शनिवार, मार्च 26, 2011

इंतज़ार के सात घंटे.....

ट्रेन या बस का लम्बा इंतज़ार करना पड़े और समय काटने का कोई जरिया न मिले तो इंसान क्या करे. 24  मार्च को मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ. दोपहर करीब तीन बजे पटना गांधी मैदान स्थित सरकारी बस स्टैंड पहुंचा. वहां से रांची के लिए 10 बजे रात को बस थी. बस का टिकट मिल गया. पहली ही सीट भी मिल गयी. लेकिन कंधे पर बैग टांगे इस बीच के 7 घंटे कैसे बिताये जायें यह सवाल था. बस स्टैंड में कोई क्लॉक  रूम नहीं होता जहां आप सामान रखकर घूम-फिर सकें. औरंगाबाद के शायर मित्र प्रदीप रौशन और संगीतकार पार्थ आरा से अपनी मारूति कार पर   यहां तक लाये थे और मेरे निश्चिंत होने तक रुके रहने के मूड में थे. मैंने सोचा कि  क्यों उनका वक़्त बर्बाद किया जाये. कह दिया कि मैं एक दो घंटे साइबर कैफे में बैठूंगा. फिर शाम को करीब के किसी सिनेमा हॉल में फिल्म देखूंगा. तबतक बस का टाइम हो जायेगा. वे चले गए. मैंने बीएन कॉलेज के आसपास साइबर कैफे की तलाश की लेकिन कहीं जगह नहीं मिली. पब्लिकेशन डिविजन में घुसा काफी देर तक किताबें देखता रहा. कुछ किताबें खरीदीं फिर बैग लटकाए बाहर निकल आया. एक घंटा कट गया. 6 घंटे काटने बाकी थे.  साइबर कैफे का आइडिया ड्रॉप कर दिया था. गांधी मैदान के पास आया. पुरानी किताबों के फुटपाथी स्टालों का चक्कर लगाया. एक घंटे और बीते. अब सिनेमा के शो का वक़्त करीब था. सोचा टिकट तो ले लूँ. एक हॉल में भोजपुरी फिल्म महोत्सव चल रहा था. काफी भीड़ थी. टिकट मिलने की उम्मीद नहीं थी. दो सिनेमा हॉल बंद मिले. उनमें सिविल वर्क चल रहा था. मैं समझ गया...हॉल को बंद कर मॉल या मल्टीप्लेक्स खोलने की तैयारी होगी. ज़मीन का रेट इतना बढ़ चुका है और सिनेमा हॉल में लाभ की गुंजाइश इतनी कम हो गयी है कि सिर्फ सिनेमा हॉल चलाना बेवकूफी मानी जा रही है. रांची के भी अधिकांश हॉल इसी चक्कर में बंद हो गए हैं. बहरहाल सिनेमा हॉल में समय बिताने की योजना फेल हो गयी. सोचने लगा  कि नीतीश जी सबकी समस्याएं हल करने का प्रयास कर रहे हैं तो रेल और बस के यात्रियों के इंतज़ार का समय काटने के लिए कुछ मनोरंजन के साधन उपलब्ध करने पर भी उन्हें विचार करना चाहिए. राजस्व भी मिलेगा और यात्रियों की दुवायें भी. झारखंड में तो नेताओं को सत्ता की छीना झपटी से ही फुर्सत नहीं. लेकिन नीतीश जी सोच भी सकते हैं और कर भी सकते हैं. बहरहाल मेरे पास अभी भी चार घंटे से ज्यादा समय काटने की समस्या  थी. बैग भी भारी  लग  रहा  था . बस स्टैंड  के आसपास की चाय नाश्ते  की  दुकानों पर घूम-घूम कर बाकी वक़्त गुज़ारना ही बेहतर विकल्प था. वही किया. राम-राम कर करीब नौ बजे रात को बस में घुसने की नौबत आई. बस की सीट पर बैठकर अंतिम एक घंटे काटे. बस समय पर खुल गयी. सुबह के वक़्त रांची पहुँच भी गया लेकिन वह इंतज़ार के सात घंटे अखर गए .

-----देवेंद्र  गौतम       

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