बुधवार, जुलाई 06, 2011

बाबा रे बाबा! विदेशी बैंकों से ज्यादा धन तो धर्मस्थलों में पड़ा है

केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर का एक तहखाना खुलना बाकी है और अभी तक एक लाख करोड़ का धन सामने आ चुका है. फिलहाल राजघराने के अनुरोध पर सुरक्षा के दृष्टिकोण से सरकार ने अगले तहखाने से निकलने वाले धन का विवरण सार्वजनिक न करने का निर्णय लिया है. साईं बाबा के देहावसान के बाद उनके तहखाने से मिली खरबों की संपत्ति के मालिकाना हक का विवाद चल ही रहा है. जाहिर है कि देश के मंदिरों, मसजिदों, गुरुद्वारों, गिरिजाघरों बी एनी धर्मस्थलों में इतना धन पड़ा हुआ है कि उसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता. यह विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काला धन से हजारों या लाखों गुना ज्यादा है और अनुपयोगी पड़ा है.


सरकार बाबा रामदेव की संपत्ति को खंगालने में लगी है जबकि वह घोषित है. उसका राजस्व भी जमा होता है और दर्जन भर कंपनियों के जरिये उसका राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान भी हो रहा है. लेकिन धर्मस्थलों के तहखानों में पड़े धन का राष्ट्रीय विकास में क्या योगदान हो रहा है? उनसे सरकार को कौन सा राजस्व प्राप्त हो रहा है. इसका राष्ट्रीय विकास में योगदान कैसे हो इसपर विचार करने की जरूरत है. बाबा रामदेव और विदेशी बैंकों से काले धन की वापसी की मुहिम में लगे लोगों को इस मामले को लेकर एक और मोर्चा खोलना चाहिए यदि उनका उद्देश्य किसी राजनैतिक दल को चिढाना मात्र न होकर राष्ट्र के विकास की गति तेज़ करना है तो.
               कहने का यह मतलब कदापि नहीं कि धर्मस्थलों की संपत्ति जब्त कर ली जाये. मालिकाना हक उनके ट्रस्टियों के पास रहने दिया जाये लेकिन वे सरकार को राष्ट्रीय विकास के निमित्त आसन शर्तों पर क़र्ज़ स्वरुप धन दें. स्वयं कल-कारखाने खोलकर या सार्वजनिक उपक्रमों में ज्वाइंट वेंचर के तहत शामिल होकर राष्ट्रीय विकास में योगदान दें. किसी तरह तहखानों में जमा धन को बाजार के प्रचलन में ले आयें. ऐसे प्रस्ताव की शुरुआत यदि धार्मिक अल्पसंख्यकों की ओर से आये तो साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वालों के मुंह पर तमाचा लगे. उनके मंसूबों पर पानी फिर जाये. सौहार्द्र  का एक मजबूत वातावरण बने. विदेशी बैंकों में जमा काला धन किसका है और उसे बचाने या जब्त करवाने के मूल में क्या है इसे देश का बच्चा-बच्चा समझ रहा है. आंदोलन चलता रहा और पांच लाख करोड़ डालर खाते से हटा लिए गए. विदेशी बैंक खतों को फ्रिज करने की ताक़त न सरकार के पास है न आन्दोलनकारियों के पास. तो फिर क्यों नहीं थोडा लचीला रुख अपना कर खाताधारियों को खुद अपना धन देश में वापस लाकर बाज़ार में निवेश करने को प्रेरित किया जाये. इस मुद्दे को राजनैतिक लाभ-हानि के गणित से जरा परे रखकर देश के विकास की ओर इमानदारी के साथ केन्द्रित किया जाये.धन चाहे धर्म स्थलों के तहखानों में हो या विदेशी बैंकों के गुप्त खाते में या किसी अन्य जगह पर उसे देशी बाजार में निवेश कराना ही मुख्य उद्देश्य बनाया जाये तो भारत फिर से सोने की चिड़िया का दर्जा प्राप्त कर ले. क्या ऐसा करेंगे आप..?

-----देवेंद्र गौतम   

8 टिप्‍पणियां:

  1. जब जब पाप पाखण्‍ड बढ़ते हैं मन्‍ि‍दरों में ज्‍यादा धन जमा होने लगता है। क्‍योंकि‍ जो अपने ही हि‍स्‍से की कमाई से खुश है...दूसरे का हक नहीं मारता, उसके पास इतना पैसा कहां से आयेगा कि‍ वो भगवान के नाम पर दान पुण्‍य करने के मजे ले सके।

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  2. उसे देशी बाजार में निवेश कराना ही मुख्य उद्देश्य बनाया जाये तो भारत फिर से सोने की चिड़िया का दर्जा प्राप्त कर ले. ...काश!! ऐसा ही हो!!!

