सोमवार, नवंबर 28, 2011

अरबों की दौलत मगर किस काम की


हाल में मेरे चचेरे भाई नगेन्द्र प्रसाद रांची आये. उन्होंने एक मसला रखा जिसने कई सवाल खड़े कर दिए.. वे घाटशिला में रहते हैं. घाटशिला झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले का का एक पिछड़ा हुआ अनुमंडल है. यहां कुल आबादी में 51 % आदिवासी हैं. सिंचित ज़मीन 20 % भी नहीं. कुछ वर्षा आधारित खेती होती है लेकिन बंज़र ज़मीन काफी ज्यादा है. नगेन्द्र जी ने एक आदिवासी परिवार के बारे में बताया जिसके पास 250 बीघा ज़मीन है लेकिन आर्थिक स्थिति साधारण है. उस परिवार के युवक अपनी ज़मीन मोर्गेज रखकर यात्री बस निकालना चाहते हैं. इसमें वे मदद चाहते थे. जानकारी मिली कि आदिवासी ज़मीन मॉर्गेज नहीं होती. राष्ट्रीयकृत बैंक, प्राइवेट बैंक या प्राइवेट फाइनांसर भी इसके लिए तैयार नहीं होते. कारण है टेनेंसी एक्ट. जिसके प्रावधान के अनुसार आदिवासी ज़मीन उसी पंचायत और उसी जाति का कोई आदिवासी ही उपायुक्त की अनुमति लेकर खरीद सकता है. अन्यथा उसकी खरीद-बिक्री नहीं हो सकती. बिरसा मुंडा के आंदोलन उलगुलान के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह एक्ट बनाया था.

शुक्रवार, नवंबर 25, 2011

जनजीवन को जटिल बनाते अपराधी

मुट्ठी भर अपराधी और कमजोर सरकारी तंत्र आम आदमी के जीवन को जटिल बनाते जा रहे हैं. किसी ज़माने में एक खाताधारी की पहचान पर बैंक बैंक अकाउंट खुल जाता था अब इसके लिए कई तरह के दस्तावेज़ प्रस्तुत करने पड़ते हैं. ट्रेन में सफ़र करना हो किसी दूसरे शहर में होटल में ठहरना हो तो पहचान पत्र की ज़रुरत पड़ती है. आमलोगों के लिए यह पहचान पत्र हासिल करना आसमान से तारे तोड़ लेन के समान है.

सोमवार, नवंबर 14, 2011

आणविक सृष्टि बनाम रासायनिक सृष्टि

जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में कई अवधारणाएं प्रचलित रही हैं. भौतिक भी और आध्यात्मिक भी. भौतिकवाद की अवधारणा मुख्य रूप से डार्विन के विकासवाद पर टिकी है जिसमे पानी के बुलबुले में रासायनिक तत्वों के समन्वय से एककोशीय जीव अमीबा और फिर उससे तमाम जलचरों, उभयचरों, थलचरों और नभचरों की एक लंबी प्रक्रिया के तहत उत्पत्ति और विकास की बात कही गयी है. एक हद तक कोशा (सेल) विभाजन के बाद नर-मादा के अस्तित्व में आने और मैथुनी सृष्टि की बात कही गयी है. यह अवधारणा काफी वैज्ञानिक और विश्वसनीय भी लगती है.
इधर अध्यात्म की दुनिया में नज़र दौडाएं तो विभिन्न धर्मों में जीवन की उत्पत्ति की अवधारणाएं प्रस्तुत की गयी हैं लेकिन सबका सार यह है कि इस सृष्टि और उसमें जीवन की उत्पत्ति एक महाशून्य से हुई है. दुर्गा सप्तसती के प्राधानिकं रहस्यम के मुताबिक त्रिगुणमयी महालक्ष्मी ही पूरी सृष्टि का आदि कारण हैं. वे दृश्य (साकार) और अदृश्य (निराकार) रूप से सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त कर स्थित हैं. उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को शून्य देखकर तमोगुण से चतुर्भुजी महाकाली और सत्वगुण से महासरस्वती को प्रकट किया.इसके बाद उन्हें नर और मादा के जोड़े उत्पन्न करने को कहा. खुद भी एक जोड़ा उत्पन्न किया जिससे ब्रह्मा, विष्णु, शिव नर और लक्ष्मी, सरस्वती और गौरी मादा के रूप में प्रकट हुए. यहां से मैथुनी सृष्टि की शुरुआत हुई. मैथुनी सृष्टि को हम रासायनिक सृष्टि भी कह सकते हैं.
इससे यह परिलक्षित होता है कि मैथुनी सृष्टि के पहले महाशून्य से अमैथुनी सृष्टि हुई थी. महाशुन्य यानी कॉस्मिक रेज. कॉस्मिक रेज से ही परमाणुओं की उत्पत्ति मानी जाती है. या फिर अणुओं तो तोड़ते जाने के बाद अंत में कॉस्मिक रेज या एब्सोल्यूट एनर्जी शेष बचता है. इस एब्सोल्यूट एनर्जी से ही परमाणुओं की उत्पत्ति होती है. इसका सीधा सा अर्थ यह है कि  मैथुनी सृष्टि के पहले आणविक सृष्टि हुई थी या दोनों सृष्टियाँ कुछ समय तक समान रूप से जारी रही थीं. आणविक सृष्टि से उत्पन्न हुए लोग अपने शरीर के परमाणुओं को  इच्छानुसार संगठित या विघटित कर सकते थे. वे मनचाहा आकार या स्वरूप धारण कर सकते थे. उनका व्यक्तित्व भी तीन गुणों सत्व, रज और तम से संचालित होता था लेकिन वे आणविक होने के कारण शक्तिशाली और जीवन मरण के चक्र से परे अर्थात अमर थे. इस वर्ग के जीवों को ही हिन्दू धर्म में देवता और एनी धर्मों में फ़रिश्ता या देवदूत माना गया और सर्वव्यापी बताया गया. तमाम जीवधारी रासायनिक सृष्टि से आणविक सृष्टि में परिणत होने के प्रयास में लगे रहते हैं. यह साधना के जरिये अपनी चेतना को सूक्ष्मतम अवस्था में पहुंचाने के जरिये ही संभव है. तमाम पूजा पद्धतियां इसका मार्ग ही प्रशस्त करती हैं.

-----देवेंद्र गौतम 


(इस अवधारणा पर आपके विचार आमंत्रित हैं)

रविवार, नवंबर 06, 2011

टीम अन्ना को संयम और समन्वय की ज़रूरत

अन्ना हजारे ने अपना ब्लॉग बंद करने का ऐलान किया है. उनकी नाराजगी का कारण उनका पत्र  समय से पहले सार्वजनिक कर दिया जाना है. उनहोंने जिस पत्रकार को ब्लॉग के संचालन का जिम्मा दिया था उसने यह गलती की है. इसे आपसी समन्वय का अभाव और अति उत्साह का नतीजा ही कहेंगे. टीम अन्ना के सदस्य किसी मसले पर आपस में सलाह मश्वरा करना और सार्वजनिक बयान देने अन्ना से बात करने या सोचने समझने की ज़रूरत नहीं समझते. उनहोंने अपने को भ्रष्टाचार विरोध का चैम्पियन और भारतीय जनमानस की आवाज़ मान लिया है. यही कारण है कि वे विवादास्पद बयान जारी कर दे रहे हैं. प्रशांत भूषण कश्मीर पर विचार प्रकट कर पीटाई खा जा रहे हैं तो  अरविंद केजरीवाल जूते का प्रहार झेल रहे हैं. बयान देने के मामले में स्वयं अन्ना भी संयम नहीं बरत रहे. अडवाणी की रथयात्रा के पूर्व उनकी सलाह ठीक ऐसी ही थी. अडवाणी की यह कोई पहली रथयात्रा नहीं थी. यह उनकी राजनैतिक शैली का हिस्सा रही है. यदि वे भ्रष्टाचार के विरोध में रथयात्रा कर रहे थे तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार था. अन्ना को कोई भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का कॉपी राईट नहीं मिल गया है. इस बात को समझना चाहिए.
अन्ना के आंदोलन में जो अपार जनसमूह उमड़ पड़ा था वह इसलिए कि उन्होंने आम जनता के आक्रोश को स्वर दिया था. उनकी छवि साफ़ सुथरी थी और उनके अन्दर परिवर्तन की लम्बी लड़ाई के नेतृत्त्व की क्षमता दिखी थी. लेकिन वे यह बात नहीं समझ पाए कि उनकी लड़ाई बड़े ही भ्रष्ट और शातिर किस्म के लोगों के साथ है जो पल में तोला और पल में रत्ती करने की कला में माहिर हैं. दरअसल टीम अन्ना अपनी प्रारंभिक जीत को पचा नहीं पाई और अति-उत्साह में उल-जुलूल हरकतें करने लगी. कांग्रेस उनके छिद्रान्वेषण में लगी रही और कुछ छिद्र ढूंड भी निकाले. निश्चित रूप से यह सबक सिखाने का अभियान था. इसके जरिये कांग्रेस ने अपने असली चरित्र को ujagar किया. उसने बताया कि काला धन वापस लाने की बात करोगे तो आधी रात को पीटाई होगी और भ्रष्टाचार विरोध करोगे तो तुम्हारी चड्ढी भी उतार फेकेंगे. इस किस्म के लोगों से लड़ने के लिए बड़े धैर्य और कूटनीतिक दक्षता की ज़रूरत होती है. यह माफियाई किस्म के आर्थिक लुटेरों का गिरोह है. इसके हाथ में दानवी ताक़त है. सीधे-सादे लोगों को ये नचाकर फेंक देंगे.
लेकिन यह भी सच है कि अब भारत के लोग राजनीति की माफियाई और मायावी संस्कृति को ज्यादा दिनों तक नहीं बर्दास्त  कर पाएंगे. उन्हें विकल्प की तलाश है. टीम अन्ना यदि विकल्प बन दे पाई तो ठीक नहीं तो कोई दूसरी ताक़त मैदान में आएगी. परिवर्तन की जन-आकांक्षा कोई swaroop तो ग्रहण करेगी ही.

-----देवेंद्र गौतम 

गुरुवार, अक्तूबर 13, 2011

घोटाले का असली सूत्रधार?


घोटाले का असली सूत्रधार?

imageपूर्व दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन
2जी घोटाले में ए राजा और कलैनार टीवी को मिली 200 करोड़ की घूस तो उस रकम के मुकाबले बहुत छोटी है जो मारन बंधुओं को मैक्सिस समूह से मिली. आशीष खेतान और रमन किरपाल की तहकीकात
तमिलनाडु की सत्ता एक बार फिर संभालने के बाद मुख्यमंत्री जयललिता 14 जून को प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली आई थीं. इस मुलाकात के बाद उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें तमाम बातों के अलावा उन्होंने यह मांग भी कर डाली कि केंद्र सरकार में कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन अगर खुद इस्तीफा नहीं देते तो प्रधानमंत्री को ही उन्हें हटा देना चाहिए.
जयललिता की यह मांग तहलका की उस तहकीकात के बाद आई थी जो साफ इशारा करती है कि संचार मंत्री रहते हुए मारन ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए एयरसेल कंपनी के पूर्व प्रमुख शिवशंकरन पर इस बात के लिए दबाव डाला कि वे अपनी कंपनी मैक्सिस समूह को बेच दें. इसके एवज में इस मलेशियाई कारोबारी समूह ने मारन बंधुओं को 700 करोड़ रु का फायदा पहुंचाया. कोई भ्रष्टाचार यदि सरकारी अधिकारियों और निजी क्षेत्र के लोगों की सांठ-गांठ से हुआ हो तो जांच एजेंसियां उसकी जांच करते हुए अक्सर लेन-देन का साक्ष्य जुटाने की कोशिश करती हैं. यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि सरकारी अधिकारी को घूस कैसे दी गई. नकद या फिर किसी और तरीके से.
इस साल जनवरी में सीबीआई ने एक रियल एस्टेट कंपनी के मालिक शाहिद उस्मान बलवा और कलैनार टीवी के बीच हुए लेन-देन का पता लगाया था. जब बलवा की कंपनी स्वान टेलीकॉम को बेशकीमती 2जी स्पेक्ट्रम आवंटित हो गया तो इसके बाद बलवा की कंपनी ने द्रमुक सुप्रीमो करुणानिधि के परिवार के स्वामित्व वाले कलैनार टीवी को 200 करोड़ रुपये हस्तांतरित किए थे. सीबीआई ने करुणानिधि की बेटी और इस टीवी चैनल में 20 फीसदी की हिस्सेदार कनिमोरी को गिरफ्तार करने के लिए इस साक्ष्य को पर्याप्त माना था. 26 अप्रैल को दाखिल किए गए पूरक आरोपपत्र में जांच एजेंसी ने कहा था कि यह लेन-देन वैध नहीं था बल्कि इसकी प्रकृति से पता चलता है कि यह यूनिफाइड एक्सिस सर्विस लाइसेंस (यूएएसएल), स्पेक्ट्रम और गलत तरीके मिले अन्य फायदों के एवज में स्वान टेलीकॉम द्वारा दी गई घूस थी.
अहम सवाल यह है कि क्या मैक्सिस-सन टीवी और मैक्सिस-सन एफएम सौदा इस हाथ दे-उस हाथ ले वाली तर्ज पर हुआ था

शनिवार, सितंबर 24, 2011

कितना कमाते हैं भारतीय मंत्री?


क्या आप जानते हैं कि भारत सरकार के मंत्री कितना कमाते हैं या उनकी संपत्ति किस रफ़्तार से बढ़ती है?
आप कितने भी कल्पनाशील हो जाएँ तो वहाँ तक नहीं पहुँच सकते जो आंकड़े बताते हैं.
प्रधानमंत्री कार्यालय को जो विवरण इन मंत्रियों ने दिए हैं उसी के आधार पर देखें तो मंत्रियों की संपत्ति दो वर्षों में औसतन 3.3 करोड़ बढ़ गई है.
ये सिर्फ़ औसत है. एक मंत्री की संपत्ति तो वर्ष 2009 से 2011 के बीच 1092 प्रतिशत बढ़ गई है. जबकि दो और मंत्रियों की संपत्ति 828 और 705 प्रतिशत बढ़ी है.
जिस एयर इंडिया के पास अपने कर्मचारियों को तनख़्वाह बाँटने के लिए पैसों के लाले पड़े थे उसी विभाग के मंत्री रहे प्रफ़ुल्ल पटेल की संपत्ति 2009 से 2011 के बीच 42.20 करोड़ रुपए बढ़ी है.

