन पूरी आबादी सरकार के तुगलकी नियमों की चक्की में पिस रही है. सिर्फ इसलिए की सरकार गलत तत्वों पर नज़र रखने में विफल है या फिर उनके साथ सांठगांठ   कर अपनी चौकसी की खानापूर्ति के लिए आमलोगों को परेशान कर रही है.      

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