मंगलवार, अप्रैल 19, 2011

आश्वासन नहीं सर के ऊपर छत चाहिए

 झारखंड में अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत सरकारी ज़मीन पर बसे लोगों को उजाड़ने का काम करीब दो महीने से चल रहा है. अभी तक कई हज़ार परिवार बेघर किये जा चुके हैं. इतना कुछ हो चुकने तक शांत बैठे पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिंहा के सीने में अचानक दर्द उठा और वे सोमवार 18 अप्रैल को उजड़े गए लोगों के पुनर्वास और इस अभियान पर रोक की मांग की मांग को लेकर रांची के बिरसा चौक पर अनशन पर बैठ गए. बाद में कैबिनेट की बैठक में इस मुद्दे पर हाई कोर्ट में संशोधन याचिका दायर करने के फैसले के बाद उन्होंने अनशन तोडा. सिंहा साहब भाजपा के वरीय नेता हैं. राज्य में भाजपानीत एनडीए की सरकार है. लाख टके  का सवाल है कि अपनी सरकार के समक्ष कोई मांग रखने के लिए उन्हें अनशन करने की क्या दरकार पड़ी और यह दर्द इतने विलम्ब से क्यों उठा. इसी तरह का  सवाल केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय  की इस मुद्दे पर भूमिका को लेकर भी उठता है. नागा बाबा खटाल के उजाड़ने पर मंत्री जी को खास परेशानी नहीं हुई लेकिन जब इस्लामनगर की और बुलडोजरों का रुख हुआ तो वे बेचैन हो गए और ईंट से ईंट बजाने का एलान करते हुए धरना पर बैठ गए. लाठी खाई और न्यायपालिका की अवमानना के आरोपी भी बने. उनके सीने में दर्द उठने का कारण था इस्लामनगर का उनके चुनाव क्षेत्र में होना. नागा बाबा खटाल उनके चुनाव क्षेत्र में नहीं था इसलिए दर्द नहीं उठा. अब एचइसी  इलाके से अतिक्रमण हटाने के सवाल पर वे मरने मारने की बात कह रहे हैं. उनकी पीड़ा का स्रोत समझ में आता है. उनका दर्द उजड़े गए आम लोगों के लिए नहीं बल्कि अपने वोटरों के लिए है. लेकिन यशवंत सिंहा का तो यह चुनाव क्षेत्र भी नहीं है. दरअसल गरीब वर्ग के लोगों को जिस अमानवीय ढंग से उजाड़ा गया है. अब सरकार अमीरों को किसी तरह की राहत देने का नैतिक साहस नहीं जुटा सकती. जो बुलडोजर गरीबों की झोपड़ियों पर चले अब उनका रुख अमीरों के बंगलों की तरफ होने का वक़्त आ गया है. यशवंत सिंहां साहब की सहानुभूति संभवतः इसी वर्ग के साथ है. इसी आशंका ने उन्हें बेचैन कर दिया. अब कोर्ट में मामला उलझने के बाद उन्हें राहत मिल जाएगी.
           उजाड़े गए लोगों के प्रति सहानुभूति तो विधान सभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और तमाम पक्ष विपक्ष के नेता प्रकट कर रहे हैं. दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने भी उनके पुनर्वास की मांग की है. उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तो पुनर्वास स्थल तक का चयन कर चुकने का एलान कर चुके हैं. लेकिन ज़मीनी स्तर पर अभी तक इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं सुनाई दे रही है. सच्चाई यह है कि यह अभियान कोई अचानक शुरू नहीं हुआ. हाई कोर्ट के आदेश के बाद इसके लिए काफी तैयारी करनी पड़ी. आज घडियाली आंसू टपकाने वाले सरकार में बैठे जनता के नुमाइंदे यदि चाहते तो इस बीच पुनर्वास की व्यवस्था कर सकते थे.लेकिन उस वक़्त उन्हें न तो इसका ध्यान रहा और न ही इसकी ज़रूरत महसूस की. अभी भी वे पुनर्वास की बात तो कर रहे हैं लेकिन इसके लिए कोई पहल नहीं कर रहे हैं. उजड़े हुए लोग. अपने परिजनों के साथ जहां तहां भटक रहे हैं. आश्वासन तो बहुत लोग दे रहे हैं लेकिन सर के ऊपर छत कोई नहीं दे रहा है. इस आंच में सिर्फ राजनैतिक स्वार्थ की रोटियां सेंकी जा रही हैं. यही विडंबना है.

------देवेंद्र गौतम    

1 टिप्पणी:

  1. अह्द ओ पैमान जो देती है सियासत हम को
    ऐसे वादों की है मालूम हक़ीक़त हम को
    मुझे बस यही कहना है

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