सोमवार, सितंबर 05, 2011

झूठ के नामकरण —डॉ अखिलेश बार्चे


पहाँ दादा पायलागी! कैसे हैं. . .? कल जैसे ही दुकान के शुभारंभ का समाचार मिला मन प्रसन्न हो गया। अब आऊँगा तो लडडू ज़रूर खाऊँगा. . .सब आकी कृपा है. . .जी हाँ जी हाँ. . .।"
दूरभाष पर कवि – मित्र की दूर शहर में रहने वाले एक वरिष्ठ कवि से बातचीत हो रही है। कवि मित्र बात करते समय यों झुके हुए थे, मानो चरण स्पर्श करने के बाद रीढ़ सीधी करने का समय ही नहीं मिल पा रहा हो। वास्तव  में वे एक ऐसे सज्जन से बात करने में लगे थे जिनकी पहुँच पुरस्कार/चयन समितियों में अच्छी थी, और जो जुगाड़मेंट के क्षेत्र में माहिर माने जाते थे। कविमित्र को जैसे ही पता लगा कि इन सज्जन के तीसरे बेटे ने एस.टी.डी., पी.सी.ओ., फ़ोटोकॉपी की दुकान खोली है, उन्होंने तुरंत अवसर का लाभ उठाया और दूरसंचार विभाग के तारों पर सवार होकर उनके पाँव छू लिए।

हनुमान किसके हैं —अनुराग वाजपेयी


भगवान राम अयोध्या लौट आए थे। धोबी के कहने पर लोकापवाद के डर से सीता माता को घर से निकाल चुके थे। समय काफी रहता था सो राजकाज में काफी ध्यान देने लगे थे औऱ दरबार देर रात तक चलता रहता था। मर्यादा पुरुषोत्तम का दरबार था इसलिए सब कुछ संयमित रहता था। नीति और आदर्श की बातें होतीं और शिष्ट हास-परिहास चलता रहता। एक दिन अचानक एक अमर्यादित घटना हुई और उसे अंजाम भी दिया राम के परम भक्त हनुमान जी ने। वे तमतमाते हुए आए और बिना अभिवादन किए रामचंद्र जी बोले, ''मैं जा रहा हूँ अब नहीं लौटूँगा ये रखिए त्यागपत्र।

शनिवार, सितंबर 03, 2011

जिस रोज़ मुझे भगवान मिले


जिस रोज़ मुझे भगवान मिले तरुण जोशी

'ना माया से ना शक्ति से भगवन मिलते हैं भक्ति से', एक खूबसूरत गीत है और इसको सुनने के बाद लगा कि अगर मिलते होते तो भी प्रभु हमको मिलने से रहते। क्योंकि माया हमें वैसे ही नहीं आती, शक्ति हममें इतनी है नहीं और भक्ति हम करते नहीं, तो कुल जमा अपना चांस हुआ सिफ़र। लेकिन वो कहते हैं ना कि बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले ना भीख तो एक दिन बिन बुलाए मेहमान से भगवान हम से टकरा ही गए। अब इससे आगे का हाल अति धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत सज्जन और देवियाँ ना पढ़ें, इसको पढ़कर आपके मन के क्षीरसागर में उठने वाले तूफ़ान के हम ज़िम्मेदार नहीं होंगे और हमें गालियाँ देने को उठने वाले उफान के आप खुद ज़िम्मेदार होंगे।
भयानक रात में ट्रैक से लौटते हुए जंगल में जब रास्ता भटक गए तो ऐसी परेशानी में हमेशा की तरह अपने खुदा को सोते से जगाने की गुहार लगाई और तभी एक आदमी हमें दिख गया। साधारण से कपड़े पहने थे उसने, एक दो जगह से हवा आने के लिए कपड़ों में बनाई खिड़कियाँ भी नज़र आ रही थी। मिलते ही हमने कहा, भय्या हम रास्ता भटक गए हैं सही रास्ते पर कैसे आएँ पता हो तो ज़रा बता दो। वो आदमी बोला ठीक है तुम मेरे पीछे-पीछे चलो तुम्हें रास्ता अपने आप मिल जाएगा। उत्सुकता वश जंगल पार करते करते टाइम पास करने की गरज से या अंधेरी रात के सन्नाटे से उठने वाले अपने मन के डर को कम करने के लिए हमने पूछ लिया वो कौन है और इस जंगल में रात के वक्त क्या कर रहा है।

उठो जवानो तुम्‍हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है


उठो जवानो तुम्‍हें जगाने क्रांति द्वार पर आई है

एक कहावत है, प्याज़ भी खाया और जूते भी खाए. ज़्यादातर लोग इस कहावत को जानते तो हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को ही पता है कि इसके पीछे की कहानी क्या है. एक बार किसी अपराधी को बादशाह के सामने पेश किया गया. बादशाह ने सज़ा सुनाई कि ग़लती करने वाला या तो सौ प्याज़ खाए या सौ जूते. सज़ा चुनने का अवसर उसने ग़लती करने वाले को दिया. ग़लती करने वाले शख्स ने सोचा कि प्याज़ खाना ज़्यादा आसान है, इसलिए उसने सौ प्याज़ खाने की सज़ा चुनी. उसने जैसे ही दस प्याज़ खाए, वैसे ही उसे लगा कि जूते खाना आसान है तो उसने कहा कि उसे जूते मारे जाएं. दस जूते खाते ही उसे लगा कि प्याज़ खाना आसान है, उसने फिर प्याज़ खाने की सजा चुनी. दस प्याज़ खाने के बाद उसने फिर कहा कि उसे जूते मारे जाएं. फैसला न कर पाने की वजह से उसने सौ प्याज़ भी खाए और सौ जूते भी. यहीं से इस कहावत का प्रचलन प्रारंभ हुआ. आज

मंगलवार, अगस्त 30, 2011

Anna & his cap

अन्ना टोपी और कैंडल लाइट डिनर

जिस सड़क के अगले चौराहे पर बाजार होता है, वह किधर से आती है, यह तो पता नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि वह हमारे बहुत करीब से गुजरती है। जब अन्ना हजारे हमारे भीतर के स्वप्न को संबोधित कर रहे थे, उसी वक्त एक दूसरे स्तर पर कुछ और भी घट रहा था।

मंगलवार, अगस्त 23, 2011

senior citizens: राजनैतिक संतों की परंपरा

भारत में जब-जब सत्ता निरंकुशता की और बढ़ी है और उसके प्रति जनता का आक्रोश बढ़ा है एक राजनैतिक संत का आगमन हुआ है जिसके पीछे पूरा जन-सैलाब उमड़ पड़ा है. महात्मा गांधी से लेकर अन्ना हजारे तक यह सिलसिला चल रहा है. विनोबा भावे, लोकनायक जय प्रकाश नारायण समेत दर्जनों राजनैतिक संत पिछले छः-सात दशक में सामने आ चुके हैं. इनपर आम लोगों की प्रगाढ़ आस्था रहती है लेकिन सत्ता और पद से उन्हें सख्त विरक्ति होती है. अभी तक के अनुभव बताते हैं कि राजनैतिक संतों की यह विरक्ति अंततः उनकी उपलब्धियों पर पानी फेर देती है.

senior citizens: राजनैतिक संतों की परंपरा

सोमवार, अगस्त 22, 2011

भ्रष्टपाल विधेयक भी लाने होगा

 ये टीम अन्ना तो हाथ धोकर भ्रष्टाचार के पीछे पड़ गयी है. लगता है कि इसका नामो-निशान ही मिटाकर दम लेगी. कोई उन्हें समझाए कि भ्रष्टाचार हर किसी के वश की बात नहीं है. यह भी एक कला है जिसे लंबी साधना के बाद हासिल किया जाता है. कुछ लोगों ने तो अपना पूरा जीवन ही इसकी साधना में होम कर दिया है. अब जीवन के इस मुकाम पर आकर वे इसे छोड़ दें...यह उचित है..? अपनी जीवन भर की साधना को वे त्याग दें. यह मुनासिब है...? इस कला के माहिर कलाकार कोई अंतरिक्ष से नहीं आये हैं. वे भी इसी मुल्क के निवासी हैं. उनके भी कुछ मौलिक अधिकार हैं.  जिस तरह मानव का मानवाधिकार होता है उसी तरह भ्रष्टाचारियों का भी भ्रष्टाधिकार होता है. उसकी रक्षा की भी व्यवस्था होनी चाहिए. यह अलग बात है कि इस विधा के कलाकारों ने तांडव नृत्य की शैली अपना ली थी. यह उनकी गलती थी. उन्हें पॉप डांस तक सीमित रहना चाहिए था. लेकिन अब गलती हो ही गयी तो इसकी इतनी बड़ी सजा कि नामो-निशान ही मिटा दिया जाये. टीम अन्ना यह जान ले कि भ्रष्टाचार रक्तबीज की तरह होता है. आप उसका गला काट सकते हैं लेकिन उसके खून के हर बूंद से एक नया भ्रष्ट पैदा होने से नहीं रोक सकते. वो तो कपील जी, दिग्विजय जी, चिदंबरम जी, मनीष जी मामले को टेकल नहीं कर पाए और हवा को आंधी बना दिया. हमारी महारानी भी बीमार पड़ गयीं वरना सदाचारियों की हर मुहीम का माकूल जवाब दिया जाता. खैर टीम अन्ना के कहने पर तो नहीं लेकिन जनता की भावनाओं का आदर करते हुए जनलोकपाल विधेयक पारित करा दिया जायेगा लेकिन हमारी भी एक शर्त होगी. इसके साथ ही एक भ्रष्टपाल विधेयक भी लाने होगा. उनके अधिकारों की रक्षा भी करनी होगी. इसमें एक चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक की सुरक्षा की व्यवस्था रहेगी. एकतरफा कानून बनाना कहां का न्याय है..? यह कोई प्रजातंत्र नहीं होगा. टीम अन्ना इस शर्त को मानने के लिए तैयार हो फटाफट समझौता हो जायेगा. तुम्हारी भी जय-जय..हमारी भी जय-जय...न तुम हारे न हम हारे.  

बुधवार, अगस्त 17, 2011

मसखरे हीरो नहीं बन सकते

यह एक ध्रुव सत्य है कि हीरो मसखरी कर सकता है लेकिन मसखरे हीरो नहीं बन सकते. ठीक उसी तरह जिन्हें राजनीति की समझ नहीं हो, जो स्थितियों को सही आकलन नहीं कर सकते वे तानाशाह नहीं बन सकते. अन्ना के आंदोलन के साथ मनमोहन सरकार ने इंदिरा गांधी के अंदाज में निपटने का प्रयास किया और अपनी भद पिटा ली. अन्ना को गिरफ़्तारी और जेल का भय दिखने की कोशिश की. उनकी टीम के लोगों को तिहाड़ जेल भेज कर उनके आंदोलन को नेत्रित्वविहीन   करने की कोशिश की लेकिन देश भर में ऐसा जन सैलाब उमड़ा की सरकार के पसीने छूट गए. सात दिन की न्यायिक हिरासत की व्यवस्था की और शाम होते-होते उनको जेल से बाहर आने के लिए मिन्नतें करने लगे. एक-एक कर उनकी तमाम शर्तें स्वीकार करनी पड़ी. प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह तक अपरिपक्व बयान जारी कर आलोचना के पात्र बने. गृह मंत्री को अपनी यू टर्न लेना पड़ा. कांग्रेस के मुताबिक उसका विरोध उसकी शर्तों के आधार पर करना चाहिए. इसकी अनुमति लेकर. कांग्रेस की इस पीढ़ी को यह बात समझ में नहीं आती कि विरोध अनुमति लेकर नहीं किया जाता. अन्ना गांधीवादी और अहिंसक तथा शांतिपूर्ण आंदोलन के पक्षधर हैं इसलिए अनशन के लिए जगह देने की गुजारिश की वरना क्या माओवादियों ने कभी सरकार के पास आवेदन दिया कि वे रेल की पटरी उड़ना चाहते हैं कृपया इसकी अनुमति प्रदान की जाये. या वे पुलिस वाहन को लैंडमाइन विस्फोट कर उड़ना चाहते हैं इसकी अनुमति दी जाये. कानून के दायरे में रहकर यदि कोई शांतिपूर्ण विरोध करना चाहता है तो उसपर दमनचक्र चलाना या उसपर शर्तें लादना यह बतलाता है कि सरकार गांधी की भाषा सुनने को तैयार नहीं माओ की भाषा में बोलो तो कोई समस्या नहीं. जेपी आंदोलन के बाद बोध गया महंथ के विरुद्ध संघर्ष वाहिनी के अहिंसक वर्ग संघर्ष को भी इसी तरह कुचला गया था जिसका नतीजा बाद के वर्षों में हिंसक आंदोलनों में अप्रत्याशित वृद्धि के रूप में सामने आया और देश आजतक माओवादी और आतंकवादी हिंसा के रूप में झेल रहा है. मनमोहन सिंह जी की पूरी मंडली इस बात को नहीं समझ रही है कि इस मुद्दे को यदि अन्ना की जगह किसी हिंसक संगठन ने लपक लिया और उसे ऐसा जन समर्थन मिल गया तो क्या होगा. क्या दिल्ली पुलिस या भारतीय पुलिस उसे संभल सकेगी. दुर्भाग्य है कि देश की ऐसे अपरिपक्व और नासमझ लोगों के हाथ में है और अगले चुनाव तक इसे झेलना जनता की मजबूरी है. आज देश का बच्चा समझ रहा है कि किसके विदेशी बैंक खाते को बचाने के लिए देश की प्रतिष्ठा और एक एक गौरवपूर्ण पृष्ठभूमि वाली पार्टी की गरिमा को दावं पर लगाया जा रहा है. कहीं यह व्यक्तिगत निष्ठां पूरे संगठन की ताबूत में आखिरी कील न बन जाये. इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए.

-----देवेंद्र गौतम      

मंगलवार, अगस्त 09, 2011

खैरात बांटो और राज करो

अंग्रेजों ने एक नीति बनायीं थी बांटो और राज करो. आजाद भारत की सरकारों ने उसमें थोड़ी तब्दीली की है. इनकी नीति है-खैरात बांटो और राज करो. मैं पूछूंगा-खैरात बांटकर राहत पहुंचाई जा सकती है लेकिन इसके जरिये गरीबी दूर की जा सकती है क्या...? आप कहेंगे नहीं... लेकिन सरकारी तंत्र कहेगा हां! खौफ यह है कि गरीब जनता आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो जाएगी तो नेताओं की सूरत और सीरत को समझने लगेगी. यही भय और यही मानसिकता गरीबी का उन्मूलन में बाधक है. प्राकृतिक संपदा के दृष्टिकोण से झारखंड देश का सबसे समृद्ध राज्य है. यहां आदिवासियों के  हितों की रक्षा के नाम पर मुख्यमंत्री पद अघोषित रूप से जनजातियों के लिए आरक्षित रहा है. लेकिन राज्य गठन के एक दशक बाद नेता घोटालों के जरिये अरबपति बन गए जनता वहीं की वहीं रही. अभी हाल में योजना आयोग ने राज्य के 24 जिलों में 14 को देश के अति गरीब जिलों में सूचीबद्ध किया है. झारखंड सरकार के लिए यह आत्ममंथन का विषय था. लेकिन ऊपर से निर्देश आया कि वहां बड़े पैमाने पर अतिरिक्त अनाज का वितरण किया जाये. ये अधिकांश जिले जनजातीय बहुल हैं. इनमें सिंहभूम जिला भी शामिल है जहां लौह और स्वर्ण अयस्क का विशाल भंडार है. जहां पूर्व मुख्य मंत्री मधु कोड़ा के कार्यकाल में चार हज़ार करोड़ का माइंस आवंटन घोटाला उजागर हुआ. झारखंड सरकार या विपक्ष के किसी नेता ने यह सवाल नहीं उठाया कि यह स्थिति क्यों है और उन जिलों के लोगों के आर्थिक उत्थान के लिए कौन सी रणनीति अपनाई जाएगी. बिचौलियों को कैसे किनारे किया जायेगा और रोजगार परक योजनाओं का लाभ आम जनता तक पहुंचाने का क्या उपाय किया जायेगा. बस खैरात बांटो और चुनाव के समय अपने अहसान गिनाकर वोट बटोर लो. यही सत्ता सुख प्राप्त करने का बीजमंत्र है. मध्यम वर्ग पर महंगाई का बोझ डालो और गरीबों को खैरात देते रहो. उसे अपने पैरों पर खड़ा मत होने दो सत्ता पर पकड़ बनी रहेगी. नागनाथ गए तो सांपनाथ आयेंगे. मानव जाति को सत्ता से दूर रखो. यह राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी है.

