मंगलवार, सितंबर 09, 2014

स्वानुभूति बनाम सहानुभूति का साहित्य

हिन्दी साहित्य में अभी दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श और स्त्री विमर्श का अभियान जोरों पर है। वैचारिक बहसों के अलावा तमाम विधाओं का रचनात्मक साहित्य इन्हीं के ईर्द, गिर्द घूम रहा है। लेकिन साहित्य के कुछ पुरोधाओं ने साहित्य का नए सिरे से वर्गीकरण करने की मुहिम छेड़ी है। उनका मानना है कि स्त्री की पीड़ा को स्त्री ही बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर सकती है क्योंकि वह प्रताड़ना झेलती है। वह जो लिखेगी उसकी स्वानुभूति की अभिव्यक्ति होगी। कोई पुरुष उनकी पीड़ा को चाहे जितनी खूबी के साथ किसी विधा में पेश करे वह स्वानुभूति का नहीं, सहानुभूति का साहित्य होगा। उसमें स्वाभाविकता का अभाव होगा। यही सीमांकन आदिवासी और दलित साहित्य के मामले में भी किया जा रहा है।
पहली बात यह है कि सच्चा लेखक या रचनाकार किसी लिंग, समुदाय या क्षेत्र से बंधा नहीं होता। उसकी दृष्टि व्यापक होती है। वह सात समंदर पार बैठे लोगों की पीड़ा को उनसे कहीं ज्यादा सिद्दत से महसूस कर सकता है। यह संवेदनशीलता का मामला है। मार्क्स कभी भारत नहीं आए थे। लेकिन 1857 की क्रांति सहित भारतीय समाज के मुद्दों पर उन्होंने जितने सटिक लेख लिखे हैं संभवतः चश्मदीद लोग भी वैसा नहीं लिख सकते। यदि स्वानुभूति का साहित्य ही साहित्य है तो फिर एेतिहासिक पृष्ठभूमि पर उपन्यास लिखे ही नहीं जाने चाहिए क्योंकि 7 वीं सदी की विडंबनाओं की स्वानुभूति 21 वीं सदी में तो नामुमकिन है। इसलिए अपनी संकीर्ण मानसिकता के तहत साहित्य का छिछला सीमांकन करने वालों को अपने इस छिछोरेपन से बाज आना चाहिए। साहित्य का मूल्यांकन तो आने वाली पीढ़ियां करेंगी। साहित्य सृजन के किसी प्रयास पर कृपया बंदिश लगाने की कोशिश न करें। इससे साहित्य का नुकसान होग।.

-------देवेंद्र गौतम

गुरुवार, मार्च 21, 2013

पशु प्रताड़ना की चिंता तो कीटों की अनदेखी क्यों

आज पशु क्रूरता निवारण में कई सरकारी गैर सरकारी संस्थाएं लगी हुई हैं लेकिन पता नहीं क्यों कीट पतंगों की सुधि नहीं ली जाती. आखिर वह भी तो कुदरत के बनाये जीव हैं और डार्विन के सिद्धांतों को माना जाये तो उनका अस्तित्व मनुष्य जाति की उत्पत्ति से बहुत पहले से है. एक मायने में वे बंदर से भी प्राचीन पूर्वजों की श्रेणी में आयेंगे.
हर दिन पता नहीं कितने करोड़ मच्छर बेमौत मारे जाते हैं. कितने ही काक्रोचों की बलि चढ़ती है.माना कि कीट-पतंगो की श्रेणी के जीव अल्पजीवी होते हैं. लेकिन क्या उन्हें स्वाभाविक मौत नसीब नहीं होनी चाहिए. उनकी हत्या के लिये दवायें खुलेआम बाजार में बिक रही हैं. उनका मूल्य उनकी मारक क्षमता के अनुरूप तय किया जाता है. कहीं कोई रोक-टोक नहीं. न जाने कितनी कंपनियां उन्हें मारने के आसान उपायों पर रात दिन शोध करा रही हैं. उनकी नन्ही सी जान सबकी आंखों में कांटा की तरह चुभती रहती है. उनके संरक्षण के लिये कोई कानून नहीं. हाल में गौरैया दिवस मनाया गया. अन्य कई पशुओं और चिड़ियाओं को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा प्रदान की जाती है. क्या आजतक किसी कीट के लिये कोई दिवस घोषित हुआ. उसके प्रति प्रेम या श्रद्धा का भाव प्रदर्शित किया गया. क्या कीट सुंदर नहीं होते. उन्हें नष्ट कर दिया जाना चाहिए. बताइये भला

