रविवार, जून 19, 2011

इंटरनेट मीडिया का बढ़ता दायरा

 मन की भावनाओं की अभिव्यक्ति और सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए हमेशा किसी माध्यम की ज़रूरत पड़ती है. यह माध्यम मानव संस्कृति के विकास के साथ-साथ नए-नए रूप ग्रहण करता है. हाल के वर्षों में जन  माध्यम  के रूप में सबसे मजबूती के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराइ है इंटरनेट मीडिया ने. अन्ना हजारे के अनशन के दौरान व्यापक जन समर्थन जुटाने में फेसबुक, ट्यूटर जैसे सोशल नेटवर्किंग साईट्स की अहम् भूमिका रही. जंतर मंतर पर अनशन शुरू होने से पहले  ही इंडिया अगेंस्ट करप्सन ओअर्गी नामक वेबसाईट     पर ही 10 लाख से ज्यादा लोग समर्थन प्रदान कर चुके थे. बाबा रामदेव के आंदोलन में व्यापक समर्थन इंटरनेट के रास्ते ही जुटा. अन्ना हजारे के अनशन के पहले तीन दिन में ही 8 लाख से अधिक लोगों ने ट्यूटर पर 44 लाख से अधिक त्विट्स किये थे. निश्चित रूप से बाबा रामदेव को अन्ना की तरह समर्थन नहीं मिला लेकिन    इंटरनेट ने अपनी ताकत  का अहसास तो दिलाया  ही. 
     कुछ वर्ष पहले प्रिंट मीडिया अभिव्यक्ति का सबसे पोपुलर माध्यम हुआ करता था. लोग सुबह का अखबार देखने के लिए बेचैन रहते थे. इसके बाद इलेक्ट्रोनिक मीडिया सूचना क्रांति का नया अलमबरदार बनकर उसके मुकाबले सामने आया. लोग बुद्धू बक्से में घर बैठे पूरी दुनिया की घटनाओं को देखने और सुनने लगे. यह अलग बात है की  उसके अंदर कुछ अति उत्साही पत्रकार आ गए और टीआरपी बढ़ने के लिए   सनसनी फैलाना उनका उद्देश्य बन गया. इसके कारण वे वह विश्वसनीयता हासिल नहीं कर सके जो प्रिंट को हासिल है. 
            लेकिन प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक मौजूदा दौर में अधिकांश मीडिया हाउसों का स्वामित्व पूंजीपति घरानों के पास है. आमलोग इसके उपभोक्ता मात्र हैं. इनके जरिये आमजन की  भावनाओं की अभिव्यक्ति  एक सीमा तक ही सम्भव है. उनका पहला उद्देश्य अपने व्यावसायिक हितों की रक्षा होता है. आम जनता तक सही सूचना पहुंचाना अधिकांश पूंजीपति घरानों का मुख्य उद्देश्य नहीं होता. ऐसी सूचनाएं जिनसे उनके या उनके हितैषियों के हित बाधित होते हैं, उन्हें तोड़ने-मरोड़ने का निर्देश देने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता. उनके हॉउस में काम करने वाले पत्रकार ऐसे मौकों पर  मन मसोस कर रह जाते हैं. नौकरी करनी है तो प्रबंधन की शर्तों पर करनी होगी वर्ना आपकी कोई ज़रुरत नहीं. यही नहीं अख़बारों को अपने विज्ञापन दाताओं के हितों का भी ध्यान रखना होता है. इस चक्कर में भी सूचनाओं को तोडना-मरोड़ना या छुपाना, गलत ढंग से पेश करना पड जाता है. बाबा रामदेव के अनशन के दौरान अगर आप टीवी पर लाइव टेलीकास्ट देख रहे होंगे तो आपने गौर किया होगा कि देर रात पुलिस के हमले के बाद सुबह होते ही सभी खबरी चैनलों की भाषा बदल गयी थी. कुछ  परदे में और कुछ पूरी बेशर्मी के साथ यह साबित करने का प्रयास कर रहे थे कि बाबा के समर्थक उग्र और हिंसक हो गए थे और पुलिस को मजबूर होकर अश्रु गैस का इस्तेमाल करना पड़ा या लाठी चार्ज करना पड़ा या हवाई फायरिंग करनी पड़ी. कुछ ने तो हवाई फायरिंग की बात को भी एक सिरे  से नकारने की कोशिश की बावजूद इसके कि लाइव टेलीकास्ट में रायफल से गोली निकलने का दृश्य कई बार दिखलाया जा cहुका था. आखिर पुलिस की बर्बरता को सही ठहराने के प्रयास के पीछे क्या था. इसे आसानी से समझा जा सकता है. मैं मीडिया के अंदर के खेल के विस्तार में नहीं जाना चाहता सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि आप प्रिंट या इलेक्ट्रोनिक मीडिया के जरिये अपनी बातों को खुलकर नहीं रख सकते.