-----देवेंद्र गौतम 

शनिवार, अगस्त 06, 2011

सितारों के आगे चलो घर बसायें

अलामा इकबाल की कल्पना साकार हुई. सितारों के आगे सचमुच और जहां निकल आये. हाल में नासा के वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह पर खारे पानी की मौजूदगी का पता लगा लिया है. जाहिर है कि जहां पानी होगा वहां हवा होगी और जहां यह दोनों होंगे वहां जीवन भी होगा या उसके विकसित होने की संभावना भी होगी. चांद पर भी पानी के संकेत मिले हैं.मंगल ग्रह पर पानी है यह सचमुच बहुत बड़ी खबर है. उसके खारा होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. मीठे को खारा और खारे को मीठा बनाना तो हमारे बाएं हाथ का खेल है. अब बढती जनसंख्या कोई समस्या नहीं रह जाएगी. मानव आबादी के सरप्लस हिस्से को आराम से मंगल ग्रह पर शिफ्ट किया जा सकेगा.

शनिवार, जुलाई 30, 2011

लेस्बियन संबंधों की दर्दनाक परिणति

पश्चिम की हवा भारत के महानगरों से होती हुई अब देश के विभिन्न शहरों को प्रदूषित कर रही है. रांची की 12 वीं कक्षा की दो छात्रों की मौत के मूल में यही मामला है. दोनों २० जुलाई को रांची के अपर बाजार स्थित एक हॉस्टल से से लापता थीं. 28 जुलाई को उनका शव हरिद्वार और ऋषिकेश के बीच में स्थित सिल्ला नहर से बरामद किया गया. उनकी पहचान उनके आई कार्ड से हुई. रांची से जाने के बाद वे ऋषिकेश के एक होटल में ठहरी हुईं थीं. 24 जुलाई को उन्होंने होटल का बिल चुकता कर उसे खाली कर दिया था. दोनों दुमका की रहने वाली थीं. 10 वीं कक्षा तक वह डीपीएस बोकारो में पढ़ती थीं. इसके बाद इसके बाद निकिता ने 10 वीं में 98 प्रतिशत अंक लेन के नाते बोकारो के सबसे प्रतिष्ठित चिन्मय स्कूल में नामांकन कराया जबकि मौसम का नामांकन डीपीएस, रांची में कॉमर्स संकाय में हुआ.

रविवार, जुलाई 24, 2011

काले कुत्ते ने जंगल में दिखाया रास्ता

कुछ घटनाएं इतनी हैरत-अंगेज़ होती हैं कि उन्हें दैवी प्रभाव मानने में आधुनिक सोच आड़े आती है और वैज्ञानिक व्याख्या संभव नहीं होती. ऐसी एक घटना हमारे साथ 1993-94 के दौरान पेश आई थी जब हम गोमिया के घने जंगलों में रास्ता भूल गए थे. विनोबा भावे विश्वविध्यालय के एन्थ्रोपोलोजी के विभागाध्यक्ष अंसारी साहब ने मेरे साथ गोमिया के लुगु पहाड़ पर चलने का प्रोग्राम बनाया था. घने जंगलों से भरे उस पहाड़ की साढ़े तीन हज़ार फुट ऊंचाई पर स्थित गुफाओं की यात्रा मैं 1987-८८ के दौरान कई बार कर चुका था और कमलेश्वर जी  के संपादन में उन दिनों प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका गंगा के लिए उसपर स्टोरी भी लिख चुका था. लिहाज़ा बेरमो कोयलांचल में मुझे उस रहस्यमय पहाड़ का जानकार माना जाता था.
                                                 रहस्य-रोमांच 
         

शनिवार, जुलाई 16, 2011

यह महंगाई तो सरकार प्रायोजित है



एक सोची समझी रणनीति का नतीजा 

16 जुलाई को दैनिक जागरण के प्रथम पृष्ठ पर दो ख़बरों को टॉप बॉक्स बनाया गया था. पहली खबर थी-32 हज़ार में नैनो मकान और दूसरी खबर थी-720  रुपये में मिलेगा गैस सिलेंडर. पहली खबर बीपीएल के लिए थी और दूसरी एपीएल के लिए. एक को सौगात दूसे पर बोझ. दरअसल यही कांग्रेसनीत यूपीए सरकार का गुप्त एजेंडा है. वोटों का एक नया समीकरण बनाने का प्रयास. बांटों और राज्य करो की ब्रिटिशकालीन नीति का नया संस्करण. आजादी के बाद लंबे समय तक ब्रह्मण, हरिजन और मुसलमान के जातीय समीकरण के आधार पर सत्तासुख प्राप्त कार चुकी कांग्रेस इस वोट बैंक के खिसकने के बाद अब बीपीएल-एपीएल के आधार पर समाज को नए सिरे से विभाजित कर बीपीएल मतदाताओं का समर्थन पाने का ख्वाब देख रही है. उसके गणित के मुताबिक बीपीएल संख्या में ज्यादा हैं. वे साथ हो लें तो राजपाट सुरक्षित हो जायेगा. इसीलिए सरकार जानबूझकर सब्सीडी हटा रही है और महंगाई बढ़ा रही है. वह मान चुकी है कि एपीएल का वोट उसे चाहिए ही नहीं. इसीलिए महंगाई के खिलाफ आवाज़ उठने पर उसके नुमाइंदे पूरी बेशर्मी के साथ सीना ठोक कर कहते हैं कि महंगाई तो बढ़ेगी.
       

बुधवार, जुलाई 13, 2011

खजाने और भी हैं पद्मनाभस्वामी मंदिर के सिवा



वर्ष और अंक तो याद नहीं है लेकिन 70  के दशक में साप्ताहिक हिंदुस्तान में एक लेख पढ़ा था जिसमें कंचनजंघा चोटी के पास दुनिया के सबसे बड़े खजाने के संबंध में एक विस्तृत लेख छपा था. इसकी जानकारी ब्रिटिश शासन काल में एक ताम्रपत्र से मिली थी. ताम्रपत्र को प्राचीन भाषाओं के जानकार लोगों ने पढ़कर उसका अनुवाद किया था. उसके अनुसार यह विश्व का सबसे बड़ा खजाना है जिसे राजा राम सिंह ने मानव कल्याण के लिए रखवाया है. इस खजाने की रक्षा ऐसे सर्प करते हैं जिनके सिर पर दीपक जलता रहता है. जब दुनिया विनाश के कगार पर पहुंच जाएगी तो किसी खास व्यक्ति के पहुंचने पर इसके दरवाजे अपने आप खुल जायेंगे और वह इस खजाने के जरिये विश्व का पुनर्निर्माण करेगा.
       

सोमवार, जुलाई 11, 2011

छठे तहखाने का रहस्यलोक

खजाने में बैठी तबाही 

तिरुअनंतपूरम  के पद्मनाभ स्वामी मंदिर के पांच तहखानों की दौलत आराम से निकल आई. परिसंपत्तियों की सूची भी बन गयी लेकिन जब छठे तहखाने को खोलने की बारी आई तो उसमें तिलस्मी इंतजामात की बात सामने आने लगी. कोलकाता के एक दैनिक अखबार ने 1930  में किसी दैनिक अखबार में प्रकाशित एमिली गिलक्रिस्ट हैच नामक लेखक के लेख का हवाला देते हुए एक दिलचस्प रिपोर्ट प्रकाशित की है. लेख के मुताबिक 1908 में कुछ लोगों ने छठे तहखाने का दरवाजा खोला तो उन्हें साँपों की फौज के साथ कई सिरों वाला किंग कोबरा नज़र आया. वे जान बचाकर भाग निकले. ऐसी किंवदंती है कि कई सिरों वाला और कांटेदार जिह्वा बाला एक विशाल किंग कोबरा सांप मंदिर के खजाने का रक्षक है.

रविवार, जुलाई 10, 2011

खजाने की चाबी लुटेरों को...नहीं...बिल्कुल नहीं


पद्मनाभस्वामी मंदिर के तहखानों से निकला खज़ाना सामने आने के बाद अब देश के 550  रियासतों, हजारों मंदिरों-मठों, पुराने किलों और रहस्यमयी गुफाओं में कैद अकूत खजानों की और बरबस ध्यान चला जाता है. गनीमत है कि इनके जनहित में उपयोग की संभावनाओं पर विचार करने का जिम्मा उच्चतम न्यायालय ने लिया है. अभी सत्ता में बैठे लोग घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे होने के कारण आम जनता का विश्वास खो चुके हैं. कई राजघरानों के खजाने सरकार पहले भी ले चुकी है लेकिन उनके उपयोग की कोई जानकारी नहीं है.

बुधवार, जुलाई 06, 2011

बाबा रे बाबा! विदेशी बैंकों से ज्यादा धन तो धर्मस्थलों में पड़ा है

केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर का एक तहखाना खुलना बाकी है और अभी तक एक लाख करोड़ का धन सामने आ चुका है. फिलहाल राजघराने के अनुरोध पर सुरक्षा के दृष्टिकोण से सरकार ने अगले तहखाने से निकलने वाले धन का विवरण सार्वजनिक न करने का निर्णय लिया है. साईं बाबा के देहावसान के बाद उनके तहखाने से मिली खरबों की संपत्ति के मालिकाना हक का विवाद चल ही रहा है. जाहिर है कि देश के मंदिरों, मसजिदों, गुरुद्वारों, गिरिजाघरों बी एनी धर्मस्थलों में इतना धन पड़ा हुआ है कि उसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता. यह विदेशी बैंकों में जमा भारतीय काला धन से हजारों या लाखों गुना ज्यादा है और अनुपयोगी पड़ा है.

शुक्रवार, जुलाई 01, 2011

रुपया बना चिल्लर..चिल्लर बना रुपया

आज कचहरी के पास फटे पुराने नोट बदलने वाले के काउंटर पर पुराने सिक्कों के बीच चवन्नी को भी तांबे और अलुमिनियम के पुराने सिक्कों के बीच पूरे सम्मान के साथ प्रदर्शित देखा. जिज्ञासावश पूछ बैठा कि इसकी कीमत क्या है. उसने बताया दो रुपये. उसमें आजादी के बाद बंद हुए और प्रचलन से बाहर हुए सिक्के थे. मुझे ख़ुशी हुई कि भारतीय बैंक जिस सिक्के को उसकी निर्धारित कीमत पर वापस लेने की अंतिम तिथि को पीछे छोड़ आये हैं निजी  क्षेत्र में उसकी आठ गुनी कीमत लग रही है. पुराना एक पैसा, दो पैसा, तीन पैसा. एक आना, दो आना, पांच पैसा. दस पैसा के सिक्के दो रुपये में बिक रहे हैं. यानी सरकार ने जिन्हें चिल्लर की हैसियत से ख़ारिज कर दिया वे रुपये में परिणत हो चुके हैं. दूसरी तरफ एक रुपये का सिक्का जिसे कभी बाज़ार में रुपये की हैसियत प्राप्त थी आज चिल्लर में परिणत हो चुका है.

बुधवार, जून 29, 2011

BBC Hindi - अंतरराष्ट्रीय ख़बरें - गूगल के ज़रिए सेंसरशिप?

भारत सरकार अब धीरे-धीरे अपने हाथ लोकतंत्र के गले की ओर बढ़ा रही है. काला धन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक शब्द भी सुनना नहीं चाहती. जनता के मौलिक अधिकारों का हनन करने पर तुली है. देश दूसरे आपातकाल की ओर बढ़ रहा है. तानाशाही की शुरुआत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के प्रयास के साथ होती है. बीबीसी हिंदी के साईट पर लगी यह खबर बताती है कि यह प्रयास तेज़ होता जा रहा है...


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BBC Hindi - अंतरराष्ट्रीय ख़बरें - गूगल के ज़रिए सेंसरशिप?

मंगलवार, जून 28, 2011

ये इंटरनेट की भाषा है जनाब!

स्कूल की स्पेलिंग क्या होती है? एससीएचओओएल या फिर एसकेयूएल? पहली स्पेलिंग किताबी है और दूसरी इंटरनेट पर प्रचलित यूनिकोड फौंट में ट्रांसलिटरेशन की. इंटरनेट पर किताबी स्पेलिंग नहीं चलती. यह पूरी तरह शब्दों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि पर आधारित होती है. यह पूरी तरह वैज्ञानिक है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर  पर मान्य भी. लेकिन कल रांची के जिला शिक्षा पदाधिकारी की मौजूदगी में एडमिशन टेस्ट के दौरान जब एक बच्ची ने पूछे गए शब्दों की स्पेलिंग इंटरनेट की भाषा के आधार पर बताई तो डीईओ साहब पूरी तरह उखड गए. उन्होंने शिक्षकों को बेतरह फटकार लगायी.

सोमवार, जून 27, 2011

सोनिया गांधी की यात्रा का खर्च 1850 करोड़


(यह मेल के जरिये मिली जानकारी है. इसे ज्यों का त्यों ब्लॉग कर लिया है. क्लिक करके पूरा पोस्ट पढ़ें. दंग रह जायेंगे.)

इतना खर्चा तो प्रधानमंत्री का भी नहीं है : पिछले तीन साल में सोनिया की सरकारी ऐश का सुबूत, सोनिया गाँधी के उपर सरकार ने पिछले तीन साल में जीतनी रकम उनकी निजी बिदेश यात्राओ पर की है उतना खर्च तो प्रधानमंत्री ने भी नहीं किया है ..एक सुचना के अनुसार पिछले तीन साल में सरकार ने करीब एक हज़ार आठ सौ अस्सी करोड रूपये सोनिया के विदेश दौरे के उपर खर्च किये है ..कैग ने इस पर आपति भी जताई तो दो अधिकारियो का तबादला कर दिया गया .


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लो आपका देश बेचने निकले हम क्या कर लोगे ?