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  3. Pahle sarkaar ye ensure kare ki 100 mein se 100 paise sahi jagah istemaal honge ... tabhi is velth ka istemaal hona chaahiye ...

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  4. आपका सुझाव बिलकुल ठीक है खजाने में रखने के बजाय इसका उपयोग राष्ट्रहित मैं होना बहुत ही आवश्यक है

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  5. एक सार्थक एवं जनोपयोगी आलेख ! इतना धन मंदिरों, एवं अन्य धर्मस्थलों के तहखानों में अनुपयुक्त पड़ा हुआ है ! तमाम धन विदेशी बैंकों में पड़ा हुआ है जो देश के तथाकथित कर्णधारों का माना जाता है ! सरकार का ढीला रवैया उस धन के मालिकों को उसे वहाँ से हटा कर कहीं और जमा करने के लिये पूरा समय और सहयोग दे रहा है ! ना धर्मस्थलों के ट्रस्टियों को गराब जनता की फ़िक्र है ना नेताओं को ! राजस्व की पूर्ति के लिये दिन दूनी और रात चौगुनी मंहगाई बढती ही जा रही है ! जनता किसका आसरा करे ! एक चिंतनीय आलेख ! शुभकामनायें !

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  6. बाबा रामदेव जी चाहते थे कि विदेशों में जमा ख़ज़ाना भारत लाया जाए और सरकार ने दिखा दिया कि बाहर से लाने की ज़रूरत तो बाद में पड़ेगी, देश के धर्मस्थलों में बहुत जमा है।
    आप कहें तो पहले इसी का राष्ट्रीकरण कर दिया जाए ?
    अब न तो बाबा जी से जवाब देते बन रहा है और न ही बीजेपी से।
    ...लेकिन यह सब हुआ क्यों और अब क्या होगा आगे ?
    जानने के लिए देखिए यह लिंक
    http://hbfint.blogspot.com/2011/07/indian-tradition.html

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  7. sahi baat hai...

    kewal is aadhar par ki desh ke andar bahut dhan hai....videshon me jama kakedhan ko nahi chhoda ja sakta...
    desh ke andar aur baahar ka dhan aam janta ka hai na ki kisi party ya kisi vyaktivishesh ka.

    isliye desh ke andar ka dhan supreem court ki nigrani me surakshit hone den..

    kintu desh ke baahar ka kala dhan vaapas lane ke liye sabhi sambhav prayaas kiye jayen..

    pahle apni sampatti ikatthi ho fir ise jan kalyaan ke karyon me (vishvasht nigraani ke adheen) lagaaya jaye, shaayad isse kisi ko etraaz bhi na ho.

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  8. भाई सुरेंद्र जी!
    आपका सुझाव बिलकुल सही है. विदेशी बैंकों में जमा काला धन को छोड़ा नहीं जा सकता. लेकिन समस्या यह है कि जिनका धन है उनकी सत्ता में गहरी पैठ है और हमारे पास इसके पर्याप्त दस्तावेज़ नहीं है. सरकार धन को वापस लाने से ज्यादा खाताधारियों के हितों की रक्षा के प्रति चिंतित है. ऐसी अपुष्ट सूचना है कि बाबा रामदेव के अनशन पर बैठने के बाद विदेशी बैंकों से भारतीय खातेदारों ने 5 लाख करोड़ डालर की निकासी कर ली है. सरकार दिलचस्पी नहीं ले रही तो आम नागरिक उन खातों को कैसे सील करा सकते हैं. ज्यादा से ज्यादा सत्ता में बैठे लोगों को कोस सकते हैं, बेनकाब कर सकते हैं लेकिन उनपर इसका क्या असर पड़ेगा. वे पूरी तरह बेशर्म हो चुके हैं. सच यह है कि सरकार आन्दोलन को लम्बा खींचकर काले धन के मालिकों को अपना धन निकाल कर सुरक्षित ठिकानों पर रख देने का पूरा मौक़ा दे रही है. इस हालत में देशवासियों के हिस्से में क्या आएगा? धर्मस्थलों में जमा धन जनता के हित में उपयोग करने में उतना पेंच नहीं है. रहा सवाल मालिकाना हक का तो ट्रस्टियों और सरकार के बीच न्यायपालिका और सिविल सोसाईटी की मौजूदगी में एक सम्मानजनक रास्ता निकाला जा सकता है. यह तत्काल संभव है. विदेशी बैंकों में जमा धन वापस लेन के प्रयास जारी रहें लेकिन धर्मस्थलों में जमा धन का उपयोग करने में विलंब करने से क्या लाभ? एक गैरराजनैतिक धरातल पर खड़े होकर समाज के हित में निष्पक्ष सोच को विकसित करने की ज़रुरत है.

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