शनिवार, जून 04, 2011

तालाब के बाहर पनडुब्बे

बचपन में तालाब किनारे जाने से हमें यह कहकर रोका जाता था कि इसके अन्दर पनडुब्बे  रहते हैं जो तालाब किनारे खड़े लोगों को पानी के अंदर खींच ले जाते हैं और डुबाकर मार डालते हैं. फिर मरनेवाला भी पनडुब्बा बन जाता है. पनडुब्बा का मतलब होता था तालाब में डूबकर मरे हुए लोगों का प्रेत. जब भी तालाब के पानी में डूबकर किसी की मौत होती थी हमें वह पनडुब्बा का ही कारनामा लगता था.
                     आज उम्र के पांच दशक पार करने के बाद मुझे लगता है कि अब पनडुब्बे तालाब के बाहर निकल आये हैं और इंसानों के बीच रहने लगे हैं. जरा सी असावधानी बरतने पर वे किसी की भी लुटिया  डुबो देते हैं और डूबने वाले का उबर पाना मुश्किल हो जाता है. मेरे एक परिचित हैं. अभी वे करोड़ों के क़र्ज़ में डूबे हुए हैं. लेकिन उन्हें इसका कोई अफ़सोस नहीं है. वे नया क़र्ज़ लेने को हमेशा तैयार रहते हैं. नया कर्ज लेकर पुराना कर्ज चुकाना उनका शगल रहा है. वे अपने तमाम रिश्तेदारों और ईष्ट-मित्रों की लुटिया डुबा चुके हैं. किसी न किसी बहाने उनकी सारी जमा पूंजी लेकर उन्हें पैसे-पैसे का मोहताज बना चुके हैं. खुद भी फटक-सीताराम हैं. उनकी पत्नी तक नहीं जानती कि इतने सारे पैसों का उन्होंने किया क्या. उनके पास हमेशा कुछ ज़मीन के कागजात और रियल स्टेट के कुछ लाभदायक प्रोजेक्ट होते हैं. उन्हें सिर्फ पता चल जाये कि फलां साहब के पास पैसे हैं तो वे उनके ईर्द-गिर्द चक्कर लगाना शुरू कर देंगे. उन्हें किसी प्रोजेक्ट में पैसा लगाकर भारी मुनाफा कमाने का प्रस्ताव देंगे. उससे जितने पैसे लेंगे गारंटी के तौर पर उतने का पोस्टडेटेड चेक भी काटकर दे देंगे. पैसा निकलने तक उससे दिन रात फोन से बात करते रहेंगे. सुबह-शाम मिलते रहेंगे. जब पैसा मिल जायेगा तो फिर मुलाकात और बात का सिलसिला कम होना शुरू हो जायेगा और फिर न मुलाकात होगी न बात. मोबाइल का स्विच ऑफ रहेगा. ऑन रहा भी तो कॉल डाईभर्ट रहेगा या फिर फोन उठेगा नहीं. इत्तेफाक से आपने ढूँढकर मुलाकात कर ली तो कहेंगे अरे! मोबाइल आलमीरा में रख दी थी पता ही नहीं चला. आप कुछ नहीं कर सकेंगे. ज्यादा से ज्यादा चेक बाउंस कराकर धोखेधडी का मामला दर्ज करायेंगे. कोई बात नहीं. न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कई वर्ष सुनवाई में निकल जायेंगे. वकील तारीख पर तारीख लेता जायेगा. बहुत पहुँच वाले  हुए तो जेल भिजवा देंगे. इससे क्या होगा.एक दो महीने की जेल फिर बेल. यह तो कई बार हो चुका है. आप घर पर जाकर गाली-गलौज कर सकते हैं. इससे भी कुछ फर्क नहीं पड़ता. वह जनाब गालीप्रूफ़ हैं. एक कान से सुनते हैं दूसरे कान से निकाल देते हैं. अपने घर में ही कैदी की तरह रहते हैं. कोई खोजने आता है तो कहलवा देते हैं कि शहर के बाहर हैं. घरवाले उनके महाजनों की उल्टी-सीढ़ी बातें सुनने को विवश रहते हैं. उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. वे घर से बाहर निकलते भी हैं तो बहुत छुप-छुपाकर.शाम ढलने के बाद. काला शीशा लगी गाड़ी में. ऐसे  पनडुब्बे जीवन के हर क्षेत्र में मौजूद हैं. तालाब के अंदर के पनडुब्बों से तो आप बच सकते हैं लेकिन बाहर के पनडुब्बों से बच पाना मुश्किल है.  
----देवेंद्र गौतम 

4 टिप्‍पणियां:

  1. लगता है कि अब पनडुब्बे तालाब के बाहर निकल आये हैं और इंसानों के बीच रहने लगे हैं. बहुत सुंंदर पहली बार आपके ब्लॉग पर आया, आना सफल रहा। कुछ नया मिला। आपको बधाई, अच्छा लिखा है।

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  2. बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com

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  3. तालाब के बहार पंदुब्बे पढ़ कर मजा आया .सचमुच ऐसे पंदुब्बे ,आजकल यत्र- तत्र -सर्वत्र पाए जा रहे हैं |भगवान बचाए ऐसे सामाजिक पंदुब्बों से.
    आप यदा-कदा ,अरे भाई साधो को भी नवाजते रही |
    पवन

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  4. sach hai ab to sab pandubbe jameen par insanon ke sath hi rahte hai.....sunder aalekh...

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