भ्रष्टाचार: पूंजीवादी लोकतंत्र का सह उत्पाद

बाबा रामदेव अभी विदेशी बैंकों में जमा काला धन की वापसी को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये हुए हैं तो अन्ना हजारे एक सशक्त लोकपाल बिल के लिए सर पर आसमान उठाये हुए हैं. सवाल यह है कि खुदा न ख्वाश्ते यह दोनों अपनी जंग को जीत लेते हैं तो क्या सरे नज़ारे बदल जायेंगे ?...भ्रष्टाचार पर रोक लग जाएगी और काले धन की सल्तनत पूरी तरह ख़त्म हो जाएगी ?....हम आप क्या खुद बाबा रामदेव और अन्ना हजारे भी दिल पर हाथ रखकर यह गारंटी नहीं दे सकते. सच यह है कि उनके आंदोलन से जनता में जागरूकता आ सकती है लेकिन समस्या का निदान नहीं हो सकता. भ्रष्टाचार तो दरअसल पूंजीवादी लोकतंत्र की व्यवस्था का सह उत्पाद है. और काला धन हमारी अर्थ व्यवस्था की नसों में दौड़ता लहू. दुनिया का ऐसा कौन सा पूंजीवादी लोकतंत्र की व्यवस्था से संचालित देश है जहां काले धन और भ्रष्टाचार का संक्रामक रोग मौजूद नहीं है. यह एक लाइलाज रोग है. जब तक यह व्यवस्था रहेगी रोग भी रहेगा. इसके संक्रमण का प्रतिशत घट बढ़ जरूर सकता है. 
सत्ता के शीर्ष पर बैठे महानुभावों से लेकर से आम आदमी तक जिधर भी  नज़र दौडाएं हर जगह काले धन और भ्रष्टाचार की भूमिका दिखाई पड़ेगी.एक विधायक या सांसद चुनाव के दौरान करोड़ों रुपये फूंक देता है. चुनाव आयोग ने भी खर्च की जो सीमा निर्धारित की है उसे जुटा पाना किसी ईमानदार सामाजिक कार्यकर्त्ता के बूते के बाहर है. क्या यह पैसा आयकर जमा किया हुआ या प्रत्याशी की मेहनत की कमाई का होता है..?  कहां से आता है यह पैसा...? पार्टी देती है तो उसके पास इसके आगमन का स्रोत क्या होता है. प्रत्याशी यह जानते हुए भी कि जीत जाने के बाद वेतन और भत्ते के रूप में प्रतिमाह लाख-डेढ़ लाख तक मिलेंगे और हार जाने पर पैसा पानी में चला जायेगा, खुले हाथ खर्च करता है. आखिर किस भरोसे वह जुए पर दावं लगता है.. वेतन और भत्ते के जरिये तो पांच साल के कार्यकाल में वह चुनाव खर्च भी नहीं निकाल पायेगा. फिर वह क्या सोचकर इतना खर्च करता है निश्चित रूप से सेठ-साहूकार और काले बाजार के गोरे खिलाडी ही उसे चुनाव लड़ने के लिए मोटा चंदा देते हैं.. वे किस उम्मीद पर ऐसा करते हैं...? जाहिर है कि कोई व्यापारी घाटे का सौदा नहीं करता. बस यहीं से रचे जाने लगते हैं घोटालों के चक्रव्यूह. लोकतान्त्रिक व्यवस्था में चुनाव तो होंगे ही और हर चुनाव में तैयार होगी  भ्रष्टाचार के एक नए खेल की भूमिका. यह कारनामे व्यवस्था को समाजसेवा की दिशा में कैसे ले जा सकते हैं.
अब जरा अपने आसपास के किसी निम्न मध्यवर्गीय परिवार पर निगाह डालें.बच्चे के जन्म से लेकर बूढ़े की मृत्यु तक रीति-रिवाजों, पर्व त्योहारों  की एक लंबी फेहरिश्त उसके सामने होती है. हर मौके के लिए उसे धन का संग्रह करना होता है. यह धन मासिक वेतन से जुटाना मुश्किल होता है. इसे पूरा करने के लिए वह टेबुल के नीचे की संभावनावों की ताक में रहता है. यह निचले स्तर के भ्रष्टाचार की भूमिका तैयार करता है.यह तमाम सामाजिक आयोजन उस ज़माने में सृजित किये गए थे जब भारत सोने की चिड़िया हुआ करता था. वह सामंती व्यवस्था का दौर था जिसकी कुछ खामियां थीं तो कुछ खूबियां भी थीं. उस ज़माने में सामूहिकता की भावना बहुत गहरी थी. किसी गरीब की बेटी की शादी हो रही हो तो बारात का बेहतर ढंग से स्वागत करना पूरे गांव की प्रतिष्ठा का मामला होता था. उस गांव का हर परिवार अपनी हैसियत के मुताबिक संबंधित परिवार की मदद करता था. कहीं कोई कमी नहीं होने दी जाती थी. तमाम पर्व त्यौहार और सामाजिक आयोजन गांव की शान दिखाने का अवसर होते थे. महंगे और खर्चीले होने के बावजूद यह किसी व्यक्ति या परिवार पर बोझ नहीं होते थे.  आज के समाज में सामूहिकता की भावना का पूरी तरह लोप हो चुका है. अब बेटी की शादी किसी गांव, टोले या मोहल्ले की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनती, यह संबंधित परिवार की अपनी जिम्मेवारी, अपनी हैसियत की बात होती है. जाहिर है कि बेटी का बाप अपना पेट काट-काटकर दहेज़ के पैसे जुटाएगा. लेकिन सरकारी तंत्र यदि उसे ठीक से पेट भरने की भी इजाजत नहीं देगा तो वह धन के आगमन के गैरकानूनी रास्तों की तलाश करेगा. उसकी यह ज़रूरत भी काले धन से ही पूरी होगी, समृद्ध घरानों में भी आयकर जमा कर जुटाई गई रकम इन मौकों के लिए नहीं होती. शायद ही कोई करदाता सामाजिक प्रयोजनों के खर्च को अपने रिटर्न में दर्शाता हो. यानी राजनैतिक ही नहीं सामाजिक व्यवस्था भी काले धन की बुनियाद पर खड़ी है.
पूंजीवादी लोकतंत्र की इस महाव्याधि को अब दवा की नहीं शल्य चिकित्सा की दरकार है.एक नई शासन व्यवस्था की जरूरत है. चाहे उसका जो भी स्वरुप हो. बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे लोग यदि समस्या की जड़ पर प्रहार करने की रणनीति बनाते तो एक नए इतिहास की रचना करते.

-----देवेंद्र गौतम      

रविवार, जून 19, 2011

इंटरनेट मीडिया का बढ़ता दायरा

 मन की भावनाओं की अभिव्यक्ति और सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए हमेशा किसी माध्यम की ज़रूरत पड़ती है. यह माध्यम मानव संस्कृति के विकास के साथ-साथ नए-नए रूप ग्रहण करता है. हाल के वर्षों में जन  माध्यम  के रूप में सबसे मजबूती के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराइ है इंटरनेट मीडिया ने. अन्ना हजारे के अनशन के दौरान व्यापक जन समर्थन जुटाने में फेसबुक, ट्यूटर जैसे सोशल नेटवर्किंग साईट्स की अहम् भूमिका रही. जंतर मंतर पर अनशन शुरू होने से पहले  ही इंडिया अगेंस्ट करप्सन ओअर्गी नामक वेबसाईट     पर ही 10 लाख से ज्यादा लोग समर्थन प्रदान कर चुके थे. बाबा रामदेव के आंदोलन में व्यापक समर्थन इंटरनेट के रास्ते ही जुटा. अन्ना हजारे के अनशन के पहले तीन दिन में ही 8 लाख से अधिक लोगों ने ट्यूटर पर 44 लाख से अधिक त्विट्स किये थे. निश्चित रूप से बाबा रामदेव को अन्ना की तरह समर्थन नहीं मिला लेकिन    इंटरनेट ने अपनी ताकत  का अहसास तो दिलाया  ही. 
     कुछ वर्ष पहले प्रिंट मीडिया अभिव्यक्ति का सबसे पोपुलर माध्यम हुआ करता था. लोग सुबह का अखबार देखने के लिए बेचैन रहते थे. इसके बाद इलेक्ट्रोनिक मीडिया सूचना क्रांति का नया अलमबरदार बनकर उसके मुकाबले सामने आया. लोग बुद्धू बक्से में घर बैठे पूरी दुनिया की घटनाओं को देखने और सुनने लगे. यह अलग बात है की  उसके अंदर कुछ अति उत्साही पत्रकार आ गए और टीआरपी बढ़ने के लिए   सनसनी फैलाना उनका उद्देश्य बन गया. इसके कारण वे वह विश्वसनीयता हासिल नहीं कर सके जो प्रिंट को हासिल है. 
            लेकिन प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक मौजूदा दौर में अधिकांश मीडिया हाउसों का स्वामित्व पूंजीपति घरानों के पास है. आमलोग इसके उपभोक्ता मात्र हैं. इनके जरिये आमजन की  भावनाओं की अभिव्यक्ति  एक सीमा तक ही सम्भव है. उनका पहला उद्देश्य अपने व्यावसायिक हितों की रक्षा होता है. आम जनता तक सही सूचना पहुंचाना अधिकांश पूंजीपति घरानों का मुख्य उद्देश्य नहीं होता. ऐसी सूचनाएं जिनसे उनके या उनके हितैषियों के हित बाधित होते हैं, उन्हें तोड़ने-मरोड़ने का निर्देश देने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता. उनके हॉउस में काम करने वाले पत्रकार ऐसे मौकों पर  मन मसोस कर रह जाते हैं. नौकरी करनी है तो प्रबंधन की शर्तों पर करनी होगी वर्ना आपकी कोई ज़रुरत नहीं. यही नहीं अख़बारों को अपने विज्ञापन दाताओं के हितों का भी ध्यान रखना होता है. इस चक्कर में भी सूचनाओं को तोडना-मरोड़ना या छुपाना, गलत ढंग से पेश करना पड जाता है. बाबा रामदेव के अनशन के दौरान अगर आप टीवी पर लाइव टेलीकास्ट देख रहे होंगे तो आपने गौर किया होगा कि देर रात पुलिस के हमले के बाद सुबह होते ही सभी खबरी चैनलों की भाषा बदल गयी थी. कुछ  परदे में और कुछ पूरी बेशर्मी के साथ यह साबित करने का प्रयास कर रहे थे कि बाबा के समर्थक उग्र और हिंसक हो गए थे और पुलिस को मजबूर होकर अश्रु गैस का इस्तेमाल करना पड़ा या लाठी चार्ज करना पड़ा या हवाई फायरिंग करनी पड़ी. कुछ ने तो हवाई फायरिंग की बात को भी एक सिरे  से नकारने की कोशिश की बावजूद इसके कि लाइव टेलीकास्ट में रायफल से गोली निकलने का दृश्य कई बार दिखलाया जा cहुका था. आखिर पुलिस की बर्बरता को सही ठहराने के प्रयास के पीछे क्या था. इसे आसानी से समझा जा सकता है. मैं मीडिया के अंदर के खेल के विस्तार में नहीं जाना चाहता सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि आप प्रिंट या इलेक्ट्रोनिक मीडिया के जरिये अपनी बातों को खुलकर नहीं रख सकते.
                 इंटरनेट एक सस्ता और सशक्त माध्यम के रूप में सामने आया है. आप मुफ्त में अपना मेल आईडी बना सकते हैं. सोशल वेब साईट्स पर अपना अकाउंट खोलकर अपनी बात व्यापक लोगों तक पहुंचा सकते हैं. अपना ब्लॉग शुरू कर सकते हैं. थोडा पैसा खर्च करें तो अपना वेबसाईट शुरू कर सकते हैं और उसे अपनी आमदनी का जरिया भी बना सकते हैं. आज भारत  में इंटरनेट युजर्स  की संख्या 10 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है. निश्चित रूप से अभी भी उसकी पहुँच  किसी पूरी दुनिया में ब्लोग्स और वेब साइट्स ने जोर पकड़ा. भारत में तहलका डाट कॉम ने और अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर विकीलिक्स ने बड़े-बड़े खुलासे कर पूरी दुनिया को चौंका दिया. मीडिया जगत की गलत प्रवृतियों को भड़ास फोर मीडिया डाट कॉम जैसे साइट्स ने खुलकर उजागर किया. आज भड़ास के समर्थकों की संख्या हजारों में पहुंच चुकी है. आप मुफ्त में अपना ब्लॉग बना सकते हैं और चंद सेकेंडों में अपनी बात पूरे विश्व तक पहुंचा सकते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लेखक, मुद्रक, प्रकाशक, प्रबंधक सबकुछ आप स्वयं होते हैं. आपको अपनी बात कहने से कोई नहीं रोक सकता. आप बहुत मामूली खर्च कर अपने ब्लॉग के लिए अलग डोमेन नेम रजिस्टर्ड करा सकते हैं. अपना अलग अभी अंग्रेजी और दूसरी विदेशी भाषाओँ के वेब साइट्स और ब्लोग्स की संख्या करोड़ों में है तो हिंदी में भी उनके विकास की गति काफी तेज़ है. हिंदी ब्लोग्स 10 हजार का आंकड़ा पार कर चुके हैं. हिदी वेब साइट्स, वेब पत्रिकाओं और पोर्टल्स की संख्या भी लाखों में है. हिंदी के ब्लोग्स अभी व्यावसायिक रूप नहीं ले सके हैं लेकिन इस और तेज़ी से बढ़ रहे हैं. गूगल की विज्ञापन प्रदाता एजेंसी एडसेन्स ने अभी तक हिंदी इंटरनेट पर हिंदी को मान्यता प्राप्त भाषाओँ की सूची में शामिल नहीं किया है लेकिन कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय  विज्ञापन एजेंसियों ने हिंदी को सपोर्ट करना शुरू किया है और आनेवाले चार-पांच वर्षों में उम्मीद की जाती है कि ब्लोगिंग का काम एक स्वतंत्र रोजगार का रूप ले लेगा. इस मीडिया में सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें लागत इतनी
मामूली है कि कोई भी इसे शुरू कर सकता है.
                          सरकार इंटरनेट पत्रकारिता के खतरे के प्रति असावधान नहीं है. हाल में उसने एक ऐसा कानून बनाया है जिसके जरिये वह जब चाहे किसी भी वेब साईट को ब्लॉक कर सकती है. लेकिन वह आपको तुरंत दूसरा साईट खोलने से रोक तो नहीं सकती. विभिन्न देशों की सरकारें चाहकर भी जब अश्लील साईट्स को ब्लॉक नहीं करा सकीं  तो जनता  की आवाज़  को कैसे ब्लॉक  करा सकेंगी. इस  माध्यम का नियंत्रण किसी सरकार के हाथ में नहीं है. मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि आनेवाले वर्षों में इंटरनेट मीडिया सबसे सशक्त मीडिया के रूप में उभरकर सामने आएगा . यही भविष्य का माध्यम बनने जा रहा है जिसके संकेत अभी से दिखाई दे रहे हैं.   


