बुधवार, मार्च 09, 2011

चोरी भी सीनाजोरी भी....



झारखंड के  लातेहार जिले के एक सामाजिक कार्यकर्ता नियामत अंसारी की नक्सलियों ने हत्या कर दी. 3 मार्च को उन्हें उनके गांव जेरुआ से उठाकर बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला गया. वे ग्राम स्वराज अभियान के सक्रिय कार्यकर्ता थे और गांव-गांव जाकर मनरेगा योजना के सही ढंग से क्रियान्वयन के लिए जागरूकता अभियान चलाते थे. सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का अंकेक्षण करते थे. उनका जीवन समाज के सबसे कमजोर वर्ग के लिए समर्पित था. प्रखंड स्तर पर विकास योजनाओं की राशि की लूट में लगे बिचौलियों, ठेकेदारों और सरकारी आधिकारियों को उनकी गतिविधियां फूटी आंखों नहीं सुहाती थीं तो इसमें कोई हैरत की बात नहीं क्योंकि उनके स्वार्थ बाधित होते थे. लेकिन नक्सलियों की उनसे नाराजगी का कारण समझ में नहीं आता. जिस वर्ग के लिए उन्होंने बारूद की खेती शुरू की है. नियामत भी उसी वर्ग को उसका हक दिलाने के लिए लड़ रहे थे. बिचौलिए और ठेकेदार अगर उन्हें जनता को भड़काने वाला और विकास में बाधा डालने वाला आदमी समझते थे तो कम से कम नक्सलियों को उन्हें गरीबों का साथी मानना चाहिए  था. यह हत्या नक्सली आंदोलन के भटकाव का एक जीता जागता उदाहरण है. इससे इस बात का संकेत मिलता है कि नक्सलियों का एक हिस्सा ठेकेदारों, बिचौलियों और भ्रष्ट अधिकारियों के लूटतंत्र का हिस्सा बन चुका है और बाजाप्ता उनकी निजी सेना के रूप में काम कर रहा है. बन्दूक आगे निकल  गया है. सिद्धांत पीछे छूट गए हैं. भारत का भ्रष्ट तंत्र इतना ढीठ हो चुका है कि किसी किस्म का विरोध सहन नहीं कर पाता. उग्रवादियों और आतंकवादियों का वित् पोषण कर उन्हें भी अपना लठैत बना लिया है. झारखंड में इससे पहले भी सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है. उनका खून पचाया भी जा चुका है. इसी तरह एक दलित सामाजिक कार्यकर्ता मंगला राम की हत्या राजस्थान के बाड़मेर जिले के बमनौर गांव में कर दी गयी. उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत सरपंच से विकास कार्यों की जानकारी मांगी थी और दी गयी जानकारी से असंतुष्ट होकर अपील में चले गए थे. सरपंच ने भरी पंचायत में उन्हें मार डाला. अब लूट और भ्रष्टाचार का तंत्र इतना ताक़तवर होता जा रहा है कि उससे लड़ना साधारण लोगों के बूते की बात नहीं रह गयी है. आज़ाद भारत की यही त्रासदी है.

----देवेन्द्र गौतम      

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