---देवेंद्र गौतम

शनिवार, जून 23, 2012

वेब मीडिया को स्वावलंबी बनाने की जरूरत

विदेशो की तरह भारत में भी वेब मीडिया तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है. हिंदी के ब्लॉग्स, वेबसाइट्स और न्यूज़ पोर्टलों को  पूरी दुनिया में पढ़ा जा रहा है. अप्रवासी भारतीयों के  लिए भी अपनी मिटटी से जुड़े रहने का यह सर्वसुलभ माध्यम बन बनता जा रहा है. दरअसल प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया की पहुंच की एक सीमा है जबकि वेब की कोई सीमा नहीं. दुनिया के किसी हिस्से में इसे मात्र एक क्लिक के जरिये देखा जा सकता है. सच पूछें तो ग्लोबल गांव का का असल मीडिया वेब मीडिया ही है. एक सर्वेक्षण की मानें तो सिर्फ करीब सवा अरब की आबादी वाले भारत में ही 10 करोड़ से ज्यादा संख्या इंटरनेट यूजर्स की है और हिंदी के साइट्स की संख्या भी एक लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है. विभिन्न सरकारी योजनाओं के जरिये जिस तरह गाँव-गाँव में पीसी टेबलेट्स बांटे जा रहे हैं और कंप्यूटर शिक्षा प्रदान की जा रही है आनेवाले समय में इस आकडे में जबरदस्त इजाफा होनेवाला है. निश्चित रूप से आनेवाले समय में प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक की तुलना में यह ज्यादा बड़ी आबादी तक पहुंच का माध्यम बननेवाला है. पश्चिमी देशों में तो कार्पोरेट कम्पनियों ने अपने उपभोक्ताओं तक अपने उत्पाद का प्रचार पहुँचाने के लिए वेब मीडिया को अपनी पहली पसंद के रूप में स्वीकार कर लिया है। इसीलिए अब वहां वेब का कुल विज्ञापन व्यवसाय में 80 फीसदी की हिस्सेदारी हो चुकी है. हिंदी वेबसाइट्स को अभी वित्तीय स्वावलंबन की ओर ले जाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है.   
अब समय आ चुका है कि सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर इस मीडिया को अपने पावों पर खड़ा करने की और ग्लोबल गांव के इस सबसे समर्थ और सशक्त मीडिया को अपने पाओं पर खड़ा करने की पहल की जाये. सूचना मंत्रालय वेबसाइट्स को  डीएवीपी में सूचीबद्ध कर सरकारी विज्ञापनों से जोड़े और व्यवसाई वर्ग अपने उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने के लिए इसका इस्तेमाल करे. विज्ञापन एजेंसियां वेब के विज्ञापन के लिए तकनीकी तैयारी करें. यह ग्लोबलाइजेशन के इस दौर की ऐतिहासिक जरूरत है.