----देवेंद्र गौतम 


रविवार, जून 12, 2011

काले धन का समाजशास्त्र

बाबा रामदेव कौमा की स्थिति में पहुंचने के बाद काफी  मुश्किल  से  अपना अनशन तोड़ने को तैयार हुए . सरकार को उनकी कोई चिंता नहीं रही. रामलीला मैदान से उनके साथ उनके समर्थकों को क्रूरता पूर्वक खदेड़ने के बाद कांग्रेस को उनके जीने मरने से  कोई फर्क नहीं पड़ा. बाबा पूर्ववत अनशन पर हैं या नहीं, इससे कांग्रेसियों को कुछ भी  मतलब नहीं.आर्ट ऑफ लिविंग के गुरु श्री श्री रविशंकर अनशन तुडवाने के प्रयास में लगे और अंततः सफल हुए. निश्चित रूप से बाबा रामदेव को इस बात का अहसास होगा कि एक अनशन के जरिये विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस नहीं लाया जा सकता. इसमें हठयोग से समाधान नहीं निकलनेवाला. यह एक लम्बी प्रक्रिया है. अनशन और अनशनकारियों के साथ सरकार के बर्बर व्यवहार से सरकार का चेहरा ज़रूर बेनकाब हो गया. देशवासियों तक यह सन्देश चला गया कि मौजूदा सरकार की काले धन को वापस लाने में कोई दिलचस्पी नहीं है. वह काले धन के खाताधारियों के बचाव के लिए किसी सीमा तक जाने को तैयार है. जाहिर है कि विदेशी बैंकों में जमा की गयी राशि इनके करीबी लोगों की है. उनके बचाव के लिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल करने में उसे कोई परहेज नहीं है. यह भी स्पष्ट हो गया कि अब वह लोकतान्त्रिक और अहिंसक आंदोलनों से इसी तरह निपटेगी क्योंकि लोकलाज को त्यागकर इनसे निपटा जा सकता है. उग्रवादियों और आतंकवादियों से उसे परेशानी नहीं है क्योंकि वे भ्रष्टाचार या काले धन का विरोध नहीं करते उन्हें लेवी देकर कुछ भी किया जा सकता है. बल्कि उग्रवादी गतिविधियां तो विकास योजनाओं की राशि से ही चल रही हैं. अधिकारी माओवादियों को लेवी देकर उसकी जितनी भी बंदरबांट करें कोई अंतर नहीं पड़ता. भ्रष्टाचार में भागीदारी कर हिंसक-अहिंसक कोई भी आन्दोलन चले सरकार को परेशानी नहीं है. लेकिन काले धन को वापस लाने की जिद ...भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की मांग....यह तो वर्तमान राजनैतिक संस्कृति के विरुद्ध है. 
               बाबा को यह बात समझनी चाहिए की मौजूदा व्यवस्था ही काले धन धन पर आधारित है. उसका सिर्फ अर्थशास्त्र ही नहीं एक समाजशास्त्र भी है. आज का भारतीय समाज गुणों की नहीं ऐश्वर्य की पूजा करता है.  दौलतमंद लोगों के प्रति अधिकांश लोगों के मन में श्रद्धा का भाव रहता है. उसे दौलत इकट्ठा करने के तरीकों से कोई मतलब नहीं रहता. हर शहर हर गांव में चोर, लुटेरे, कालाबाजारिये, तस्कर, घुसखोर, दलाल, माफिया श्रेणी के लोग समाज के सबसे सम्मानित लोगों में शुमार होते हैं. सामाजिक, सांस्कृतिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर आर्थिक सहायता देने के कारण इनकी अहमियत ज्यादा रहती है. बच्चे की छठी से लेकर शादी-व्याह और श्राद्ध तक के सामाजिक कार्यक्रम, रीति-रिवाज़  इतने खर्चीले हैं कि मेहनत के पैसों से उन्हें संपन्न कर पाना कठिन होता है. इसीलिए हर व्यक्ति ऊपरी कमी के रस्ते तलाशता रहता है. राजनैतिक क्रियाकलाप भी काले धन से ही चलते हैं. यदि बुरा न मानें तो एक कडवी सच्चाई यह है कि स्वयं बाबा रामदेव को जो दान में मोटी रकमें मिलती हैं वह कला बाज़ार से ही आती हैं. मेहनत से कमाया हुआ पैसा दान में दिया ज़रूर जाता है लेकिन वह सौ या हज़ार में हो सकता है, लाख या करोड़ में नहीं. तो देश में काले धन का बाज़ार चलता रहे लेकिन उसे विदेश नहीं जाने दिया जाये और जो चला गया उसे वापस ले आया जाये इस नीति से भारतीय समाज में कौन सा क्रन्तिकारी बदलाव आ जायेगा, समझ से परे है. कोशिश यह होनी चाहिए कि राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में काले धन की भूमिका कम से कम होती जाये. यह काम मौजूदा व्यवस्था में संभव नहीं है . दरअसल शासन तंत्र  तो बदलता  रहा  लेकिन मध्ययुगीन  सामंती युग  के सामाजिक मूल्य अपनी जगह बने  रहे.   
              अभी अन्ना हजारे, बाबा रामदेव जैसे लोग या भाजपा, आरएसएस जैसे  संगठन इसी व्यवस्था में सुधर  की मांग  कर  रहे  हैं. आमूल परिवर्तन  की बात लोकनायक  जयप्रकाश  नारायण  ने  की थी  लेकिन  अपनी  बात को पूरी तरह स्पष्ट करने  के पहले ही दुनिया से चले गए. फिलहाल व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की बात किसी मंच से नहीं हो रही है. नक्सली और माओवादी भी एक काल्पनिक दुनिया में विचरण करते हुए एक आयातित व्यवस्था की बात सैद्धांतिक रूप से करते हैं लेकिन व्यवहार में मात्र एक अराजक फ़ोर्स बनकर रह गए हैं. वे काले धन में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं रोक नहीं.
               जहां तक विदेशी बैंकों में जमा काले धन की वापसी की बात है इसके दो ही तरीके हो सकते हैं. पहला- कड़ा कानून बनाकर, सम्बंधित देशों को उनकी  भाषा में समझा कर. यानी कानून के डंडे से हांककर, दूसरा   कानून को लचीला  बनाकर. ध्यान देने की बात यह है कि देश के अंदर भी एक बड़ी राशि काले धन के रूप में दबी पड़ी है. व्यावहारिक तरीका यह है कि लोगों को आयकर जमाकर देश या विदेश जहां भी धन हो उसे भारतीय  बैंकों में रखने  की छूट दी  जाये और धन के स्रोत के बारे में कोई सवाल नहीं पूछे जाने का वचन दिया  जाये. बैंकिंग नियमों को भी थोडा लचीला बनाया  जाये.जहां तक काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की बात है यह पूरी तरह अव्यवहारिक है. जब तक इसकी घोषणा होगी और अमली जामा पहनाया जायगा तबतक कालाधन के स्वामी बैठे तो नहीं रहेंगे. धन कहां से कहां से पहुंच जायेगा पता भी नहीं चलेगा. लचीला रुख अपनाकर ही काले धन को प्रचालन  में लाया जा सकता  है. अन्यथा सांप निकल जायेगा लकीर पीटते रह जायेंगे.
     बहरहाल बाबा को हठयोग या बालहठ त्यागकर कालेधन के समाजशास्त्र पर विचार करते हुए ही अपनी रणनीति तय करनी चाहिए. मान-अपमान की भावनाओं से ऊपर उठकर.

---देवेंद्र गौतम

( मेरी बातों  से यदि असहमति  हो तो अपनी बात खुलकर रखें, आपके तर्कों का स्वागत है.)  

मंगलवार, जून 07, 2011

सपेरा बनते फिर सांप के बिल में हाथ डालते बाबा

जीवन में अनुभव का बड़ा महत्व होता है. अन्ना हजारे ने जब जंतर-मंतर पर आमरण अनशन किया था तो उसमें  सक्रिय सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में जनांदोलनों में लम्बे समय तक भागीदारी से मिले अनुभवों की झलक थी. उनकी अपनी छवि भी इसके अनुरूप थी. वह एक सुनियोजित कार्यक्रम था. सरकार से वार्ता के लिए चार लोग अधिकृत किये गए थे. राजनैतिक दलों के नेताओं को कार्यक्रम से दूर रखा गया था. कार्य विभाजन कर जिम्मेवारियां वितरित की गयी थीं. कार्यक्रम में पूरी तरह पारदर्शिता का निर्वहन किया गया था. बाबा रामदेव की सभा में पुलिस ने जिस बर्बरता का तांडव किया वह हैवानियत का चरम प्रदर्शन था. यूपीए सरकार का अक्षम्य अपराध. लेकिन यह सच है कि एक योग गुरु से आन्दोलनकारी नेता के रूप में अपने व्यक्तित्व के रूपांतरण में बाबा चूक गए. पुलिस के दमन पर उतरने के बाद अपने हजारों समर्थकों को उनके हाल पर छोड़कर उनका आयोजन स्थल से भाग खड़े होना अपरिपक्वता का परिचायक था. जब कमांडर ही मैदान छोड़ देगा तो सेना का क्या होगा. उन्हें अपनी जान की परवाह किये बिना स्थिति का पूरे साहस के साथ मुकाबला करना चाहिए था. ज्यादा से ज्यादा यही होता कि सरकार के इशारे पर उनकी हत्या कर दी जाती. लेकिन यदि ऐसा होता तो पूरे देश में इसकी जो प्रतिक्रिया होती उसे संभालने की ताक़त कम से कम मौजूदा सरकार में नहीं थी. उसका सत्ता में बने रहना कठिन हो जाता. ऐसा लगता है कि जनांदोलनों के अनुभवी और अभ्यस्त सिविल सोसाइटी के लोगों से उनहोंने इस कार्यक्रम के संबंध में कोई विचार-विमर्श नहीं किया.   
                       दूसरी बात यह कि सरकार के साथ यदि कोई लिखित समझौता हुआ था तो उसकी जानकारी सार्वजानिक करनी चाहिए थी. अनशन स्थल पर मौजूद लोगों को उसकी जानकारी देनी चाहिए थी. उसे जाहिर नहीं करना पारदर्शिता को संदिग्ध बना गया. सरकारी तंत्र की ओर से इसका खुलासा होने के बाद इसके औचित्य को सिद्ध करने के लिए जो भी तर्क गढ़े गए उनका कोई अर्थ नहीं है. 
                        योग और आंदोलन के बीच एक लक्ष्मण रेखा ज़रूर होना चाहिए था. अनशन का कार्यक्रम घोषित था तो फिर रामलीला मैदान की बुकिंग में आयोजन का उद्देश्य योग शिविर बताने की कोई जरूरत नहीं थी. जब दिल्ली में धरना के लिए जंतर-मंतर घोषित स्थल है तो यह आयोजन वहीं होना चाहिए था. रामलीला मैदान का इस निमित्त उपयोग नहीं करना चाहिए था. उपस्थित होने वाले लोगों की संभावित संख्या में इतना अंतराल नहीं रखना चाहिए था. इन त्रुटियों के जरिये दरअसल उन्होंने सरकार को दमन का बहाना दे दिया.
                        राजनीति को समझने वाले लोग किसी भी क्रिया की संभावित प्रतिक्रिया का अनुमान लगा लेते हैं और उसके लिए मानसिक तयारी कर लेते हैं. बाबा को कहीं ना कहीं यह भ्रम था कि पूरे देश में उनके अनुयायियों  की तादात देखने और प्रति लोगों सम्मान की भावनाओं को देखते हुए सरकार उनपर हाथ नहीं डाल सकेगी. पुलिस की दमनात्मक कार्रवाई उनकी कल्पना से परे थी. वे इसके लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थे. 
                         एक योगी राजनीति नहीं कर सकता ऐसा कत्तई नहीं है. लेकिन इस प्लेटफार्म को समझना और उसके तकाजों के अनुरूप आचरण करना पहली शर्त है. सांप के बिल में हाथ डालने के पहले एक सपेरे के तमाम गुर सीखने होते हैं. डसना तो सांप का स्वाभाविक गुण है. उसके बिल में हाथ डालेंगे तो वह डसेगा ही. उससे बचने का, उसके विष को असरहीन कर देने का तरीका सीखना होता है. बाबा ने इसकी अहमियत नहीं समझी. इसी का नतीजा उन्हें झेलना पड़ा.  
------देवेंद्र गौतम   
  

रविवार, जून 05, 2011

गांधी के असली हत्यारे

रामलीला मैदान की घटना ने यह साबित कर दिया कि विदेशी बैंकों में काला धन रखने वाले भारतीय खाताधारी काफी ताक़तवर हैं. वे अब जन आंदोलनों की धार को को बर्दाश्त  करने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं. उनकी सत्ता पर मज़बूत पकड़ है और वे दमनचक्र की किसी सीमा तक जा सकते हैं. ठीक उसी तरह जैसे पूर्व जमींदारों ने जमींदारी उन्मूलन कानून बनने के बाद भी भूमि सुधार कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाने के सरकारी प्रयासों को अभी तक सफल नहीं होने दिया. अपने काले धन पर मंडराते खतरे से वे निपटने के लिए निर्दोष लोगों का खून बहाने में उन्हें कोई परहेज़ नहीं है. यह बात भी साफ़ हो गयी कि महात्मा गांधी का वास्तविक हत्यारा नाथूराम गोडसे नहीं बल्कि वह पार्टी और उसके नेतृत्व में बैठे तानाशाही प्रवृति के वे भ्रष्ट और अराजक तत्व हैं जिन्हें  उन्होंने आज़ाद भारत के निर्माण की जिम्मेवारी सौंपी थी. गोडसे ने तो गांधी जी के पार्थिव शरीर का अंत किया था. उनके उत्तराधिकारी उनकी आत्मा की हत्या करने पर तुले हुए हैं. वह भी सिर्फ अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए. गांधी ने सत्याग्रह को अमोघ अस्त्र बनाया था. उनके शिष्य आज उसकी धार को कुंद और निरर्थक बनाने पर तुले हैं. वे गांधी की भाषा सुनने को तैयार नहीं हैं. 
                 रामलीला मैदान में बाबा रामदेव का अनशन अहिंसक और शांतिपूर्ण था. उनकी मांगें राष्ट्रहित में  थीं. उनके समर्थक किसी राजनैतिक दल के कार्यकर्त्ता नहीं बल्कि भारतीय समाज के आमलोग थे जो पूरे परिवार के साथ अनशन स्थल पर एकत्र हुए थे. वे रात के वक़्त पंडाल में सोये हुए रहे कि उनपर दिल्ली पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के लोगों ने कहर बरपाना शुरू कर दिया. निश्चित रूप से वे काले धन के स्वामियों के लठैत की भूमिका निभा रहे थे. उग्रवादियों और आतंकवादियों के सामने भीगी बन जाने वाले लोगों ने बच्चों और महिलाओं पर अपनी बहादुरी आजमाई. वे तो बाबा रामदेव की हत्या कर देने की तैयारी में थे लेकिन किसी तरह बाबा की जान बच गयी. घटना के बाद बाबा के संबंध में विरोधाभाषी बयान देकर पुलिस के आला अधिकारी ने यह संकेत दे दिया कि उनकी नीयत साफ़ नहीं थी. अब सरकार लाख सफाई दे लेकिन इस बात को कोई मानने को तैयार नहीं होगा कि बाबा रामदेव जैसे लोकप्रिय संत और इतने बड़े जन-समूह पर जानलेवा हमला करने का फैसला दिल्ली पुलिस ने सरकार के इशारे के बिना लिया होगा. गोविंदाचार्य ने कहा है कि इस अनशन को लेकर कांग्रेस में दो गुट हो गए थे. एक गुट समझौता करने के पक्ष  में था तो दूसरा पक्ष कड़ी कार्रवाई कर बाबा को सबक सिखाने पर अडिग था. सबक सिखाने के पक्षधरों का पलड़ा भरी था इसलिए भावी परिणाम की परवाह  किये बिना इस क्रूरतापूर्ण कार्रवाई को अंजाम दिया गया.
                       दरअसल उग्रवाद और आतंकवाद के दीर्घकालीन तांडव के बाद जंतर-मंतर में अन्ना हजारे के अनशन ने गांधी के सत्याग्रह की ताक़त का अहसास कराया था. उस वक़्त भ्रष्टाचार के संरक्षकों ने मामले को किसी तरह शांत करने की नीति अपनाते हुए उनकी मांगें मान ली थीं. फिर अनशन समाप्त होते ही सिविल सोसायटी के सदस्यों के विरुद्ध दुष्प्रचार अभियान छेड़ दिया था. अब बाबा रामदेव ने जब विदेशी बैंकों से काले धन की वापसी के मुद्दे को लेकर अनशन का ऐलान किया तो काले धन के खातेधारियों को सत्याग्रह के अस्त्र से खतरा महसूस होने लगा. इसकी थोड़े-थोड़े अंतराल पर पुनरावृति का भय सताने लगा और इसबार इससे निपटने के लिए अलग नीति अपनाई. इसबार समझौता वार्ता के दरमियान ही दुष्प्रचार अभियान चलाया और इसके बाद आमजन को ऐसे कार्यक्रमों से दूर रखने के लिए क्रूर दमनचक्र चलाया. पार्टी और सरकार की चाहे जितनी भद पिटी हो लेकिन अहिंसक आंदोलनों से आमजन को दूर रखने की अपनी कोशिश को अंजाम दे दिया. किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के हितों की रक्षा के लिए पूरे संगठन की छवि को दांव पर लगाने की यह एक आत्मघाती कार्रवाई थी.
                        पार्टी 1975 के आपातकाल का माहौल बनाने पर तुली है. लेकिन उसे इस बात का अहसास नहीं कि उस वक़्त के और आज के नेतृत्व में ज़मीन आसमान का फर्क है. आज उसके पास ऐसा कोई चमत्कारी नेता नहीं जो पार्टी को धराशायी होने के बाद पुनः पूरी मजबूती के साथ खड़ा कर सके या तानाशाही को थोड़े समय के लिए भी अपने कुकृत्यों की ढाल बना सके.गांधी की आत्मा जाग चुकी है और उसे मार पाना आसान नहीं है. उनका अस्त्र कुंद होने वाला नहीं. देश पर तानाशाही लादने के मंसूबे पालने वाले इतिहास के किस कोने में दफ्न हो जायेंगे उन्हें पता भी नहीं चलेगा.    