                 इंटरनेट एक सस्ता और सशक्त माध्यम के रूप में सामने आया है. आप मुफ्त में अपना मेल आईडी बना सकते हैं. सोशल वेब साईट्स पर अपना अकाउंट खोलकर अपनी बात व्यापक लोगों तक पहुंचा सकते हैं. अपना ब्लॉग शुरू कर सकते हैं. थोडा पैसा खर्च करें तो अपना वेबसाईट शुरू कर सकते हैं और उसे अपनी आमदनी का जरिया भी बना सकते हैं. आज भारत  में इंटरनेट युजर्स  की संख्या 10 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है. निश्चित रूप से अभी भी उसकी पहुँच  किसी पूरी दुनिया में ब्लोग्स और वेब साइट्स ने जोर पकड़ा. भारत में तहलका डाट कॉम ने और अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर विकीलिक्स ने बड़े-बड़े खुलासे कर पूरी दुनिया को चौंका दिया. मीडिया जगत की गलत प्रवृतियों को भड़ास फोर मीडिया डाट कॉम जैसे साइट्स ने खुलकर उजागर किया. आज भड़ास के समर्थकों की संख्या हजारों में पहुंच चुकी है. आप मुफ्त में अपना ब्लॉग बना सकते हैं और चंद सेकेंडों में अपनी बात पूरे विश्व तक पहुंचा सकते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लेखक, मुद्रक, प्रकाशक, प्रबंधक सबकुछ आप स्वयं होते हैं. आपको अपनी बात कहने से कोई नहीं रोक सकता. आप बहुत मामूली खर्च कर अपने ब्लॉग के लिए अलग डोमेन नेम रजिस्टर्ड करा सकते हैं. अपना अलग अभी अंग्रेजी और दूसरी विदेशी भाषाओँ के वेब साइट्स और ब्लोग्स की संख्या करोड़ों में है तो हिंदी में भी उनके विकास की गति काफी तेज़ है. हिंदी ब्लोग्स 10 हजार का आंकड़ा पार कर चुके हैं. हिदी वेब साइट्स, वेब पत्रिकाओं और पोर्टल्स की संख्या भी लाखों में है. हिंदी के ब्लोग्स अभी व्यावसायिक रूप नहीं ले सके हैं लेकिन इस और तेज़ी से बढ़ रहे हैं. गूगल की विज्ञापन प्रदाता एजेंसी एडसेन्स ने अभी तक हिंदी इंटरनेट पर हिंदी को मान्यता प्राप्त भाषाओँ की सूची में शामिल नहीं किया है लेकिन कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय  विज्ञापन एजेंसियों ने हिंदी को सपोर्ट करना शुरू किया है और आनेवाले चार-पांच वर्षों में उम्मीद की जाती है कि ब्लोगिंग का काम एक स्वतंत्र रोजगार का रूप ले लेगा. इस मीडिया में सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें लागत इतनी
मामूली है कि कोई भी इसे शुरू कर सकता है.
                          सरकार इंटरनेट पत्रकारिता के खतरे के प्रति असावधान नहीं है. हाल में उसने एक ऐसा कानून बनाया है जिसके जरिये वह जब चाहे किसी भी वेब साईट को ब्लॉक कर सकती है. लेकिन वह आपको तुरंत दूसरा साईट खोलने से रोक तो नहीं सकती. विभिन्न देशों की सरकारें चाहकर भी जब अश्लील साईट्स को ब्लॉक नहीं करा सकीं  तो जनता  की आवाज़  को कैसे ब्लॉक  करा सकेंगी. इस  माध्यम का नियंत्रण किसी सरकार के हाथ में नहीं है. मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि आनेवाले वर्षों में इंटरनेट मीडिया सबसे सशक्त मीडिया के रूप में उभरकर सामने आएगा . यही भविष्य का माध्यम बनने जा रहा है जिसके संकेत अभी से दिखाई दे रहे हैं.   


----देवेंद्र गौतम 


2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर और जानकारीपूर्ण लेख लिखा है आपने देवेन्द्र भाई.
    बहुत बहुत आभार.

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  2. इन्टरनेट सच में एक जबरदस्त माध्यम है . शायद यही जानकर बाबा रामदेव भी facebook पर उपलब्ध हो गए .

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