-----देवेंद्र गौतम


रविवार, मई 27, 2012

झारखंड जन संस्कृति मंच का राष्टीय सृजनोत्सव

रांची के पटेल भवन में 26 से 28 मई 2012 तक आयोजित  झारखंड जन संस्कृति मंच के तीसरे राज्य सम्मलेन में सामूहिकता की भावना पर पूंजी, बाज़ार और सरकार के हमले को चिंता का मुख्य विषय माना गया. आदिवासी संस्कृति प्रकृति के साथ साहचर्य और सामूहिकता की संस्कृति रही है इसलिए उन्हें उजाड़ने की कोशिशें हो रही हैं, लूट और दमन का शिकार बनाया जा रहा है. सम्मलेन को राष्टीय सृजनोत्सव के रूप में मनाया गया जिसमें छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली  आदि कई राज्यों के साहित्यकारों, सांस्कृतिक  टीमों की भागीदारी हुई. उदघाटन सत्र के दौरान हिंदी के प्रख्यात आलोचक एवं जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. मैनेजर पाण्डेय ने ग्रीन हंट को ट्रायबल हंट करार दिया. उनके अनुसार सृजन अथवा निर्माण का काम मजदूर, किसान, आदिवासी, दलित यानी साधारण लोग करते हैं जबकि विनाश का काम बड़े लोग करते हैं. मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्र जल, जंगल, ज़मीन और प्राकृतिक संसाधनों की लूट की ओर केंद्रित है. प्रकृतिपुत्र आदिवासी इसका तीव्र प्रतिरोध करते हैं इसलिए उन्हें उजाड़ने का अभियान चलाया जा रहा है.इसके खिलाफ संस्कृतिकर्मियों को आगे आना होगा. लेकिन संस्कृतिकर्म के समक्ष भी गंभीर चुनौतियां हैं. पूँजी की शक्तियां तरह-तरह के प्रलोभन का जाल बिछाकर संस्कृतिकर्म को अपने शिकंजे में लेने का प्रयास कर रही हैं. जाल में नहीं फंसने पर हत्या तक कर दी  है. हाल के वर्षों में कई साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी शहीद हो गए. समकालीन जनमत के संपादक रामजी राय ने पेट के बल पर मनुष्यता को झुकाने और व्यक्तित्व के व्यवसायीकरण की सरकारी साजिशों के खिलाफ जोरदार सांस्कृतिक प्रतिरोध का संकल्प लेने का आह्वान किया. साहित्यकार रविभूषण ने कहा कि जन जीवित रहेगा तो जन विरोधी ताकतें ज्यादा देर तक टिकी नहीं रह सकेंगी. डा. बीपी  केसरी ने ऐसी सांस्कृतिक टीमों की जरूरत पर बल दिया जो जनता के बीच जायें उसके सुख-दुःख में शामिल हों. उनके संघर्ष को अभिव्यक्ति दें.
सम्मलेन के दूसरे दिन आज का समय और संगठित संस्कृतिकर्म की चुनौतियां तथा देशज साहित्य में प्रतिरोध के स्वर विषय पर परिचर्चाओं का आयोजन किया गया. इसमें डा. मैनेजर पाण्डेय ने सामूहिकता में सृजन की क्षमता को विकसित करने की शक्ति होने की बात कही और देश-समाज के दुःख को व्यक्तिगत दुःख से बड़ा बताया. कथाकार रणेंद्र ने कहा कि पूँजी के बढ़ते प्रभाव ने संस्कृतिकर्म के सभी रूपों को विलोपित करने का अभियान चला रखा है. मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पूंजीवाद के दलाल की भूमिका में आ चूका है. आज का रावण दशानन नहीं सहस्त्रानन है. सेमिनार को  डा रविभूषण, रामजी राय, छत्तीसगढ़ जसम के जेबी नायक, शम्भू बादल, जनवादी लेखक संघ के जे खान, पश्चिम बंगाल के अमित दास, इप्टा के उमेश नजीर, इलाहाबाद जसम के केके पाण्डेय सहित अन्य लोगों ने संबोधित किया. संचालन भोजपुरी और हिंदी के साहित्यकार बलभद्र ने किया. विषय प्रवेश जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने कराया. अध्यक्षता डा. बीपी केसरी ने की. देशज साहित्य में प्रतिरोध के स्वर विषय पर रणेंद्र, कालेश्वर, शिशिर तुद्दु, बलभद्र, गिरिधारी लाल  गंझू, लालदीप गोप, सरिका मुंडा, ज्योति लकड़ा आदि ने संबोधित किया. 