-----देवेन्द्र गौतम     

शनिवार, जून 04, 2011

तालाब के बाहर पनडुब्बे

बचपन में तालाब किनारे जाने से हमें यह कहकर रोका जाता था कि इसके अन्दर पनडुब्बे  रहते हैं जो तालाब किनारे खड़े लोगों को पानी के अंदर खींच ले जाते हैं और डुबाकर मार डालते हैं. फिर मरनेवाला भी पनडुब्बा बन जाता है. पनडुब्बा का मतलब होता था तालाब में डूबकर मरे हुए लोगों का प्रेत. जब भी तालाब के पानी में डूबकर किसी की मौत होती थी हमें वह पनडुब्बा का ही कारनामा लगता था.
                     आज उम्र के पांच दशक पार करने के बाद मुझे लगता है कि अब पनडुब्बे तालाब के बाहर निकल आये हैं और इंसानों के बीच रहने लगे हैं. जरा सी असावधानी बरतने पर वे किसी की भी लुटिया  डुबो देते हैं और डूबने वाले का उबर पाना मुश्किल हो जाता है. मेरे एक परिचित हैं. अभी वे करोड़ों के क़र्ज़ में डूबे हुए हैं. लेकिन उन्हें इसका कोई अफ़सोस नहीं है. वे नया क़र्ज़ लेने को हमेशा तैयार रहते हैं. नया कर्ज लेकर पुराना कर्ज चुकाना उनका शगल रहा है. वे अपने तमाम रिश्तेदारों और ईष्ट-मित्रों की लुटिया डुबा चुके हैं. किसी न किसी बहाने उनकी सारी जमा पूंजी लेकर उन्हें पैसे-पैसे का मोहताज बना चुके हैं. खुद भी फटक-सीताराम हैं. उनकी पत्नी तक नहीं जानती कि इतने सारे पैसों का उन्होंने किया क्या. उनके पास हमेशा कुछ ज़मीन के कागजात और रियल स्टेट के कुछ लाभदायक प्रोजेक्ट होते हैं. उन्हें सिर्फ पता चल जाये कि फलां साहब के पास पैसे हैं तो वे उनके ईर्द-गिर्द चक्कर लगाना शुरू कर देंगे. उन्हें किसी प्रोजेक्ट में पैसा लगाकर भारी मुनाफा कमाने का प्रस्ताव देंगे. उससे जितने पैसे लेंगे गारंटी के तौर पर उतने का पोस्टडेटेड चेक भी काटकर दे देंगे. पैसा निकलने तक उससे दिन रात फोन से बात करते रहेंगे. सुबह-शाम मिलते रहेंगे. जब पैसा मिल जायेगा तो फिर मुलाकात और बात का सिलसिला कम होना शुरू हो जायेगा और फिर न मुलाकात होगी न बात. मोबाइल का स्विच ऑफ रहेगा. ऑन रहा भी तो कॉल डाईभर्ट रहेगा या फिर फोन उठेगा नहीं. इत्तेफाक से आपने ढूँढकर मुलाकात कर ली तो कहेंगे अरे! मोबाइल आलमीरा में रख दी थी पता ही नहीं चला. आप कुछ नहीं कर सकेंगे. ज्यादा से ज्यादा चेक बाउंस कराकर धोखेधडी का मामला दर्ज करायेंगे. कोई बात नहीं. न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कई वर्ष सुनवाई में निकल जायेंगे. वकील तारीख पर तारीख लेता जायेगा. बहुत पहुँच वाले  हुए तो जेल भिजवा देंगे. इससे क्या होगा.एक दो महीने की जेल फिर बेल. यह तो कई बार हो चुका है. आप घर पर जाकर गाली-गलौज कर सकते हैं. इससे भी कुछ फर्क नहीं पड़ता. वह जनाब गालीप्रूफ़ हैं. एक कान से सुनते हैं दूसरे कान से निकाल देते हैं. अपने घर में ही कैदी की तरह रहते हैं. कोई खोजने आता है तो कहलवा देते हैं कि शहर के बाहर हैं. घरवाले उनके महाजनों की उल्टी-सीढ़ी बातें सुनने को विवश रहते हैं. उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. वे घर से बाहर निकलते भी हैं तो बहुत छुप-छुपाकर.शाम ढलने के बाद. काला शीशा लगी गाड़ी में. ऐसे  पनडुब्बे जीवन के हर क्षेत्र में मौजूद हैं. तालाब के अंदर के पनडुब्बों से तो आप बच सकते हैं लेकिन बाहर के पनडुब्बों से बच पाना मुश्किल है.  
----देवेंद्र गौतम 

शुक्रवार, मई 06, 2011

इसी भाषा को समझते हैं पाकिस्तान के हुक्मरान

खबर है कि दाउद  इब्राहीम और छोटा शकील करांची से भाग निकले हैं. ओसामा बिन लादेन के सफाए के बाद आइएसआई ने भारत की और से ओसामा जैसी कार्रवाई के अंदेशे से उन्हें ठिकाना बदलने की सलाह दी थी. काले धन और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे  भारतीय नेतृत्व में ऐसा साहसिक कदम उठाने का आत्मबल है या नहीं यह तो पता नहीं लेकिन इतना तय है कि पाकिस्तान उसी भाषा को समझता है जिसका इस्तेमाल अमेरिका ने किया. वह आतंकवादियों का सुरक्षित अभ्यारण्य बन चुका है और और उन्हें सुरक्षित रखना अपना प्राथमिक कार्यभार समझता है. अमेरिका तो उसका अन्नदाता था. लेकिन उसे हवा तक नहीं लगने दी कि  दुनिया का मोस्ट वांटेड आतंकवादी ओसामा उसकी सैन्य छावनी के पास अपना किला बनाकर रह रहा है. तो क्या वह भारत सरकार के अनुरोध पर वह मुंबई सीरियल ब्लास्ट और दूसरी आतंकी कार्रवाई के जिम्मेवार लोगों को भारत के हवाले कर देगा..?  उससे ऐसी उम्मीद रखना कहां की होशियारी है. उस पिद्दी से मुल्क से इतना खौफ क्यों खाती है भारत सरकार....? अमेरिका ने तो आतंकवादी कार्रवाइयों को उतना नहीं झेला जितना भारत झेल चुका है. भारत का ख़ुफ़िया तंत्र अमरीकी ख़ुफ़िया तंत्र से कम ताक़तवर नहीं है. लेकिन सरकार की हरी झंडी के बगैर वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता.
                                 यह बात सामने आ चुकी है कि पाकिस्तान में सत्ता की असली कमान सेना और आइएसआइ के पास है और उनकी अर्थव्यवस्था सरकार पर नहीं बल्कि नशीले पदार्थों की तस्करी पर टिकी है. यह धंधा आतंकवादियों के सहयोग से ही चलता है. उनका सामाजिक आधार हैं थोड़े से कट्टरपंथी. बाकी जनता तमाशबीन बनी हुई है. जो कुछ चल रहा है वह उसकी मर्ज़ी के खिलाफ है. लेकिन वह चाहकर भी कुछ कर नहीं सकती. पाकिस्तान के असली हुक्मरानों के पाकिस्तान में जरदारी की हैसियत मात्र एक कठपुलती जैसी है. वे जबतक उनकी हां में हां मिलते रहेंगे तभी तक उनकी कठपुतली वाली हैसियत भी कायम रहेगी. वरना उनका तख्ता पलटने में असली हुक्मरानों को देर नहीं लगेगी. ओसामा के मरे जाने और आतंकवाद के प्रति वास्तविक रुख का खुलासा होने के बाद अब पाकिस्तान ऐसी कार्रवाई की पुनरावृति करने वाले देश को सबक सिखाने की धमकी दे रहा है. उसका इशारा भारत की और है. और देशों से तो कार्रवाई की आशंका है. जिसके मद्दे-नज़र वह अपने खास मेहमानों को नए ठिकानों पर शिफ्ट कर चुका है. अमेरिका तो यह कार्रवाई कर चुका है. उसके एक खास मेहमान की हत्या कर उसकी लाश तक गायब कर दी है. पाकिस्तानी सेना या उसका विदेश मंत्रालय क्यों नहीं अमेरिका को सबक सिखाने की धमकी देता.चीन की सरपरस्ती तो उसे हासिल है ही.जाहिर है कि उसे पता है कि भारत भले उसकी धमकी को नज़र-अंदाज़ कर जाये लेकिन अमेरिका तुरंत मुहतोड़ जवाब दे देगा. भारत कूटनीति के जरिये समस्या को हल करना चाहता है लेकिन कूटनीति और शराफत को बुजदिली की मंजिल तक नहीं आने देना चाहिए. पाकिस्तान के असली हुक्मरान इस भाषा को नहीं समझते. यह धारणा भी गलत है कि कड़ी कार्रवाई से उनके वोट बैंक पर असर पड़ेगा. सच तो यह है कि अपराधियों, आतंकियों और तानाशाहों के जिस मकडजाल में पाकिस्तान फंस चुका है उससे छुटकारा मिलने और सच्चे लोकतंत्र की स्थापना होने का पाकिस्तान की व्यापक आबादी स्वागत ही करेगी.

----देवेंद्र गौतम 

रविवार, अप्रैल 24, 2011

न दामन पे कोई छींट , न खंज़र पे कोई दाग

इंदिरा गांधी के ज़माने में कलीम आजिज़ का एक शेर काफी चर्चित हुआ था-

"न दामन पे कोई छींट , न खंज़र पे कोई दाग 
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो."

                     आज कांग्रेस नेतृत्व उसी करामत को दुहरा रहा है. अन्ना हजारे के आन्दोलन से उमड़े जन सैलाब को शांत करने के लिए उनकी सभी मांगें मान लीं. लोकपाल विधेयक के लिए ज्वाइंट ड्राफ्टिंग कमिटी के गठन और उसमें सिविल सोसाइटी के सदस्यों की बराबर की भागीदारी स्वीकार कर ली. उनकी नियुक्ति भी हो गयी. लेकिन इसके तुरंत बाद 'उसकी कमीज मेरी कमीज से सफ़ेद क्यों' के अंदाज़ में एक-एक कर सिविल सोसाइटी के सदस्यों पर निशाना साधकर उनके गड़े मुर्दे उखाड़े जाने लगे. शुरुआत अन्ना हजारे से ही की गयी कि आन्दोलन का खर्च कहां से आया. इसके बाद कर्णाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े, पूर्व विधि मंत्री शांतिभूषण और उनके पुत्र प्रशांत भूषण पर निशाना साधा गया. शांतिभूषण के खिलाफ एक सीडी पेश किया गया जो 2005 में तैयार की गयी थी. इसे किसने तैयार किया और 6 बर्षों तक उसे दबाये क्यों रखा. उनके ड्राफ्टिंग कमिटी में शामिल होने के बाद उसे क्यों निकला गया यह कुछ प्रश्न हैं जो सीडी बनाने वाले और उसे उजागर करने वाले की  मंशा जाहिर करते हैं. अब कमिटी के अध्यक्ष प्रणव मुखर्जी कहते हैं कि ड्राफ्ट तैयार करने की प्रक्रिया पर प्रभाव डालने वाले किसी विवाद को अनुमति नहीं दी जाएगी. बस हो गया काम..सिविल सोसाइटी के लोगों के मनोबल को भी साइज़ में ला दिया गया और ड्राफ्ट की तैयारी में व्यवधान डालने के आरोप से भी मुक्ति पा ली गयी.क़त्ल भी हो गया और न दामन पे छींट पड़ी न खंज़र पे दाग पड़ा. सिविल सोसाइटी के सदस्यों पर मानसिक दबाव बनाकर केंद्र सरकार कैसा ड्राफ्ट तैयार कराती है यह तो ड्राफ्ट के तैयार होने के बाद कानूनविद ही बेहतर बता पाएंगे लेकिन राजनीति का यह अंदाज़ इस बात की अलामत है कि भ्रष्टाचार    के पोषकों का तंत्र  बहुत ही चतुर, बहुत ही कुटिल और बहुत ही सुगठित है. इससे सीधे उंगली घी निकलना मुश्किल है. अन्ना हजारे एक सीधे-सादे सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं. राजनैतिक चालबाजी और प्रपंच को वे किस हद तक आत्मसात कर पाएंगे और उसका समयानुकूल जवाब कैसे दे पाएंगे कहना मुश्किल है. लोकपाल विधेयक तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई की एक सांकेतिक शुरूआत है. इस बात को सत्ता में बैठे लोग भी जान रहे हैं. इसीलिए तू डाल-डाल तो मैं पात-पात के अंदाज़ में इससे निपटने की कोशिश की. अब इस लड़ाई को आगे बढ़ने के लिए काफी सतर्कता की ज़रुरत पड़ेगी. सीधे उंगली तो कत्तई घी नहीं निकलेगा. 

