रविवार, नवंबर 06, 2011

टीम अन्ना को संयम और समन्वय की ज़रूरत

अन्ना हजारे ने अपना ब्लॉग बंद करने का ऐलान किया है. उनकी नाराजगी का कारण उनका पत्र  समय से पहले सार्वजनिक कर दिया जाना है. उनहोंने जिस पत्रकार को ब्लॉग के संचालन का जिम्मा दिया था उसने यह गलती की है. इसे आपसी समन्वय का अभाव और अति उत्साह का नतीजा ही कहेंगे. टीम अन्ना के सदस्य किसी मसले पर आपस में सलाह मश्वरा करना और सार्वजनिक बयान देने अन्ना से बात करने या सोचने समझने की ज़रूरत नहीं समझते. उनहोंने अपने को भ्रष्टाचार विरोध का चैम्पियन और भारतीय जनमानस की आवाज़ मान लिया है. यही कारण है कि वे विवादास्पद बयान जारी कर दे रहे हैं. प्रशांत भूषण कश्मीर पर विचार प्रकट कर पीटाई खा जा रहे हैं तो  अरविंद केजरीवाल जूते का प्रहार झेल रहे हैं. बयान देने के मामले में स्वयं अन्ना भी संयम नहीं बरत रहे. अडवाणी की रथयात्रा के पूर्व उनकी सलाह ठीक ऐसी ही थी. अडवाणी की यह कोई पहली रथयात्रा नहीं थी. यह उनकी राजनैतिक शैली का हिस्सा रही है. यदि वे भ्रष्टाचार के विरोध में रथयात्रा कर रहे थे तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार था. अन्ना को कोई भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का कॉपी राईट नहीं मिल गया है. इस बात को समझना चाहिए.
अन्ना के आंदोलन में जो अपार जनसमूह उमड़ पड़ा था वह इसलिए कि उन्होंने आम जनता के आक्रोश को स्वर दिया था. उनकी छवि साफ़ सुथरी थी और उनके अन्दर परिवर्तन की लम्बी लड़ाई के नेतृत्त्व की क्षमता दिखी थी. लेकिन वे यह बात नहीं समझ पाए कि उनकी लड़ाई बड़े ही भ्रष्ट और शातिर किस्म के लोगों के साथ है जो पल में तोला और पल में रत्ती करने की कला में माहिर हैं. दरअसल टीम अन्ना अपनी प्रारंभिक जीत को पचा नहीं पाई और अति-उत्साह में उल-जुलूल हरकतें करने लगी. कांग्रेस उनके छिद्रान्वेषण में लगी रही और कुछ छिद्र ढूंड भी निकाले. निश्चित रूप से यह सबक सिखाने का अभियान था. इसके जरिये कांग्रेस ने अपने असली चरित्र को ujagar किया. उसने बताया कि काला धन वापस लाने की बात करोगे तो आधी रात को पीटाई होगी और भ्रष्टाचार विरोध करोगे तो तुम्हारी चड्ढी भी उतार फेकेंगे. इस किस्म के लोगों से लड़ने के लिए बड़े धैर्य और कूटनीतिक दक्षता की ज़रूरत होती है. यह माफियाई किस्म के आर्थिक लुटेरों का गिरोह है. इसके हाथ में दानवी ताक़त है. सीधे-सादे लोगों को ये नचाकर फेंक देंगे.
लेकिन यह भी सच है कि अब भारत के लोग राजनीति की माफियाई और मायावी संस्कृति को ज्यादा दिनों तक नहीं बर्दास्त  कर पाएंगे. उन्हें विकल्प की तलाश है. टीम अन्ना यदि विकल्प बन दे पाई तो ठीक नहीं तो कोई दूसरी ताक़त मैदान में आएगी. परिवर्तन की जन-आकांक्षा कोई swaroop तो ग्रहण करेगी ही.

-----देवेंद्र गौतम 

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