-----देवेंद्र गौतम 

शुक्रवार, अप्रैल 13, 2012

fact n figure: अपना ही गिरेबां भूल गए निर्मल बाबा

आज तक चैनल पर निर्मल बाबा का इंटरभ्यू उनपर लगे आरोपों का खंडन नहीं बन पाया. किसी सवाल का वे स्पष्ट जवाब नहीं दे सके. इस दौरान उनके चेहरे पर नज़र आती बौखलाहट इस बात की चुगली खा रही थी कि वे कोई पहुंचे हुए महात्मा नहीं बल्कि एक साधारण व्यापारी हैं. एक साधारण मनुष्य जो प्रशंसा से खुश और निंदा से दुखी होता है. जिसे राग, द्वेष जैसी वृतियां प्रभावित करती हैं. वे आरोपों का शांति से जवाब नहीं दे सके. यदि उनकी छठी इन्द्रिय सक्रिय है तो क्या उन्हें इस बात का पहले से इल्हाम नहीं हो जाना चाहिए था कि वे विवादों से घिरने जा रहे हैं. इल्हाम होता तो वे इसका सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार होते और चेहरे पर कोई भाव आये बिना इसके निराकरण का मार्ग तलाश लेते. विवाद उठने के बाद दो दिनों तक उनका चुप्पी साध लेना इस बात को इंगित करता हुआ कि जो कुछ हुआ वह उनके लिए अप्रत्याशित था. उनका इंटरभ्यू देखने के बाद मुझे मजाज़ का एक शेर याद आ गया-
'सबका तो मुदावा कर डाला अपना ही मुदावा कर न सके 
सबके तो गिरेबां सी डाले अपना ही गिरेबां भूल गए.'..............

fact n figure: अपना ही गिरेबां भूल गए निर्मल बाबा:

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गुरुवार, अप्रैल 12, 2012

fact n figure: निर्मल बाबा के विरोध का सच

निर्मल बाबा की पृष्ठभूमि खंगाली जा रही है. प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रोनिक मीडिया और इन्टरनेट मीडिया तक ने उनके विरुद्ध हल्ला बोल दिया है. हालांकि लखनऊ के दो बच्चों को छोड़ दें तो अभी तक किसी आम नागरिक ने उनके विरुद्ध कहीं कोई शिकायत दर्ज करने का प्रयास नहीं किया है. फिर भी मीडिया के लोगों ने आम लोगों की आंखें खोलने के अपने कर्तव्य का पालन किया है. मीडिया के लोग आम तौर पर विज्ञापनदाताओं की जायज़-नाजायज़ सभी हरकतों को संरक्षण दिया करते हैं. कितने ही काले कारनामों पर उन्होंने सफलतापूर्वक पर्दा  डाल रखा है.

