मंगलवार, अगस्त 30, 2011

Anna & his cap

अन्ना टोपी और कैंडल लाइट डिनर

जिस सड़क के अगले चौराहे पर बाजार होता है, वह किधर से आती है, यह तो पता नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि वह हमारे बहुत करीब से गुजरती है। जब अन्ना हजारे हमारे भीतर के स्वप्न को संबोधित कर रहे थे, उसी वक्त एक दूसरे स्तर पर कुछ और भी घट रहा था।


अन्ना नामक विशालकाय वृक्ष के सहारे बाजार की बेल भी फल-फूल रही थी। देखा जाए तो बाजारवाद के फंडे ज्यादा जटिल नहीं हैं। मुनाफा बाजार की धुरी है। बाजार मुनाफे की भाषा बखूबी पहचानता है और जहां मुनाफा हो, बाजार की बयार भी उसी ओर बहती है। फिर भले वह क्रिकेट मैच हो, फिल्मी गीत हो या कोई अनशन।

हुआ यूं कि हाल ही में मेरी नजर चिप्स के एक विज्ञापन पर पड़ी। देश का युवा बारिश में भीगते हुए बदलाव लाने की बात कर रहा है और सबके हाथों में मोमबत्तियां हैं। इतने में हीरो चिप्स लेकर एक लड़की के पास जाता है और पूछता है : ‘कैंडल लाइट मार्च के बाद कैंडल लाइट डिनर पर चलें!’ चूंकि वह यह पूछते हुए लड़की को चिप्स ऑफर करता है, तो वह मना नहीं कर पाती।

लब्बोलुआब यह कि बदलाव की बगावत के दौरान आप दिल भी लगा सकते हैं। ऐसा ही एक और वाकया देखने को मिला। जब अन्ना का अनशन चल रहा था, तब मेरे एक दोस्त के पास एक ई-मेल आया। शीर्षक था ‘आई एम अन्ना’। यह जुमला अब ‘गुड मॉर्निग’ और ‘हाऊ आर यू’ की तरह आम हो चला है, इसके बावजूद उसने मेल खोला। मेल का मसौदा कुछ इस तरह था : ‘देश में इस वक्त जो मुहिम चल रही है, आप उससे वाकिफ होंगे।

इस वक्त सच का साथ देना जरूरी है और सही को चुनना भी। सही जीवनसाथी चुनना भी बहुत अहम है। यदि आप सही जीवनसाथी चुनना चाहते हैं, तो फलां-फलां मैट्रिमोनी पर लॉग-इन करें।’ मजे की बात यह है कि खुद अन्ना ने भी नहीं सोचा होगा कि इस तरह उनके आंदोलन की एक मार्केट वैल्यू बनेगी और उसे भुनाने के लिए बाजार अपनी आस्तीनें चढ़ा लेगा। अन्ना टोपी का एक स्टाइल स्टेटमेंट बन जाना इसी की बानगी है।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ प्रोडक्ट मार्केटिंग के लिए ही इस आंदोलन का सहारा लिया गया। टीवी सीरियल्स भी पीछे नहीं थे। शरद जोशी की कहानियों पर आधारित एक धारावाहिक के एक सुपरिचित किरदार पिछले दिनों एक एपिसोड में अन्ना टोपी पहने नजर आए।

हो सकता है आंदोलन में भागीदारी करने का यह उनका अपना तरीका हो, लेकिन हमें तो यही लगा कि जिस तरह होली-दिवाली के मौके पर हमारे सीरियलों में भी त्योहार मनाए जाते हैं, ठीक उसी तरह इस आंदोलन के दौरान भी हमारे सीरियल उसी के रंग में रंग जाना चाहते थे।

अलबत्ता इन तमाम गतिविधियों से ये फॉमरूले भी गढ़े जा सकते हैं कि एक अच्छा व्यापारी वही है, जो मौजूदा मुद्दों का रुख अपने प्रोडक्ट की ओर मोड़ना जानता हो और जिसे जनता की नब्ज पर हाथ रखना आता हो। जिसने जनता की नब्ज थाम ली, उसका हाथ जनता की जेब से भला कब तक दूर रह सकता है! हालांकि बाजार यह फॉमरूला जमाने से आजमाता आ रहा है।

इसमें सबसे आगे हैं चॉकलेट कंपनियां, जो भारत में मीठे के मायने बदल देने को तत्पर हैं। चॉकलेट के विज्ञापनों का ही असर है कि इस बार राखी पर मुझे एक बहन भाई को मिठाई की जगह चॉकलेट खिलाती दिखाई दी।

अनेक युवाओं को ‘डर के आगे जीत है’ का नारा भाया है। गुस्ताखियों का गुणगान करने वाले ऐसे नारे भला उन्हें क्यों न भाएंगे और अगर उन्हें भाएंगे तो बाजार द्वारा क्यों न भुनाए जाएंगे? बहरहाल, लगता तो यही है कि जब तक अन्ना की मशाल जलती रहेगी, बाजार भी अपनी खिचड़ी पकाता रहेगा।

एक अच्छा व्यापारी वही है, जो मौजूदा मुद्दों का रुख अपने प्रोडक्ट की ओर मोड़ना जानता हो और जिसे जनता की नब्ज पर हाथ रखना आता हो। जिसने जनता की नब्ज थाम ली, उसका हाथ जनता की जेब से भला कब तक दूर रह सकता है!



Source: शरबानी बैनर्जी   |   Last Updated 00:32(30/08/11)

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