------देवेंद्र गौतम 

मंगलवार, अप्रैल 19, 2011

आश्वासन नहीं सर के ऊपर छत चाहिए

 झारखंड में अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत सरकारी ज़मीन पर बसे लोगों को उजाड़ने का काम करीब दो महीने से चल रहा है. अभी तक कई हज़ार परिवार बेघर किये जा चुके हैं. इतना कुछ हो चुकने तक शांत बैठे पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिंहा के सीने में अचानक दर्द उठा और वे सोमवार 18 अप्रैल को उजड़े गए लोगों के पुनर्वास और इस अभियान पर रोक की मांग की मांग को लेकर रांची के बिरसा चौक पर अनशन पर बैठ गए. बाद में कैबिनेट की बैठक में इस मुद्दे पर हाई कोर्ट में संशोधन याचिका दायर करने के फैसले के बाद उन्होंने अनशन तोडा. सिंहा साहब भाजपा के वरीय नेता हैं. राज्य में भाजपानीत एनडीए की सरकार है. लाख टके  का सवाल है कि अपनी सरकार के समक्ष कोई मांग रखने के लिए उन्हें अनशन करने की क्या दरकार पड़ी और यह दर्द इतने विलम्ब से क्यों उठा. इसी तरह का  सवाल केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय  की इस मुद्दे पर भूमिका को लेकर भी उठता है. नागा बाबा खटाल के उजाड़ने पर मंत्री जी को खास परेशानी नहीं हुई लेकिन जब इस्लामनगर की और बुलडोजरों का रुख हुआ तो वे बेचैन हो गए और ईंट से ईंट बजाने का एलान करते हुए धरना पर बैठ गए. लाठी खाई और न्यायपालिका की अवमानना के आरोपी भी बने. उनके सीने में दर्द उठने का कारण था इस्लामनगर का उनके चुनाव क्षेत्र में होना. नागा बाबा खटाल उनके चुनाव क्षेत्र में नहीं था इसलिए दर्द नहीं उठा. अब एचइसी  इलाके से अतिक्रमण हटाने के सवाल पर वे मरने मारने की बात कह रहे हैं. उनकी पीड़ा का स्रोत समझ में आता है. उनका दर्द उजड़े गए आम लोगों के लिए नहीं बल्कि अपने वोटरों के लिए है. लेकिन यशवंत सिंहा का तो यह चुनाव क्षेत्र भी नहीं है. दरअसल गरीब वर्ग के लोगों को जिस अमानवीय ढंग से उजाड़ा गया है. अब सरकार अमीरों को किसी तरह की राहत देने का नैतिक साहस नहीं जुटा सकती. जो बुलडोजर गरीबों की झोपड़ियों पर चले अब उनका रुख अमीरों के बंगलों की तरफ होने का वक़्त आ गया है. यशवंत सिंहां साहब की सहानुभूति संभवतः इसी वर्ग के साथ है. इसी आशंका ने उन्हें बेचैन कर दिया. अब कोर्ट में मामला उलझने के बाद उन्हें राहत मिल जाएगी.
           उजाड़े गए लोगों के प्रति सहानुभूति तो विधान सभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और तमाम पक्ष विपक्ष के नेता प्रकट कर रहे हैं. दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने भी उनके पुनर्वास की मांग की है. उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तो पुनर्वास स्थल तक का चयन कर चुकने का एलान कर चुके हैं. लेकिन ज़मीनी स्तर पर अभी तक इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं सुनाई दे रही है. सच्चाई यह है कि यह अभियान कोई अचानक शुरू नहीं हुआ. हाई कोर्ट के आदेश के बाद इसके लिए काफी तैयारी करनी पड़ी. आज घडियाली आंसू टपकाने वाले सरकार में बैठे जनता के नुमाइंदे यदि चाहते तो इस बीच पुनर्वास की व्यवस्था कर सकते थे.लेकिन उस वक़्त उन्हें न तो इसका ध्यान रहा और न ही इसकी ज़रूरत महसूस की. अभी भी वे पुनर्वास की बात तो कर रहे हैं लेकिन इसके लिए कोई पहल नहीं कर रहे हैं. उजड़े हुए लोग. अपने परिजनों के साथ जहां तहां भटक रहे हैं. आश्वासन तो बहुत लोग दे रहे हैं लेकिन सर के ऊपर छत कोई नहीं दे रहा है. इस आंच में सिर्फ राजनैतिक स्वार्थ की रोटियां सेंकी जा रही हैं. यही विडंबना है.

------देवेंद्र गौतम    

गुरुवार, अप्रैल 14, 2011

खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे.


दो कदम पीछे हटे हैं वो अभी 
एक कदम आगे निकलने के लिए.
ये सियासत का ही एक अंदाज़ है 
झुक गए हैं और तनने के लिए....

सौजन्य-- गूगल सर्च 
        अपने गजलों के ब्लॉग  गज़लगंगा पर मैंने 12 अप्रैल को यह कत्ता पोस्ट किया था जब पूरा देश जन दबाव के आगे सरकार के झुकने को विवश होने को लोकतंत्र की जीत मानकर जश्न मना रहा था. अन्ना हजारे ने दरअसल इस मुद्दे के जरिये एक पूरी व्यवस्था को निशाने पर लिया था. कोई स्थापित व्यवस्था इतनी जल्दी हार नहीं मानती. उसका पीछे हटना दरअसल एक आक्रामक युद्ध की तैयारी का ही हिस्सा था. जन लोकपाल विधेयक के दस्तावेजीकरण में जन भागीदारी की शर्त स्वीकार कर लेने के जरिये तत्काल मामले को टाल देना भर इसका उद्देश्य था. अब इस व्यवस्था में रचे बसे तमाम दल और व्यक्ति अन्ना हजारे के खिलाफ मोर्चा खोल बैठे हैं. आडवाणी जैसे जिम्मेवार नेता उन्हें चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहे हैं. उन्होंने महात्मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण का दौर भी देखा है. उनलोगों ने कभी चुनाव नहीं लड़ा था तो  फिर उनकी आवाज़ पर जनसमूह क्यों उमड़ पड़ता था..? क्या आडवाणी जी चुनाव लड़ने और संसदीय संस्थाओं में पहुंच जाना ही लोकप्रियता और जन स्वीकार्यता की एकमात्र कसौटी मानते हैं..? यदि ऐसा है तो क्या वे उस व्यवस्था का पक्षपोषण नहीं कर रहे जिसके खिलाफ जंतर मंतर से एक सांकेतिक युद्ध का बिगुल फूंका गया था. उन्हें 1977 का जमाना विस्मृत हो गया जब इंदिरा गांधी जैसी करिश्माई नेत्री की सल्तनत धराशायी हो गयी थी. लोकनायक जेपी ने खुद तो चुनाव नहीं लड़ा था लेकिन उनके आशीर्वाद से एक अजेय समझी जानेवाली सरकार गिर गयी थी और एक बहुमत की सरकार बन गयी थी. अन्ना हजारे एक सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं . निर्विवाद हैं इसलिए उनके पीछे इतना बड़ा जनसैलाब उमड़ आया. यदि वे चुनाव लड़ना चाहेंगे तो वे एक पूरी बारात लेकर संसद में पहुंचेंगे. सत्ता के खिलाडियों को इस बात का खटका है इसीलिए उन्होंने अन्ना हजारे के खिलाफ मोर्चा खोला है. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की चिंता यह है कि इतने बड़े आन्दोलन के लिए धन कहां से आया. उनकी चिंता लाजिमी है. जिस राजनैतिक परिवेश में वे पले-बढे हैं उसमें पैसे के बल पर ही सारे काम होते हैं. हर कार्यक्रम के लिए कुछ गुप्त कुछ खुले प्रायोजक होते हैं. यदि कांग्रेस ने यह आमरण अनशन का कार्यक्रम आयोजित किया होता तो उसका बज़ट निश्चित रूप से करोड़ों में होता. वे सोच भी नहीं सकते कि देश के विभिन्न इलाकों के लोग बिना पैसा लिए, बिना आवागमन की सुविधा प्रदान किये अपने खर्च से दिल्ली आ सकते हैं. विभिन्न शहरों में लोग बिना किसी प्रायोजक के अनशन पर बैठ सकते हैं. आमजन की इस भावनात्मक ज्वाला की आंच उन्होंने कभी न देखी  न महसूस की तो वे और सोच भी क्या सकते हैं. 
                    राजनैतिक दलों के अलावा अन्ना के खिलाफ एक मोर्चा उनके आन्दोलन के धर्मनिरपेक्ष साथियों ने भी खोल रखा है. उन्हें इस बात से नाराजगी है कि अन्ना ने नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार के कार्यों की सराहना क्यों की. उन्हें आदर्श मुख्यमंत्री कैसे कह दिया. जिस सन्दर्भ में यह बात कही गयी उसे वे नज़रंदाज़ कर रहे हैं. नीतीश कुमार पर तो एनडीए का सहयोगी होने के अलावा वे कोई आरोप नहीं मढ़ सकते लेकिन नरेन्द्र मोदी को गोधरा कांड और गुजरात दंगे का आरोपी होने के नाते सांप्रदायिक करार दे सकते हैं. सवाल उठता है क्या अन्ना ने मोदी की सराहना गोधरा कांड या गुजरात दंगे में भूमिका के लिए की है...? उन्होंने ग्रामीण विकास के निमित्त उनके कार्यों की प्रशंसा  करते हुए अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों को  ऐसा ही करने की सलाह दी थी. अगर यूपीए या वामदलों का कोई ऐसा मुख्यमंत्री उनकी नज़र में हो जिसने ग्रामीण विकास का इससे बेहतर कार्य किया हो तो उन्हें बताना चाहिए कि नहीं अन्ना दा ग्रामीण विकास तो फलां मुख्यमंत्री ने इनसे कहीं ज्यादा बेहतर किया है. किसी व्यक्ति के आचरण और व्यवहार के कई पक्ष होते हैं. उसके पूरे व्यक्तित्व को एक ही तराजू से तौला जाना  उचित नहीं है. नरेन्द्र मोदी यदि सिर्फ एक सांप्रदायिक व्यक्ति हैं तो  गुजरात की जनता उन्हें उखाड़ फेंकने का काम क्यों नहीं कर रही. 
                  अन्ना हजारे दरअसल एक सीधे-सादे सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं. वे कोई राजनैतिक व्यक्ति नहीं हैं. वे सरल ह्रदय के साफ सुथरे इंसान  हैं. गलत चीजों का गांधीवादी तरीके से विरोध करने का उनके अन्दर साहस है. 
निर्विवाद होने के कारण ही उनके आन्दोलन का इतना व्यापक जन समर्थन मिला. व्यवस्था के पोषकों और संचालकों का उनसे डरना लाजिमी है. इसीलिए उस वक़्त मौके की नजाकत को देखते हुए एक कदम पीछे हटकर उनकी तमाम मांगें स्वीकार कर लेने वाली राजसत्ता अब उनकी जमात में फूट डालकर उनके मुहिम को कमजोर करने के प्रयास में लगी है. इसमें कुछ हद तक सफलता भी मिल रही है. लेकिन युवा वर्ग और भारत की 120 करोड़ जनता का अन्ना में जो विश्वास है वह हवा के इन झोंकों से डिगने वाला नहीं दीखता. यह बदलाव की आंधी की पूर्व सूचना है. इसका विरोध करने वाले इस आंधी में कहां जाकर गिरेंगे अभी वे इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते.
------देवेंद्र गौतम

शनिवार, अप्रैल 09, 2011

चार दिन बनाम चालीस साल

अन्ना हजारे का चार दिन का आमरण अनशन नक्सलियों के चालीस साल के हिंसक संघर्ष पर भारी पड़ा. इन चार दिनों के अंदर देस के हर हिस्से में समाज के हर तबके से समर्थन की जो सुनामी उठी उसकी मिसाल महात्मा गांधी या लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलनों के दौरान उठे जन सैलाब से ही दी जा सकती है. नक्सलियों   की हिंसक कार्रवाइयों से प्रभावित क्षेत्र की जनता में दहशत ज़रूर छाई है लेकिन कभी ऐसा उत्साह उत्पन्न नहीं हुआ है. भारत में कोई भी बदलाव गांधीवाद के रास्ते से ही आएगा और यहां के लोग बंदूक की नली से सत्ता की उत्पत्ति की अवधारणा को किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे अन्ना के आंदोलन और उसकी उपलब्धि से यह बात साफ़ हो चुकी है. 
            निश्चित रूप से इस आंदोलन के प्रति लचीला और सकारात्मक रुख अख्तियार कर मनमोहन सिंह सरकार ने यह संदेश दिया है के वह गांधीवाद की भाषा समझती है.कुछ पूर्ववर्ती सरकारों ने शांतिपूर्ण अहिंसक आंदोलनों पर दमनचक्र चलाकर और हिंसक संगठनों के साथ समझौता वार्ता कर यह जाहिर किया था कि गांधी की नहीं गोली और बारूद की भाषा ही समझती है. इसके बाद ही देस में उग्रवाद और आतंकवाद ने जोर पकड़ा था. 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान श्रीमती इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाकर और अर्द्धसैनिक बलों तथा ख़ुफ़िया एजेंसियों का राजनैतिक इस्तेमाल कर आंदोलन को कुचल डालने का भरसक प्रयास किया था. हालांकि उस आंदोलन को इतना ज़बरदस्त जन समर्थन प्राप्त था कि उस आंधी में खुद उन्हीं का आशियाना उखड गया था. उनके हाथ से सत्ता की बागडोर निकल गयी थी. इस आंदोलन का प्रभाव यह पड़ा कि कई नक्सली गुटों ने हिंसा का रास्ता त्यागकर मुख्य धारा की राजनीति  शुरू कर दी. 1977 में जब मोरारजी देसाई के नेतृत्त्व में आन्दोलनकारियों की सरकार बनी. उस सरकार ने भी आन्दोलन के गांधीवादी तौर-तरीकों को तरजीह नहीं दी. जेपी समर्थक नवयुवकों ने उस ज़माने में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का गठन  कर सम्पूर्ण क्रांति की शुरूआत की. उनका सबसे बड़ा आंदोलन बोध गया महंथ की करीब 15 हज़ार एकड़ सीलिंग से अधिक और बेनामी ज़मीन की ज़ब्ती और भूमिहीनों के बीच वितरण का था. यह विश्व में अहिंसक वर्ग संघर्ष का पहला प्रयोग था. इसपर पूरी दुनिया की नज़र थी. खुद नक्सली संगठनों ने भी अपने संघर्ष को रोक दिया था और इसके परिणामों  का इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन सरकार और स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने महंथ के लठैतों की भूमिका अपना ली.शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और धरने के कार्यक्रमों को लाठी  और अश्रुगैस से रोकने की कोशिश की जाने लगी. 8  अगस्त 1979 को तो हद ही हो गयी. बोध गया के मस्तीपुर गांव में आन्दोलनकारियों की सभा में पुलिस और महंथ के पहलवानों ने लाठी और गोली से हमला कर दिया. कई प्रदर्शनकारी घायल हुए. तीन-चार लोग मरे गए. नक्सलियों ने इस कार्रवाई के विरोध में उसी रात महंथ के एक पहलवान की हत्या कर दी. उनका अहिंसक वर्ग संघर्ष के इस प्रयोग से मोहभंग हो गया. उन्हें लगा कि उनका बन्दूक का रास्ता ही सही है. इसके बाद उनकी लड़ाई तेज़ हो गयी. इधर सरकारी तंत्र ने उलटे महंथ के पहलवान कि हत्या के आरोप में वाहिनी के कार्यकर्ताओं  के विरुद्ध मुकदमा ठोक दिया. प्रदर्शन के दौरान घायल हुए या मरे गए आन्दोलनकारियों का मामला ठप्प हो गया. अहिंसक आन्दोलन को कुचलने का नतीजा आज भी यह देस भुगत रहा है. 1980 में श्रीमती गांधी दुबारा सत्ता में आयीं तो उन्होंने भी भिंडरवाले जैसे आतंक को अपने विरोधियों को दबाने के लिए परोक्ष रूप से प्रश्रय दिया.सुभाष घिसिंग, लाल्देंगा जैसे लोगों की ताक़त उनके ज़माने में ही बढ़ी. जिस हिंसा उनहोंने बढ़ावा दिया वही अंततः  उनके लिए भष्मासुर साबित हुआ. राजीव गांधी प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने भी लालदेंगा से समझौता कर हिंसा की भाषा को सरकारी तौर पर जल्दी सुनी जाने वाली भाषा के रूप में स्थापित किया. इन कार्रवाइयों से हिंसक संघर्षों को बल मिला. गांधीवादी आन्दोलन के तौर तरीके अप्रासंगिक नज़र आने लगे. मनमोहन सरकार ने अन्ना हजारे के आन्दोलन पर लचीला रुख अपना कर अहिंसा की भाषा के प्रति अपनी स्वीकृति दी है. इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा.
           अन्ना हजारे भारत के राजनैतिक संतों की परंपरा की कड़ी हैं. सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने पूर्ववर्ती राजनैतिक संतों की गलतियों को दुहराया नहीं है. महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आन्दोलन की सफलता के बाद उसकी उपलब्धियों से स्वयं  को अलग कर लिया था. सत्ता  की बागडोर दूसरों के हाथ में थमा दी थी. उसपर अपना कोई नियंत्रण नहीं रखा था. नतीजतन उनकी परिकल्पना आकर नहीं ले सकी थी. सिर्फ स्वार्थपूर्ति के लिए उनका नाम भुनाया जाता रहा था. सत्ता के प्रति अपनी अनाशक्ति का प्रदर्शन करने के लिए उन्होंने ऐसे लोगों को नेतृत्व थमा दिया जो उनके सिद्धांतों को न समझते थे न समझना चाहते थे. अन्ना हजारे ने एक सदस्य के रूप में सही संयुक्त समिति में रहना स्वीकार कर यह बता दिया कि वे पूर्वजों की  गलती दुहराने नहीं जा रहे. अन्ना हजारे और उनके समर्थकों ने एक और सतर्कता बरती. उन्होंने किसी भी राजनैतिक दल के नेता को अनशन स्थल पर फटकने नहीं दिया. आन्दोलन में ऐसे गैर राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्त्ता और विभिन्न क्षेत्रों के अगुआ लोग इकट्ठे हुए जिनकी जनता के बीच साफ़ सुथरी छवि है. युवा वर्ग का उत्साह एक नए बदलाव की यात्रा प्रारंभ होने का विश्वास दिला रहा था. देशभर में लोग टीवी पर आंख गडाए पल-पल की खबर उसी तन्मयता से ले रहे थे जिस तन्मयता से कुछ ही दिन पहले क्रिकेट मैच के स्कोर  की जानकारी ले रहे थे. अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जंतर मंतर की  इस हलचल को वामपंथी या भाजपाई किस रूप में विश्लेषित कर रहे हैं. लेकिन इस घटना ने जनतंत्र में तंत्र पर जन की पकड़ को मज़बूत किया है.यह भ्रष्टतंत्र के खिलाफ जनतंत्र की जंग के शुरूआत है. अभी कई मरहले पार करने हैं. कई अवरोध हटाने हैं. जनमानस में नई आशाओं का संचार हुआ है. अन्ना हजारे के नेतृत्व में  एक सकारात्मक बदलाव की ओर कारवां निकल पड़ा है. 