मंगलवार, मार्च 20, 2012

गरीबी मिटाने का नायाब फार्मूला

शहरी क्षेत्र में 28 .65 रुपये और ग्रामीण क्षेत्र में 22 .42  रुपये में क्या-क्या किया जा सकता है उसकी क्रय शक्ति क्या हो सकती है..? कभी सोचा है आपने..? शायद नहीं लेकिन हमारे देश के योजना आयोग ने इसपर विचार किया है और इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि एक परिवार के भरण-पोषण के लिए इतनी राशि काफी है. प्रतिदिन इससे कम खर्च करने वाले ही गरीबी रेखा के अंदर आते है. इससे ज्यादा खर्च करने वाले बीपीएल नहीं माने जा सकते. वे एपीएल की श्रेणी में आयेंगे. इस फार्मूले का निर्धारण करने के साथ ही देश में गरीबों की संख्या 40 .72  करोड़ से घटकर 34 .47  करोड़ पर चली आई. क्यों! है न यह गरीबी मिटाने का अनूठा फार्मूला..?इस रेखा को छोटा करते जाइये गरीबी स्वयं कम होती जाएगी. इस लिहाज़ से जिन्हें न्यूनतम मजदूरी मिल रही है उन्हें अमीरों में गिना जाना चाहिए. उन्हें करदाताओं की श्रेणी में लाया जाना चाहिए. क्योंकि वे तो गरीबी रेखा से काफी ऊपर हैं.
यह भारत ही है जहां शासन तंत्र जनता के साथ इस तरह का भद्दा मजाक कर सकता है और जनता चुप रह सकती है. दूसरा कोई देश होता तो इस अवधारणा के जनकों को उनके परिवार के साथ एक टेंट में कैद कर भरण-पोषण के लिए इतनी ही रकम प्रतिदिन देकर देखती कि वे कैसे अपना परिवार चलाते हैं. अपनी बुनियादी जरूरतों को इतने पैसों में कैसे पूरा करते है. यदि वे कर दिखाते तो तो उनके चरण छूती. नहीं कर पाते तो गला................!

----देवेंद्र गौतम 

शनिवार, मार्च 17, 2012

सरकार बनाई तो अब भुगतो

हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विश्वविख्यात अर्थशास्त्री हैं. लेकिन उनका अर्थशास्त्र आम भारतीयों के पल्ले नहीं पड़ रहा है. बजट में रेल किराया से लेकर तमाम जरूरी जिंसों के दाम बढ़ा दिए. टैक्स में कोई खास छूट नहीं दी. रसोई गैस और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की धमकी दे रहे हैं. फिर भी उनका दावा है कि इस बजट से महंगाई घटेगी. कैसे?....यह नहीं बता रहे. विद्वान आदमी हैं उन्हें समझाना चाहिए. यह चमत्कार कैसे होगा. उनकी सरकार बनते ही भारतीय जन की रसोई पर हमला शुरू हो गया. जो गैस एनडीए सरकार के ज़माने तक सहज उपलब्ध था वह दुर्लभ हो गया. अब एक वर्ष में सिर्फ 6 सिलिंडर उपलब्ध करने की घोषणा हो चुकी है. एक सिलिंडर में दो महीने तक किस रसोई में भोजन बनेगा मनमोहन डा ही बता सकते हैं. बाकी सिलिंडर अंतर्राष्ट्रीय कीमतों पर यानी सब्सिडी के बगैर मिलेंगे यह घोषणा तो की लेकिन गैस एजेंसियों को ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया. जनता त्राहि-त्राहि कर रही है लेकिन विपक्ष चुप है. यूपीए सरकार बनायीं तो अब पांच साल तक भुगतो. सिर्फ ममता जी ने रेल बजट पर नाराजगी जताई. उनकी मजबूरी थी. उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीति करनी है जहाँ की जनता ट्राम भाड़ा में 25  पैसे की बढ़ोत्तरी पर भी उबल उठती है. आम जनता को महंगाई की चक्की में पीसने वाली सरकार के साथ उनकी दोस्ती को वहां के लोग कबतक बर्दास्त कर सकते हैं? विरोध तो जताना ही था. अन्य दलों ने भी सांकेतिक विरोध जताकर अपनी भूमिका का निर्वहन कर लिया. जिस तरह प्रधानमंत्री जी का कीमतें बढाकर महंगाई पर लगाम लगाने का दावा लोगों की समझ से परे है उसी तरह तरक्की के जो आंकड़े पेश किये जा रहे हैं उनका आम जनजीवन पर कोई असर समझ में नहीं आ रहा है. इस देश के लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि वे करें तो क्या करें. नागनाथ का विकल्प सांपनाथ हैं. कोई सही और भरोसेमंद विकल्प नज़र ही नहीं आ रहा है.

