बुधवार, जुलाई 13, 2011

खजाने और भी हैं पद्मनाभस्वामी मंदिर के सिवा



वर्ष और अंक तो याद नहीं है लेकिन 70  के दशक में साप्ताहिक हिंदुस्तान में एक लेख पढ़ा था जिसमें कंचनजंघा चोटी के पास दुनिया के सबसे बड़े खजाने के संबंध में एक विस्तृत लेख छपा था. इसकी जानकारी ब्रिटिश शासन काल में एक ताम्रपत्र से मिली थी. ताम्रपत्र को प्राचीन भाषाओं के जानकार लोगों ने पढ़कर उसका अनुवाद किया था. उसके अनुसार यह विश्व का सबसे बड़ा खजाना है जिसे राजा राम सिंह ने मानव कल्याण के लिए रखवाया है. इस खजाने की रक्षा ऐसे सर्प करते हैं जिनके सिर पर दीपक जलता रहता है. जब दुनिया विनाश के कगार पर पहुंच जाएगी तो किसी खास व्यक्ति के पहुंचने पर इसके दरवाजे अपने आप खुल जायेंगे और वह इस खजाने के जरिये विश्व का पुनर्निर्माण करेगा.
       


खजाना जिस जगह पर है वहां लोहे के विशाल द्वार बने हुए हैं. ब्रिटिश सरकार ने दरवाजे को खोलने के लिए तोप से गोले दागे थे और उसे बारूद से उडाने की कई कोशिशें की थीं. लेकिन दरवाजा टस से मस नहीं हुआ था. लेख में छपे तथ्यों को पढने के बाद ऐसा लगा था कि यदि वहां सचमुच दुनिया का सबसे बड़ा खजाना है तो उसकी सुताक्षा का इंतजाम दैवी या फिर तिलस्मी है. खजानों के साथ सांपों का क्या संबंध हो सकता है वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसकी व्याख्या फिलहाल संभव नहीं है.
           भारत में शायद ही कोई इलाका ऐसा हो जहां प्राचीन काल के किसी खजाने की चर्चा जनश्रुतियों में मौजूद नहीं हो. विंध्य पर्वत श्रेणी के इलाकों में कई पुराने किलों और सुरंगनुमा गुफाओं में रहस्यमय खजानों का जिक्र वाचिक परंपरा के जरिये चर्चा में रहा है. कहते हैं कि ऐसे कई किलों से निकली सुरंगों का द्वार रहस्यमय परिस्थितियों में ब्रिटिश काल में ही सील करा दिया गया था. एक मान्यता के मुताबिक राजे-रजवाड़े संकटकाल के लिए ऐसी सुरंगों का निर्माण कराते थे और खजाने छुपाकर रखते थे. उन सुरंगों की निकासी हमेशा घने जंगलों में रहती थी ताकि राजपरिवार दुश्मनों की निगाह से बचकर रह सके और सत्ता वापस लेने के लिए ताक़त इकट्ठी कर सके. 1988 -89  के दौरान कमलेश्वर जी के संपादन में प्रकाशित पत्रिका गंगा के लिए एक स्टोरी पर काम करने के दौरान तत्कालीन गिरिडीह और वर्तमान बोकारो जिले के गोमिया इलाके में स्थित लुगु पहाड़ के बीहड़ जंगलों में मुझे भी एक प्राचीन खजाने की जानकारी मिली थी जिसे कई लोग तलाश करने का प्रयास कर चुके हैं. लोक देवता की जिस गुफा में खजाने की मौजूदगी की बात कही जाती है वहां भी अक्सर सांप दिखाई देते हैं. लेकिन किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते. मुझे उसका कुछ संकेत मिला था. तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी को इस संबंध में एक पत्र भी लिखा था. पत्र के जवाब में जानकारी दी गई थी कि पुरातत्व विभाग से इसपर रिपोर्ट मांगी गई है. कुछ दिनों बाद पत्र के जरिये सूचित किया गया कि गिरिडीह के पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने सर्वेक्षण किया लेकिन कुछ पता नहीं चला. उन दिनों स्टोरी के चक्कर में जंगलों पहाड़ों में मेरा काफी आना-जाना था. स्थानीय आदिवासियों से परिचय भी हो गया था. मैंने उनसे पूछा था कि क्या गिरिडीह से कुछ साहब लोग आये थे तो मकारात्मक जवाब मिला. मुझे लगा कि गजेटियर के आधार पर उनहोंने रिपोर्ट बना दी होगी. साहब लोग वन्य पशुओं से भरे जंगल-पहाड़ में कहां जाते. खैर अब तो वह माओवादियों के गहन प्रभाव का इलाका है. वहां उनको विश्वास में लिए बिना जाना खतरे से खाली नहीं है.
                फैज़ के लफ़्ज़ों में कहें तो  निष्कर्ष यह कि
'कब लूट-झपट से हस्ती की दुक्कानें खाली होती हैं
यां पर्वत-पर्वत हीरे हैं, यां सागर-सागर मोती हैं.'

यह अलग बात है कि सत्ता में बैठे लोगों का खजाना जंगलों, पहाड़ों, गुफाओं, सुरंगों, किलों और मंदिरों के तहखानों में नहीं विदेशी बैंकों में आराम से रखा है. उसकी रक्षा के पुख्ता इंतजाम भी हैं. जबतक सत्ता में हैं कोई माई का लाल उसे छू भी नहीं सकता.

-----देवेन्द्र गौतम

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