गुरुवार, अप्रैल 14, 2011

खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे.


दो कदम पीछे हटे हैं वो अभी 
एक कदम आगे निकलने के लिए.
ये सियासत का ही एक अंदाज़ है 
झुक गए हैं और तनने के लिए....

सौजन्य-- गूगल सर्च 
        अपने गजलों के ब्लॉग  गज़लगंगा पर मैंने 12 अप्रैल को यह कत्ता पोस्ट किया था जब पूरा देश जन दबाव के आगे सरकार के झुकने को विवश होने को लोकतंत्र की जीत मानकर जश्न मना रहा था. अन्ना हजारे ने दरअसल इस मुद्दे के जरिये एक पूरी व्यवस्था को निशाने पर लिया था. कोई स्थापित व्यवस्था इतनी जल्दी हार नहीं मानती. उसका पीछे हटना दरअसल एक आक्रामक युद्ध की तैयारी का ही हिस्सा था. जन लोकपाल विधेयक के दस्तावेजीकरण में जन भागीदारी की शर्त स्वीकार कर लेने के जरिये तत्काल मामले को टाल देना भर इसका उद्देश्य था. अब इस व्यवस्था में रचे बसे तमाम दल और व्यक्ति अन्ना हजारे के खिलाफ मोर्चा खोल बैठे हैं. आडवाणी जैसे जिम्मेवार नेता उन्हें चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहे हैं. उन्होंने महात्मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण का दौर भी देखा है. उनलोगों ने कभी चुनाव नहीं लड़ा था तो  फिर उनकी आवाज़ पर जनसमूह क्यों उमड़ पड़ता था..? क्या आडवाणी जी चुनाव लड़ने और संसदीय संस्थाओं में पहुंच जाना ही लोकप्रियता और जन स्वीकार्यता की एकमात्र कसौटी मानते हैं..? यदि ऐसा है तो क्या वे उस व्यवस्था का पक्षपोषण नहीं कर रहे जिसके खिलाफ जंतर मंतर से एक सांकेतिक युद्ध का बिगुल फूंका गया था. उन्हें 1977 का जमाना विस्मृत हो गया जब इंदिरा गांधी जैसी करिश्माई नेत्री की सल्तनत धराशायी हो गयी थी. लोकनायक जेपी ने खुद तो चुनाव नहीं लड़ा था लेकिन उनके आशीर्वाद से एक अजेय समझी जानेवाली सरकार गिर गयी थी और एक बहुमत की सरकार बन गयी थी. अन्ना हजारे एक सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं . निर्विवाद हैं इसलिए उनके पीछे इतना बड़ा जनसैलाब उमड़ आया. यदि वे चुनाव लड़ना चाहेंगे तो वे एक पूरी बारात लेकर संसद में पहुंचेंगे. सत्ता के खिलाडियों को इस बात का खटका है इसीलिए उन्होंने अन्ना हजारे के खिलाफ मोर्चा खोला है. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की चिंता यह है कि इतने बड़े आन्दोलन के लिए धन कहां से आया. उनकी चिंता लाजिमी है. जिस राजनैतिक परिवेश में वे पले-बढे हैं उसमें पैसे के बल पर ही सारे काम होते हैं. हर कार्यक्रम के लिए कुछ गुप्त कुछ खुले प्रायोजक होते हैं. यदि कांग्रेस ने यह आमरण अनशन का कार्यक्रम आयोजित किया होता तो उसका बज़ट निश्चित रूप से करोड़ों में होता. वे सोच भी नहीं सकते कि देश के विभिन्न इलाकों के लोग बिना पैसा लिए, बिना आवागमन की सुविधा प्रदान किये अपने खर्च से दिल्ली आ सकते हैं. विभिन्न शहरों में लोग बिना किसी प्रायोजक के अनशन पर बैठ सकते हैं. आमजन की इस भावनात्मक ज्वाला की आंच उन्होंने कभी न देखी  न महसूस की तो वे और सोच भी क्या सकते हैं. 
                    राजनैतिक दलों के अलावा अन्ना के खिलाफ एक मोर्चा उनके आन्दोलन के धर्मनिरपेक्ष साथियों ने भी खोल रखा है. उन्हें इस बात से नाराजगी है कि अन्ना ने नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार के कार्यों की सराहना क्यों की. उन्हें आदर्श मुख्यमंत्री कैसे कह दिया. जिस सन्दर्भ में यह बात कही गयी उसे वे नज़रंदाज़ कर रहे हैं. नीतीश कुमार पर तो एनडीए का सहयोगी होने के अलावा वे कोई आरोप नहीं मढ़ सकते लेकिन नरेन्द्र मोदी को गोधरा कांड और गुजरात दंगे का आरोपी होने के नाते सांप्रदायिक करार दे सकते हैं. सवाल उठता है क्या अन्ना ने मोदी की सराहना गोधरा कांड या गुजरात दंगे में भूमिका के लिए की है...? उन्होंने ग्रामीण विकास के निमित्त उनके कार्यों की प्रशंसा  करते हुए अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों को  ऐसा ही करने की सलाह दी थी. अगर यूपीए या वामदलों का कोई ऐसा मुख्यमंत्री उनकी नज़र में हो जिसने ग्रामीण विकास का इससे बेहतर कार्य किया हो तो उन्हें बताना चाहिए कि नहीं अन्ना दा ग्रामीण विकास तो फलां मुख्यमंत्री ने इनसे कहीं ज्यादा बेहतर किया है. किसी व्यक्ति के आचरण और व्यवहार के कई पक्ष होते हैं. उसके पूरे व्यक्तित्व को एक ही तराजू से तौला जाना  उचित नहीं है. नरेन्द्र मोदी यदि सिर्फ एक सांप्रदायिक व्यक्ति हैं तो  गुजरात की जनता उन्हें उखाड़ फेंकने का काम क्यों नहीं कर रही. 
                  अन्ना हजारे दरअसल एक सीधे-सादे सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं. वे कोई राजनैतिक व्यक्ति नहीं हैं. वे सरल ह्रदय के साफ सुथरे इंसान  हैं. गलत चीजों का गांधीवादी तरीके से विरोध करने का उनके अन्दर साहस है. 
निर्विवाद होने के कारण ही उनके आन्दोलन का इतना व्यापक जन समर्थन मिला. व्यवस्था के पोषकों और संचालकों का उनसे डरना लाजिमी है. इसीलिए उस वक़्त मौके की नजाकत को देखते हुए एक कदम पीछे हटकर उनकी तमाम मांगें स्वीकार कर लेने वाली राजसत्ता अब उनकी जमात में फूट डालकर उनके मुहिम को कमजोर करने के प्रयास में लगी है. इसमें कुछ हद तक सफलता भी मिल रही है. लेकिन युवा वर्ग और भारत की 120 करोड़ जनता का अन्ना में जो विश्वास है वह हवा के इन झोंकों से डिगने वाला नहीं दीखता. यह बदलाव की आंधी की पूर्व सूचना है. इसका विरोध करने वाले इस आंधी में कहां जाकर गिरेंगे अभी वे इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते.
------देवेंद्र गौतम

5 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही और सार्थक लेख है
    सच है कि कुछ राजनीतिज्ञ तो सोच भी नहीं सकते कि पैसे के ्बिना भी जन समर्थन जुटा पाना सम्भव है
    बढ़िया पोस्ट !

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  2. यह बदलाव की आंधी की पूर्व सूचना है. ....सही कहा...सार्थक आलेख..

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  3. सार्थक लेख ...सरकार तो हर काम के लिए बजट बनाती है ..बिना बजट के कैसे उनका कोई काम हो सकता है ...

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