---देवेंद्र गौतम

बुधवार, मार्च 07, 2012

...दिलों में उदासी सड़कों पर सन्नाटा?


आज 8  मार्च का दिन है. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस. साथ ही होली की पूर्व संध्या भी. पूर्व संध्या बिहार और झारखंड के लिए. यूपी और दिल्ली सहित देश के कई प्रांतों में तो आज ही होली मनाई जा रही है. लेकिन इस बार न अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का और न ही होली का कोई उमंग दिखाई पड़ रहा है. पूरे माहौल में एक अजीब उदासी, एक अजीब सन्नाटा महसूस हो रहा है.
आज सुबह रंगों के भय से हमने कुछ पुराने कपडे पहन लिए थे और सोचा था कि शहर में नहीं निकलेंगे. लेकिन करीब 10  बजे गारी लेन के लिए निकलना पड़ा. हम इसके लिए तैयार थे कि कहीं से पिचकारी का रंग आएगा. कहीं रंग भरे गुब्बारे मरे जायेंगे. हालांकि यह भरोसा था कि जो भी होगा अशोक विहार कालोनी के बाहर ही होगा. रांची की इस कालोनी में एलीट क्लास के लोग रहते हैं. उनके बच्चे भी इंटरनेटी युग के अंतर्मुखी मिजाज़ के हैं. वे टीवी और नेट से चिपके होंगे. उन्हें गुब्बारे मारने की फुर्सत कहां. भारतीय संस्कृति के संस्कारों का ज्ञान कहां?
बहरहाल हम डरते-डरते कोलोनी से बाहर निकले बाज़ार तक गए. जरूरी सामान ख़रीदे और लौट आये. न कहीं पिचकारी छूटी न गुब्बारे फूटे. यही हाल रहा तो आने वाले समय में पर्व-त्यौहार संभवतः औपचारिक आयोजन तक सिमट जायेंगे. होली मिलन के निमंत्रणों से ज्ञात होगा ही होली आ गयी है. क्या यह अपनी संस्कृति से अलगाव का द्योतक नहीं है.....?

----देवेंद्र गौतम      

सोमवार, नवंबर 28, 2011

अरबों की दौलत मगर किस काम की


हाल में मेरे चचेरे भाई नगेन्द्र प्रसाद रांची आये. उन्होंने एक मसला रखा जिसने कई सवाल खड़े कर दिए.. वे घाटशिला में रहते हैं. घाटशिला झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले का का एक पिछड़ा हुआ अनुमंडल है. यहां कुल आबादी में 51 % आदिवासी हैं. सिंचित ज़मीन 20 % भी नहीं. कुछ वर्षा आधारित खेती होती है लेकिन बंज़र ज़मीन काफी ज्यादा है. नगेन्द्र जी ने एक आदिवासी परिवार के बारे में बताया जिसके पास 250 बीघा ज़मीन है लेकिन आर्थिक स्थिति साधारण है. उस परिवार के युवक अपनी ज़मीन मोर्गेज रखकर यात्री बस निकालना चाहते हैं. इसमें वे मदद चाहते थे. जानकारी मिली कि आदिवासी ज़मीन मॉर्गेज नहीं होती. राष्ट्रीयकृत बैंक, प्राइवेट बैंक या प्राइवेट फाइनांसर भी इसके लिए तैयार नहीं होते. कारण है टेनेंसी एक्ट. जिसके प्रावधान के अनुसार आदिवासी ज़मीन उसी पंचायत और उसी जाति का कोई आदिवासी ही उपायुक्त की अनुमति लेकर खरीद सकता है. अन्यथा उसकी खरीद-बिक्री नहीं हो सकती. बिरसा मुंडा के आंदोलन उलगुलान के बाद ब्रिटिश सरकार ने यह एक्ट बनाया था.