-----देवेंद्र गौतम 

गुरुवार, अप्रैल 07, 2011

एक लम्बी लड़ाई का शंखनाद

प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे का आमरण अनशन और उसे पूरे देश में मिल रहा व्यापक समर्थन इस बात का संकेत है कि सत्ता के गलियारे में आर्थिक लुटेरों का तिलस्मी जाल अब अभेद्य नहीं रह पायेगा. सरकार रिंद के रिंद रहे हाथ से ज़न्नत न गयी के अंदाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का नाटक नहीं कर पायेगी. लुटेरों  के इस तंत्र के खिलाफ विभिन्न मंचों से जंग तो पहले से चल रही है लेकिन अब अन्ना हजारे के अनशन के साथ उसके खिलाफ एक व्यापक जन आन्दोलन का शंखनाद हो चुका है. अब भ्रष्टाचार के प्रत्यक्ष या परोक्ष पहरुओं की आवाज़ भी लड़खड़ाने लगी है.
                  कितनी दिलचस्प बात है कि इधर बाबा हजारे अनशन पर बैठे और उधर चुनाव आयोग ने विधान सभा चुनाव की तैयारी में लगे पांच में से तीन राज्यों असम, पश्चिम बंगाल और तमिल नाडू में 42 .75 करोड़ रुपये ज़ब्त किये. तमिल नाडू में तो एक बस की छत से 5 .11 करोड़ जब्त किये.जाहिर है कि उससे कहीं ज्यादा राशि बंट चुकी होगी या बांटे  जाने के लिए तैयार रक्खी होगी. चुनाव आयोग की कोशिशों से चुनाव में पैसे के खेल में कुछ दबाव ज़रूर बना है लेकिन भारत में चुनाव अभी भी एक बड़ी पूंजी से खेले जाने वाले जुए का रूप धारण किये हुए है. यहां के मतदाता भी पैसे और प्रलोभन के आधार पर वोट दे देते हैं. कोई साधारण सामाजिक कार्यकर्त्ता तो चुनाव लड़ने की हिम्मत भी नहीं कर पाता. इसलिए सत्ता की राजनीति में वही लोग सफल हो पाते हैं जिनके दो नम्बरी व्यापारियों से संबंध होते हैं. किसी भी ईमानदार व्यक्ति के पास किसी दूसरे खिलाडी को जुआ खेलने के लिए भारी भरकम पैसे देने की क्षमता नहीं हो सकती. ग़लत धंधो का काला धन ही इस तरह के प्रयोजन में इस्तेमाल किया जाता है. उस समय देने और लेने वाले के बीच सत्ता हांथ में आने के बाद आर्थिक स्रोतों के दोहन में सहयोग का एक मौन समझौता हो चुका होता है. राजनैतिक दलों के नेता जानते हैं कि पार्टी चलने के लिए अनैतिक रास्ते अपनाने ही होंगे. सत्ता में आये तो करीबी धंधेबाजों के साथ घोटाले करने होंगे. जिस भी रास्ते से आये कोष जुटाना ही होगा. सत्ता की राजनीति पूरी तरह काले धन से संचालित और उसकी पोषक हो चुकी है. जाहिर है कि जन लोकपाल विधेयक का दस्तावेज़ वे ऐसा ही बनाने की कोशिश करेंगे जिससे जनता को लगे कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक निर्णायक हथियार बन चुका है जबकि उसकी मारक क्षमता बच्चों के गुरदेल से भी कम हो. अन्ना हजारे विधेयक का प्रारूप तैयार करने में पचास फीसदी जन भागीदारी की मांग कर रहे हैं तो यह उन्हें कैसे मंज़ूर हो. 
                            हाल के दिनों में बाबा रामदेव, गोविन्दाचार्य, अन्ना हजारे, किरण बेदी, स्वामी अग्निवेश जैसे व्यापक जन समर्थन वाले समाजसेवियों का एक ऐसा मंच तैयार हुआ है जो मौजूदा व्यवस्था की विकृतियों को बारीकी से समझ रहा है और एक आमूल परिवर्तन की लड़ाई छेड़ने को बेचैन है. निश्चित रूप से यह एक लम्बी लड़ाई की शुरूआत भर है. इसका नतीजा सामने आने में कितना वक़्त लगेगा इस बीच  कौन-कौन से मोड़ आयेंगे.....कितनी शहादतें देनी होंगी अभी कहना मुश्किल है लेकिन इतना तय है मौजूदा व्यवस्था की जड़ों पर प्रहार शुरू हो चुका है और उसकी उल्टी गिनती प्रारंभ हो चुकी है. उसी की अलामत है जंतर-मंतर के पास बाबाअन्ना  हजारे का आमरण अनशन.    
----देवेंद्र गौतम 

सोमवार, अप्रैल 04, 2011

.इस उन्माद की......क्षय हो...!

पूरा देश क्रिकेट के उन्माद में डूबा हुआ है. छोटे बड़े हर शहर हर कस्बे में जश्न का माहौल है. टीम इंडिया के खिलाडियों पर उपहारों की बारिश हो रही है. उनका जोरदार स्वागत किया जा रहा है. यह  स्वाभाविक भी है. आखिर पूरे 28 वर्षों बाद विश्व कप पर भारत का कब्ज़ा हुआ है. काश! कि भावनाओं का यही ज्वार कारगिल युद्ध के बाद देश के नौजवानों में दिखाई पड़ा होता. युद्ध के मैदान से लौटे जवानों का ऐसा ही स्वागत किया गया होता. उनपर भी उपहारों की ऐसी ही बारिश की गयी होती. शहीदों को अंतिम सलामी देने के लिए लोग उमड़ पड़े होते. लेकिन इसका शतांश उत्साह भी उस वक़्त नहीं दिखाई पड़ा था. जापान में भूकंप, सुनामी और परमाणु विकिरण की घटना से पूरा विश्व दहल उठा लेकिन आज जो क्रिकेट के उन्माद में डूबे हैं उनके अंदर करुणा की कोई ऐसी लहर नहीं फूटी जिसे महसूस किया जा सके. उन्माद और संवेदनशीलता में यही फर्क होता है. संवेदनशीलता रचनात्मक होती है जबकि उन्माद विध्वंसात्मक . रांची के क्रिकेटप्रेमियों ने जीत के उन्माद में अलबर्ट एक्का की मूर्ति में जड़ी बन्दूक ही तोड़ डाली. उसे अपने साथ ले गए. जाहिर है कि उनके लिए स्वतंत्रता संग्राम से ज्यादा महत्व क्रिकेट मैच का था और एक शहीद की मूर्ति के हाथों में रक्खी बन्दूक से ज्यादा महत्व उस बल्ले का था जिसे ठीक से पकड़ना भी उन्हें शायद ही आता हो. इस मानसिक धरातल को समझने की ज़रूरत है.
       हमारे देश के क्रिकेट के बुखार से तप रहे लोगों को शायद ही इस बात का अहसास हो कि यह खेल सिर्फ उन्हीं देशों में खेला जाता है जो ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत हुआ करते थे. जहां ब्रिटिश सरकार का सिक्का चलता था. जहां के लोगों को उनके ज़ुल्मो-सितम से निजात पाने के लिए आज़ादी की लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ी थी. हजारों लोगों को शहादत देनी पड़ी. जेलों की यातना सहनी पड़ी. अब यदि इस औपनिवेशिक और गुलामी के दिनों कि याद दिलाने वाले इस खेल की जीत पर किसी स्वतंत्रता सेनानी के प्रतीक को अपमानित करने में कोई संकोच नहीं होता तो हम किस मानसिकता में जी रहे हैं. हमारी ख़ुशी और हमारे दुखों का पैमाना क्या है, इसपर विचार करने की ज़रूरत है. आज जो लोग अपना सारा कामधाम छोड़कर क्रिकेट नहीं देखते, या काम करते हुए हर 15-20 मिनट पर स्कोर की जानकारी नहीं लेते. भारत की हार पर आंसू नहीं बहाते, जीत पर पटाखे नहीं छोड़ते, तोड़-फोड़ नहीं मचाते उन्हें बैकवर्ड समझा जाता है. यदि इस खेल में दिलचस्पी नहीं रखने वाले बैकवर्ड माने जाते हैं तो तथाकथित फारवर्ड लोग बताने की कृपा करें कि अमेरिका, फ्रांस,जर्मनी, चीन, रूस, जापान जैसे देशों के लोगों के बारे में उनका क्या खयाल है.....?  किसी समाजवादी या पूंजीवादी देश में यह खेल नहीं खेला जाता. तो क्या वहां के लोग बैकवर्ड हैं. सिर्फ अंग्रेज और उनकी गुलामी के मनोवैज्ञानिक दबाव में जीनेवाले लोग ही फारवर्ड हैं..?  औपनिवेशिक चेतना ही आधुनिकता की कसौटी है..?  यदि ऐसा है तो इस आधुनिकता की क्षय हो...क्षय हो....क्षय हो...!...इस उन्माद की......क्षय हो...!

---देवेंद्र गौतम 

शुक्रवार, अप्रैल 01, 2011

अतिक्रमण करो..भूस्वामी बनो

भूमिहीनों और गृहविहीनों के लिए खुशखबरी है. अब उन्हें न तो इंदिरा आवास के लिए अफसरों की खुशामद करनी है, न दलालों के चक्कर में पड़ना है, न किसी को रिश्वत देनी है. बस सरकारी जमीन के किसी टुकड़े पर कब्ज़ा जमाकर बैठ जाना है. पहले बांस-फूस की झोपडी बनाकर रहना शुरू करना है फिर धीरे-धीरे उसे पक्का करवा देना है. जबतक कोई पूछता नहीं ठाट से रहना है. जब अतिक्रमण हटाओ अभियान चलेगा तो आप पुनर्वास के अधिकारी हो जायेंगे. सरकार आपको ज़मीन आवंटित करेगी. है न सीधा सरल रास्ता. झारखंड में इन दिनों चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान का यही संदेश है. हाईकोर्ट के आदेश पर सख्ती के साथ यह अभियान चलाया गया 60 -70 साल तक से अतिक्रमित इलाकों को खाली करा दिया गया. उनमें रह रहे हजारों परिवार बेघर हो गए. सबसे ज्यादा बवाल 60 वर्षों से अतिक्रमित नागा बाबा खटाल की ५.५ एकड़ भूमि को खाली करने पर मचा.  इसमें डेढ़ दर्जन खटाल चल रहे थे और कई दर्ज़न कच्चे-पक्के  मकान बने हुए थे. एक नेताजी ने तो तीनमंजिला मकान बनवा रखा था. अब विधानसभा अध्यक्ष समेत सभी दलों के विधायक उजाड़े गए परिवारों के पुनर्वास की मांग कर रहे हैं. इस अभियान को अविलंब बंद कराने की ताईद कर रहे हैं. जमशेदपुर में तो स्वयं मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने ही अभियान रुकवा दिया. स्थानीय अख़बारों में उजाड़े गए लोगों की करुण गाथा छापने की होड़ लगी हुई है. झारखंड में अतिक्रमण हटाओ अभियान के कारण विधायिका और न्यायपालिका के बीच शीतयुद्ध छिड़ गया है. कार्यपालिका दोनों के बीच सैंडविच की भूमिका में है. मामला कहीं न कहीं वोट बैंक से जुड़ जा रहा है. यदि न्यायधीशों को अपने पद पर बने रहने के लिए चुनाव लड़ना पड़ता तो शायद उनकी भी राय नेताओं जैसी होती. नेताओं की तो मजबूरी है इसलिए गरीबों के प्रति हमदर्दी जताने के इस स्वर्णिम अवसर का पूरा लाभ उठा लेना चाहते हैं. पूर्व मुख्य मंत्री बाबूलाल मरांडी ने तो नागा बाबा खटाल के उजाड़े गए लोगों को लेकर राजभवन का घेराव किया और पुनर्वास की व्यवस्था होने तक उन्हें वहीँ रहने का निर्देश दिया. अब राजनेताओं से कोई यह पूछे कि क्या जिन्होंने सरकारी ज़मीन का अतिक्रमण नहीं किया वे गरीब नहीं हैं. जिन्होंने अतिक्रमण कर तीनमंजिला मकान खड़ा कर लिया वे गरीब हैं और जिनके पास सर छुपाने की भी जगह नहीं वे अमीर हैं ? आखिर अमीरी-गरीबी का मापदंड क्या है. ज़मीन का अतिक्रमण हमेशा दबंग और प्रभावशाली लोग करते हैं. नागा बाबा खटाल के कब्जाधारियों में कई लोग दुकानों का निर्माण कर उसे किराये पर चला रहे थे. एडवांस और पगड़ी भी वसूल कर चुके थे. अतिक्रमण हटाओ अभियान तो महीने भर से चल रहा था. वे निश्चिंत थे कि हर बार की तरह इस बार भी उनपर हाथ नहीं डाला जायेगा. इसीलिए कोई वैकल्पिक व्यस्था करने की ज़रूरत नहीं समझी. कोर्ट का कड़ा आदेश नहीं होता तो शायद ही प्रशासन उनपर हाथ डालता. अब वोट की राजनीति के तहत इस मुद्दे को मानवाधिकार हनन का रूप देकर कोर्ट को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. इसके दूरगामी प्रभावों की किसी को चिंता नहीं है. यदि विधायिका का यही रुख रहा तो अतिक्रमण सरकारी ज़मीन प्राप्त करने का आसान रास्ता बन जायेगा. फिर इसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जायेगा.

-------देवेंद्र गौतम