मंगलवार, जून 07, 2011

सपेरा बनते फिर सांप के बिल में हाथ डालते बाबा

जीवन में अनुभव का बड़ा महत्व होता है. अन्ना हजारे ने जब जंतर-मंतर पर आमरण अनशन किया था तो उसमें  सक्रिय सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में जनांदोलनों में लम्बे समय तक भागीदारी से मिले अनुभवों की झलक थी. उनकी अपनी छवि भी इसके अनुरूप थी. वह एक सुनियोजित कार्यक्रम था. सरकार से वार्ता के लिए चार लोग अधिकृत किये गए थे. राजनैतिक दलों के नेताओं को कार्यक्रम से दूर रखा गया था. कार्य विभाजन कर जिम्मेवारियां वितरित की गयी थीं. कार्यक्रम में पूरी तरह पारदर्शिता का निर्वहन किया गया था. बाबा रामदेव की सभा में पुलिस ने जिस बर्बरता का तांडव किया वह हैवानियत का चरम प्रदर्शन था. यूपीए सरकार का अक्षम्य अपराध. लेकिन यह सच है कि एक योग गुरु से आन्दोलनकारी नेता के रूप में अपने व्यक्तित्व के रूपांतरण में बाबा चूक गए. पुलिस के दमन पर उतरने के बाद अपने हजारों समर्थकों को उनके हाल पर छोड़कर उनका आयोजन स्थल से भाग खड़े होना अपरिपक्वता का परिचायक था. जब कमांडर ही मैदान छोड़ देगा तो सेना का क्या होगा. उन्हें अपनी जान की परवाह किये बिना स्थिति का पूरे साहस के साथ मुकाबला करना चाहिए था. ज्यादा से ज्यादा यही होता कि सरकार के इशारे पर उनकी हत्या कर दी जाती. लेकिन यदि ऐसा होता तो पूरे देश में इसकी जो प्रतिक्रिया होती उसे संभालने की ताक़त कम से कम मौजूदा सरकार में नहीं थी. उसका सत्ता में बने रहना कठिन हो जाता. ऐसा लगता है कि जनांदोलनों के अनुभवी और अभ्यस्त सिविल सोसाइटी के लोगों से उनहोंने इस कार्यक्रम के संबंध में कोई विचार-विमर्श नहीं किया.   
                       दूसरी बात यह कि सरकार के साथ यदि कोई लिखित समझौता हुआ था तो उसकी जानकारी सार्वजानिक करनी चाहिए थी. अनशन स्थल पर मौजूद लोगों को उसकी जानकारी देनी चाहिए थी. उसे जाहिर नहीं करना पारदर्शिता को संदिग्ध बना गया. सरकारी तंत्र की ओर से इसका खुलासा होने के बाद इसके औचित्य को सिद्ध करने के लिए जो भी तर्क गढ़े गए उनका कोई अर्थ नहीं है. 
                        योग और आंदोलन के बीच एक लक्ष्मण रेखा ज़रूर होना चाहिए था. अनशन का कार्यक्रम घोषित था तो फिर रामलीला मैदान की बुकिंग में आयोजन का उद्देश्य योग शिविर बताने की कोई जरूरत नहीं थी. जब दिल्ली में धरना के लिए जंतर-मंतर घोषित स्थल है तो यह आयोजन वहीं होना चाहिए था. रामलीला मैदान का इस निमित्त उपयोग नहीं करना चाहिए था. उपस्थित होने वाले लोगों की संभावित संख्या में इतना अंतराल नहीं रखना चाहिए था. इन त्रुटियों के जरिये दरअसल उन्होंने सरकार को दमन का बहाना दे दिया.
                        राजनीति को समझने वाले लोग किसी भी क्रिया की संभावित प्रतिक्रिया का अनुमान लगा लेते हैं और उसके लिए मानसिक तयारी कर लेते हैं. बाबा को कहीं ना कहीं यह भ्रम था कि पूरे देश में उनके अनुयायियों  की तादात देखने और प्रति लोगों सम्मान की भावनाओं को देखते हुए सरकार उनपर हाथ नहीं डाल सकेगी. पुलिस की दमनात्मक कार्रवाई उनकी कल्पना से परे थी. वे इसके लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थे. 
                         एक योगी राजनीति नहीं कर सकता ऐसा कत्तई नहीं है. लेकिन इस प्लेटफार्म को समझना और उसके तकाजों के अनुरूप आचरण करना पहली शर्त है. सांप के बिल में हाथ डालने के पहले एक सपेरे के तमाम गुर सीखने होते हैं. डसना तो सांप का स्वाभाविक गुण है. उसके बिल में हाथ डालेंगे तो वह डसेगा ही. उससे बचने का, उसके विष को असरहीन कर देने का तरीका सीखना होता है. बाबा ने इसकी अहमियत नहीं समझी. इसी का नतीजा उन्हें झेलना पड़ा.  
------देवेंद्र गौतम   
  

4 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sachche prasn uthaye aapne,bahut saarthak lekh,badhaai.




    please visit my blog.thanks.

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  2. आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच

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  3. main aapki baat se puri trh se sehmat hun jab vo itne bade kaam ko anjam dene aaye the to apne aapko puri trh taiyaar karke aana chahiye tha kayuki rajniti ke dav pech to yese hi hote hain unhone agar khud ko vahi rehne diya hota to aaj manjar kuch or hi hota ham phir bhi unke saath hai :)
    sundar or satik lekh

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